“भरत” श्रीराम कथा के असाधारण
चरित्र हैं।यह और कोई नहीं वरन् स्नेह-अनुराग-प्रेम का समूहीभूत पुंजीभूत दूसरा शरीर धरे प्रभु राम ही हैं भरद्वाज मुनि ने अपने आश्रम में पधारे श्रीभरत जी से यह बात कही थी
तुम तो भरत मोर मत एहू
धरे देह जनु राम सनेहू हमारे सद्गुरु भगवान् मलूक पीठाधीश्वर महाराज जी ने व्यास-पीठ से एक दिन सन्त परम्परानुमोदित एक रहस्य का अचानक अनावरण कर दिया कि इसी कलिकाल में भरद्वाज ऋषि की वाणी सिद्ध करने के लिए श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य तो श्रीराम जी और श्रीभरत जी का संयुक्त विग्रह धारण करके अवतरित हुए थे "रामानन्दः स्वयं रामः प्रादुर्भूतः महीतले" "भरतस्यानुपमं प्रेम ध्यायन् युक्तः समागतः" नारायण! सन्तो की वाणी ऋषियों की वाणी जो निकल जाती है परमपरम चरम स्नेही प्रभु तो उस अर्थ को घटाते ही हैं संस्कृत-कविता-कामिनी-विलास कालिका-कृपा-दृष्टि के आवास महाकवि कालिदास भी इसी बात का अनुमोदन करते हैं - "ऋषीणां पुनः आद्यानां वाचम् अर्थः अनुधावति" त्रिवेणी जल में स्नान करके अत्यंत भावुक होकर जब श्रीभरत जी ने धर्मार्थकाममोक्ष में अरुचि दिखाते हुए श्रीरामचरणों का अनुराग माँगा था तब त्रिवेणी जल के "तथास्तु" कहने पर उन्हें रोमांच हो गया
देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की
भरत को धन्यातिधन्य कहा
तनु पुलकेउ हिय हरषि सुनि
“बेनि-बचन” अनुकूल
भरत धन्य कहि धन्य सुर
हरषित बरसहिं फूल
भरद्वाज जी ने भरत को सुख की
संजीवनी और जड़संसार का
“समस्त यश” कहते हुए
भगवान् का प्रीतिपात्र कहा
तुम पर अस सनेह रघुबर के
सुख संजीवनि जग जस जड़ के ऋषि भरद्वाज ने अपनी तपस्या का फल सियारामलखन का दर्शन बता कर इस भगवद् दर्शन का भी फल श्री भरत जी का दर्शन बता दिया नारायण ! भगवद् दर्शन का फल
साधु सन्त विरक्त भक्त का दर्शन ही है
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं
उदासीन तापस बन रहहीं
सब साधन कर सुफलु सुहावा
लखन राम सिय दरसन पावा
तेहि फल कर फल दरस तुम्हारा
“सहित प्रयाग सुभाग हमारा”
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्