भगवान् श्रीराम ने भरत जी को
नीति रत सज्जन साधु पदवी दी थी
नीयते अनया सुष्ठु रीत्या इति नीतिः
निःशेषः अशेषः समग्रः सम्पूर्णः
“परमात्मैव”प्राप्यते यस्यां सा नीतिः
शास्त्र और सन्त अनुमोदित जिस
सुन्दर मार्ग से चलकर निःशेष
सम्पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति हो
वही वस्तुतः नीति है।
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ
जब श्रीरामजी नीति को यथार्थतः
जानते हैं, तो और कौन नीतिज्ञ है?
यह भी जानते हैं।
श्रीरामकथा में भरत जैसा सज्जन
साधु नीतिज्ञ प्रीतिज्ञ प्रभुपदस्नेहज्ञ
निरभिमान त्यागी विरागी धर्मज्ञ
सन्त साधु भक्त दूसरा मिलता नहीं
भगवान् ने कहा यह भरत धर्म की
धुरी हैं
जौ न होत जग जनम भरत को
सकल धरम धुरि धरनि धरत को
चलाचल सम्पत्ति को विपत्ति ही
मानने वाले चरित्र हैं भरत
राजसत्ता का मद दम्भ स्पर्श ही नहीं
कर पाता
मच्छर की एक फूँक से सुमेरु जैसा
पर्वत तो उड़ कर कहीं जा सकता है
किन्तु भरत को राज्यमद नहीं हो
सकता
लक्ष्मण से भगवान् ने कहा
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
होइ न नृपमद भरतहिं भाई
समुद्र का खारापन अत्यंत खट्टे दही
मट्ठे के कण मात्र से मिट सकता है
लेकिन भरत को ब्रह्मादिक पद
मिलने पर भी मद नहीं हो सकता
भरतहिं होइ न राजमद
बिधि हरि हर सन पाइ
कबहुँ की काँजी सीकरनि
छीरसिन्धु बिनसाइ
नारायण! भगवान् के वन गमन के
बाद भरतजी उन्हें लौटाने के लिए
सपरिकर प्रस्थान करते हैं मार्ग में तीर्थराज प्रयाग पड़ता है त्रिवेणी में स्नान करते हैं परमपावन पतितपावन श्रीराम जी के वन गमन से अत्यंत दुखी हैं और इतने आर्त हैं कि त्रिवेणी से भी "भीख" माँग बैठते हैं नारायण! मर्यादा ही तोड़ देते हैं राजा को भीख नहीं माँगनी चाहिए किन्तु श्रीरामवियोग का असह्य दुख उन्हें धर्मविचलित कर देता है
माँगहु भीख त्यागि निज धरमू
आरत काह न करइ कुकरमू
पुरुषार्थ-चतुष्टय में भरतजी को कोई
अभिरुचि नहीं। रुचि है तो
केवल और केवल
प्रभु राम के शुचि-चरणों में
अरथ न धरम न काम रुचि
गति न चहौं निरबान
जनम – जनम रति राम पद
यह बरदान न आन
गंगा यमुना सरस्वती का संगम
भरत को श्रीरामप्रेम-संगम दे देता है
क्योंकि यहाँ भी तीन हैं
श्री ( उभय बीच श्री सोहति कैसे )
राम(सच्चिदानन्द दिनेसा)
प्रेम( सब मम प्रिय सब मम
उपजाए)
इसीलिये आतुर होकर संगम से
अनूठा संगम माँगते हैं
सीताराम चरन रति मोरे
अनुदिन बढ़हु अनुग्रह तोरे
तब त्रिवेणी जल बोल पड़ा
आशीर्वाद के आकांक्षी प्रेममूर्ति
भरत को सब प्रकार से साधु
कहा जैसे रामजी ने कहा था
और आशीष में श्रीराम का
अगाध प्रेम दान मिल गया
“तात भरत तुम सब बिधि साधू
राम चरन अनुराग अगाधू”
हरिगुरू शरणम्।
गुरुहरी शरणम्।