त्रिवेणी जल ने भरत जी को
आशीर्वाद में श्रीराम की अनन्यप्रियता
प्रदान की है।
उधर भरत के विषय में जीवाचार्य
लक्ष्मण की लीला द्रष्टव्य है
जब अयोध्या से प्रस्थान किये
सपरिकर श्रीभरत जी का
आगमन जान कर, श्रीरामसीता
सहित लक्ष्मण पर, आक्रमण करने
के लिए वे भरत जी आरहे हैं
ऐसी “विमतिलीला” का नाटक
करते हैं, लक्ष्मण जी
भगवान् श्रीराम श्रीलक्ष्मण जी को
पहले ही समझा चुके हैं कि
अतिभार विस्तार विस्तीर्ण
समेरु तो मच्छर की एक फूँक से
हो सकता है उड़ जाय, किन्तु
भरत जैसा निर्मान निर्मोह
जगद् हितैषी त्यागी साधु सन्तस्वरूप
महात्मा को राज्य सत्ता का मद नहीं
छू सकता
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई
आगे भगवान्, तो भरत को सूर्यवंश
रूपी तालाब का हंस ही कह देते हैं ,
जो जल विकार को दूर कर
दूध का दूध और पानी का पानी
कर डालने के लिये प्रसिद्ध है
भरत हंस रविबंस तड़ागा
जनमि कीन्ह गुनदोष विभागा
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
निज जस कीन्ह जगत उजियारी
भैया! ऐसा भरत और ऐसी दुर्मति
कि वह हम पर आक्रुष्ट हो आक्रमण
करे, यह तो असम्भव है हंस है यदि भरत तो साक्षात् सरस्वती का वाहन है।
सरस्वती स्वयं ज्ञानमूर्ति जिसके
ऊपर विराजे, उसके द्वारा अज्ञान
मूलक -कार्य ?असम्भव असम्भव असम्भव
भैया ! भरत तो ऐसा हंस है कि
वह “जड़जल ” के मायिक गुणों त्रिविध सद् रजस् तमस् के त्रिविध क्रमिक कार्यरूप दुर्गुणों सुख दुःख और मोह से भी सर्वथा परे है और परे कर देने वाला साधु है
नारायण! “जल” तो मायिक है जड़ है
गगन समीर अनल जल धरनी
इन्ह कै नाथ सहज जड़ करनी
भरत के गुणों का स्मरण भी
भगवान् को दुखी कर दे रहा है
शरणागत वत्सल परमकरुणामय
प्रभु श्रीराम तो लक्ष्मण से
श्रीभरत जी के गुण-शील-स्वभाव
का वर्णन करते हुए प्रेम के समुद्र में
डूब ही गये
कहत मगन गुन सील सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ
भैया! भरत जैसा निर्लोभी
निरभिमानी तो ब्रह्मा के द्वारा
रचा ही नहीं गया है
सुनहु लखन भल भरत सरीसा
विधि प्रपंच महु सुना न दीसा
और यह सब भरत जी के विषय
में प्रभु श्रीराम इसलिये कह रहे हैं
मानो त्रिवेणी जल ने भरत को
दुःखातीत होने और भगवान्
का अनन्य प्रेमी होने का आशीष
जो दे दिया था
बादि गलानि करौ मन माही
तुम्ह सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं
गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्