बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

संसार भक्ति छोड़कर हरि भक्ति
ही श्रेयस्कर श्रेष्ठतम "भक्त नचिकेता" के शब्दों में "श्रेयस् मार्ग" है संसार भक्ति तो "प्रेयोमार्ग" है नचिकेता "अन्नादि" की तरह उगने पकने और पुनः पैदा होने वाले संसार मार्ग पर जाना नहीं चाहता

इसीलिये कठोपनिषद् मे नचिकेता ने
“यम” से कहा था

” सस्यमिव आजायते मर्त्यः
सस्यम् इव पच्यते यथा “

“नहीं चाहिए मुझे इन्द्र का सुख
अथवा नाना लोकों का लोकसुख “

“इमा रामाः सरथाः सतूर्याः “"तवैव वाहाः तव नृत्यगीते "

लंकाधिपति की भक्ति भी प्रेयोमार्ग
वाली सहेतुकी भक्ति है।जब हेतु( कारण) पूरा हुआ फल प्राप्ति हुई और भक्ति भी पूरी

नारायण!
विभीषण की भक्ति तो संसारभक्ति
नहीं।

मानशून्य जो है। महामानी रावण
द्वारा ठुकराने पर शरणागत
होकर केवल भगवान् की
“प्रेमा -भक्ति ” का आकांक्षी है

” यद्यपि प्रथम वासना रही
रघुपति प्रीति-सरित सो बही रावण ने निर्मान विभीषण की बात क्या ठुकराई,तत्क्षण सकामी

अभिमानी दशग्रीव का वैभव समाप्त

रावण जबहिं विभीषन त्यागा
भयउ विभव तनु तबहिं अभागा

और समझिये नारायण !

शिवजी ने शिवा से कहा कि
साधुसन्त कि शिक्षा का अनादर
समस्त हानि का कारण बनता है

साधु अवग्या तुरत भवानी
कर कल्यान अखिल कै हानी

विभीषण जी ने माता सीता को
लौटाने और निष्काम निर्मान
भक्ति का उपदेश किया था

यह भक्ति ,सनेही राम की सनेही भक्ति
जो ठहरी

” भजहु राम बिन हेतु सनेही “

लक्ष्मण जी ने चिट्ठी ही भेज दी थी
रावण के पास
अपने को अनुज कहते हुए ,

प्रभु कमल चरण – कमलों का
चंचरीक बन जाने का निवेदन किया
अभिमान छोड़ने का आग्रह किया अन्यथा की स्थिति में प्रभुराम के बाणों की ज्वाला में पतिंगे की तरह जलना पड़ेगा

की तजि मान अनुज इव
प्रभु पद पंकज भृंग
होहि कि रामसरानल
खल कुल सहित पतंग

और तो और
रावण का भेजा उसका अपना दूत
” सुक” लौट कर श्रीलक्ष्मण जी
की चिट्ठी सौंप कर
चिट्ठी में लिखी बातें अक्षरशः सत्य
बताता है
अभिमान त्याग का निवेदन करता है

कह सुक नाथ सत्य सब बानी
समुझहु छाँड़ि प्रकृति अभिमानी

“यह मानापमान अभिमान तो
प्रकृति का प्राकृत अंश है ” अतुलितबलधाम निष्काम श्रीराम-काम हनुमान् जी महाराज भी संसार भ्रम(मान) को छोड़ कर भगवत् शरणागति को ही श्रेष्ठतम श्रेयमार्ग बताते हैं

” भ्रम तजि भजहु भगत भयहारी “

इसीलिये नवधा भक्ति उपदेश- अवसर
पर, भगवान् श्रीराम सकामी और
साभिमानी तथा पद-पदार्थ
वस्तु-देशादि को चाहने वाले
भक्त को
जलहीन बादल की तरह व्यर्थ कहा

भगति हीन नर सोहइ कैसा
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा

अब भगवान् कहें तो भक्त क्यों नहीं

कागभुशुण्डि जी ने संसार भक्ति
त्याग कर,
हरि की निष्काम भक्ति को
संसारोद्धरण का अनुभूत मार्ग कहा

निज अनुभव अब कहहुँ खगेसा

बिनु हरि भजन न जाइ कलेसा

गुरुहरी शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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