प्रभु पद प्रेम सकल जग जाना

भरत जी को भगवत् चरणों की
प्रीति है।

श्रीरामवनगमन और दशरथप्राणप्रयाण
के अनन्तर भरत जी ननिहाल से
अयोध्या लौटते हैं ।

पिता के परलोक गमन और
सीतासहित श्रीरामलक्ष्मण के वन
चले जाने से अत्यन्त दुःखी हैं

और ऐसा दुःखद समचार सुन कर
मानो ऐसे सहम उठते हैं कि जैसे
सिंह की दहाड़ सुनकर हाथी
घबड़ा जाये

सुनत भरत भये बिबस बिसादा
जनु सहमेउ करि केहरि नादा

सहमते इसलिये हैं कि उन्हे
“अहम् ” का वहम नहीं और

इसीलिये परम रामभक्त और
विरक्त साधु हैं।भरद्वाज जी ने कहा था

तात भरत तुम सब बिधि साधू
रामचरन अनुराग अगाधू

राम बिना राज्य कैसे चलेगा?
राम बिना यह मार ही डालेगा राज्यभार

सभी परिवार परिकर सहित
अयोध्या को दुर्भाग्यशाली कहते हैं

ऐसे भरत को

श्रीराम जैसे “साधु” मानो सबका “सब “
साधने वाले सर्वगत आत्मा
परमात्मा का वियोग तो ऐसा है कि

सभी का “भाग्य” ही भाग गया हो
दुःखी अवस्था में तत्व उपदेशते हैं

जे नहिं साधु संग अनुरागे
परमारथ पथ बिमुख अभागे

माँ कौशल्या भरत की दशा देख
गोद में बैठा कर सान्त्वना देती हैं भरत के लिए राम तो प्राणों के प्राण हैं। और उधर इसी तरह श्री राम के लिये भी भरत जी प्राणों से अधिक प्रिय हैं - "राम प्रानहु ते प्रान तुम्हारे तुम रघुपतिहि प्रानहु ते प्यारे" इधर श्रीराम के वन में आने पर वाल्मीकि ऋषि ने श्रीराम से

राम बिना कुछ भी नहीं चाहने वाले
भरत सरीखे “साधु” का स्मरण कर

संसार की असारता कही थी और
जैसे कि अयोध्या की धनधरती
तो श्रीराम की है, भरत के लिये
यह विषवत् –जननी सम जानहिं पर नारी धन पराव विष ते विष भारी भरत ऐसे "साधु" हैं जो परसंपत्ति को देख हर्षित तो होते हैं, किन्तु पर ( मानो समस्त अयोध्या की ) की विपत्ति देख विशेष दुखी जे हरषहिं पर संपति देखी दुखी होहिं पर विपति विसेषी

जिन भरत के लिये श्रीराम प्राणो
से भी अधिक प्रिय हैं उनका “मन”
तो “श्रीरामायण ” है

जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे

श्रीराम भक्ति ही जिनका काम
बन जाये। सभी गुणों को राम का
मान कर “मानापमान” से परे हो।

भगवान् के भक्त ( श्रीसीतालक्ष्मणादि)
जिन्हे प्रियप्रतीत हों, ऐसे भाग्यशाली
के हृदय में आपका अचल आसन है

गुन तुम्हार समुझै निज दोसा
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं
तेहि उर बसहु सहित वैदेही

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु
तुम्ह सन सहज सनेह
बसहु निरन्तर तासु मन
सो राउर निज गेह

ऐसे विगताभिमान सत्याचरणचारी
परमविचारी साधुमूर्तशरीरधारी

श्रीभरत जी महाराज सभी से विनय
पूर्वक श्रीरघुनाथ जी के दर्शन विना

हृदय – दाह-दाहकता की शान्ति
असम्भव मानते हैं-

आपनि दारुन दीनता
कहउँ सबहिं सिर नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

और नारायण! यह समझिये कि

श्रीभरत जैसे त्यागी रामानुरागी
का आचरण और चरम धरम
सभी जीव (मनुष्य) मात्र
के लिये तत्वोपदेश है कि

यदि इस देश में आने का लक्ष्य नहीं
तो यह भरताचरण आचरणीय है

वस्तुतः मानव जीवन का यही
एकमात्र उद्देश्य है कि

भगवद् दर्शन के बिना संसार दर्शन
में अटके रहने पर भटकना ही
पड़ेगा

इसलिये परम पुनीत प्रयाग की
धरती पर भरत के राम प्रेम को

देखकर भरद्वाज जी ने ,इसे
अनुकरणीय आचरणीय कहा था

भरत नीतिरत साधु सुजाना

“प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना”

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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