अनन्त बलवन्त रावणमदहन्त
श्रीमन्त हनुमन्त ने भगवान् कोबताया की आपका स्मरण
और भजन सेवन ही संसार-विपत्
का आत्यन्तिक नाश कर सकता है। जपत हृदय रघुपति गुन श्रेनी जैसी जगदम्बा जानकी आनन्दविभोर हैं आपकी स्मृति में सतत नाम जप लीन हैं।
प्राण तो आप में रहन से जाने से रहे
नाम पाहरू दिवस निसि
ध्यान तुम्हार कपाट ,
लोचन निज पद जंत्रित
प्रान जाहिं केहिं बाट
अब ये है कि आपका विरह ही
बड़ी विपत्ति है, जो कहने योग्य नहीं
सीता कै अति बिपति विशाला
बिनहिं कहे प्रभु दीनदयाला भगवती और भगवान् शक्तिमती और शक्तिमान् वस्तुतः अभिन्न हैं यह तो "सीताराम" की नर लीला है
अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के कर्ता
कारयिता प्रेमियों को मान देन वाले
और संसार-प्रेमियों का अभिमान
मान-खण्डन करके उन्हें "निर्मान - मोहा -जित-सङ्ग-दोषाः" करने वाले करुणा वरुणालय भगवान् किसी "भक्त" का अभिमान रहने नहीं देते, चाहे जड़ हो चाहे चेतन समुद्र का मानभंग भगवान् ने इसीलिये किया, भक्ति भी दी।
भगवान् ने विनय प्रार्थना की
सिन्धु समीप गए रघुराई।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिर नाई इसलिये कि समुद्र पार करने का उपाय वह समुद्र स्वयं कहेंगे किन्तु भगवान् के विनय का कोई परिणाम न आने पर
वाण सन्धान किया प्रभु ने
सन्धानेउ प्रभु बिसिख कराला
ऊठी उदधि उर अन्तर ज्वाला
सभीत डरा सहमा जड़ समुद्र त्यक्ताभिमान ब्राह्मण वेश में सोने की थाली में नाना मणियों को सजाये आ गया।
कनक थार भरि मनि गन नाना
बिप्र बेस आयउ तजि “माना” भगवान् का चरण रज लिया क्षमा माँगी सभय सिन्धु गहि प्रभु पद केरे छमहु नाथ सब अवगुन मेरे "नष्टाभिमान हो गया सद्यः समुद्र और प्रगटी स्वतः भक्ति" भगवान् को सागर सन्तरण का उपाय "नल-नील" के रूप में बताया है। बड़ी बात कि जड़ समुद्र तो चेतन हो गया है प्रभुस्पर्श सुख से
और नलनील के स्पर्श से बड़े बड़े पत्थर
पानी में तैरेंगें, जिसके पीछे और
कोई शक्ति नहीं
वह शक्ति तो प्रभु आपकी ही होगी
आपके प्रताप से यह संभव होगा
तिनके परस किये गिरि भारे
तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे
ऐसे हमारे प्रभु श्रीराम
जो क्षण भर में जड़ को चेतन और चेतन को जड़ तथा मूक को बाचाल और बाचाल को मूक बनाने वाले हैं किसी शरणागत पर कृपा करके उसे "विगताभिमान" बना कर अपनी "अनपायनी भक्ति" दे दें तो उनकी "भक्तवत्सलता" ही प्रमाणित होती है।
इसीलिये रुद्रवतार अंजनी-नन्दन ने भगवान् के भक्तवात्सल्य पर सुविचारित निर्णय ही मानो दे दिया कि हे प्रभु आप जिस पर
कृपा करें उसे कौन सी विपत्ति? आप और आपके प्राणप्रिय सन्त जिसे संसार सागर से उबारना चाहें अपने भजन में लगा कर उबार ही लेंगे। उसका बार-बार का चक्कर खतम
कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई
जब तव सुमिरन भजन न होई
हरिगुरू शरणम् । गुरुहरी शरणम् ।