भजु तुलसी तजि मान मद

यह भजन का मार्ग है ।
यह सेवा का मार्ग है ।
यह संसार भंजन का मार्ग है ।
यह राम रंजन का मार्ग है ।

यहाँ अभि मान छोड़ना होगा ।
पकड़ना है यदि भजनसेवा सन्मार्ग

“मान” जो “अभि” अर्थात् अपने चारों
ओर हमने गढ़ रक्खा है।

हमने स्वयं रचा है ।

अच्छा लगता है मुझे मान मिलने से
अच्छा लगता है मुझे सम्मान मिलने से

और किसका है यह ” मान “?

यही है शरीर का मान

हमारे शरीर से जुड़ा संसार का मान

रूपये पैसे सगेसम्बन्धों का मान

कभी नहीं टिकते ये सभी
ले जाते पुनर्जन्म की ओर
मायिक संसार का कोई
नहीं है राम ! ओर और छोर

भरद्वाज मुनि पवित्र प्रयाग की
धरती पर याज्ञवल्क्य को यही बताते हैं

कहहुँ राम गुन ग्राम
भरद्वाज सादर सुनहु
भव भंजन रघुनाथ
भजु तुलसी तजि मान मद

सुन्दर काण्ड में अनन्त बलवन्त
हनुमन्त अपनी भक्ति -मत्ता
सिद्ध करते हैं निरभिमानता लक्षित भक्ति का

उदाहरण देने को तत्पर वे “भक्तराज” भक्तिमूर्ति श्रीसीताजी से आज्ञा

माँगते दिखते हैं फल फूल खाने की

बड़ों की आज्ञप्ति के बिना कुछ करना

“मनमानिता और अभिमानिता है”

सुनहु मातु मोहिं अतिशय भूखा
लागि देखि सुन्दर फल रूखा

मैया मैथिली भी सभी कुछ साफल्य

का मूल भगवद् अनुग्रह ही मानती हैं

और अपनी भी निरभिमानता सिद्ध
करती हैं। प्रभु
श्रीराम को हृदय में
धारण करके सफल होने को
कहती हैं

“स्वयं किसी बात का श्रेय न लेना

निरभिमानता का प्रत्यक्ष लक्षण है”

और “निरभिमानता तो भक्ति की पराकाष्ठा है "

देखि बुद्धि बल निपुन कपि
कहेहु जानकी जाहु
रघुपति चरन हृदय धरि
तात मधुर फल खाहु

रामकाज मर्यादा काज है

हनुमान् निरभिमान अतिभक्तिमान जौं न ब्रह्म सर मानहु महिमा मिटै अपार कहते हुए ब्रह्मबान से मूर्छित होने की लीला करते हैं और नागपास में बँध कर दिखाते हैं कि यह सवाल मेरा नहीं है

यह तो मर्यादापुरुषोत्तम की प्रबल
भक्तिमत्ता का मामला है

मेघनाद से बंध कर अपने दूतकर्म
को भी पराकाष्ठा पर पहुँचाते हैं

तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ
नाग पास बाँधेसि लै गयऊ

जासु नाम जपि सुनहु भवानी
भव बन्धन काटहिं नर ज्ञानी
तासु दूत कि बन्ध तरु आवा
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा

ऐसी है मर्यादा पुरूषोत्तम के दूत
की मर्यादा

अभिमानशून्यता भक्तियुक्तता और
भय -मुक्तता

भक्तिमूर्ति माता सीता भी
निरभिमान हैं
सारा भार भगवान् पर डाल कर
भगवत् चिन्तामग्न होने से
अति निश्चिन्त

इधर लंकाकांड में स्वयं भगवान् भी
मेधनाद के सर्पास्त्र से बँधने
की लीला से राक्षसों को ललचाते हैं

तब शिव ने शिवा से कहा था

गिरिजा जासु नाम जपि
मुनि काटहिं भव पास
सो कि बन्ध तरु आवइ
व्यापक विश्वनिवास

ब्याल पास बरु भयौ खरारी
स्वबस एक अनन्त अविकारी
नट इव कपट चरित कर नाना
सदा स्वतंत्र एक भगवाना

भगवान् ने कथाक्रम में उमा को बताया
कि जिसका नामजप भव पास को
काटता है, वही मेरे प्रभु नरलीला वस
बन्धन स्वीकारते हैं।

मानो उनको तो सभी जीवों को
तारना ही हैऔर आज न सही कल ही सही निरभिमान बनाकर भक्ति पवानी है "उनका" चरित्र बुद्धि तर्क से जाना नहीं जा सकता

राम अतर्क्य बुद्धि बल बानी
मत हमार अस सुनहु भवानी

चरित राम के सगुन भवानी
तर्कि न जाइ बुद्धि बल बानी

अस बिचारि जे तग्य बिरागी
रामहिं भजहिं तर्क सब त्यागीराम भजो राम भजो राम भजो भाई अब देखिये

नरलीला बस श्रीराम का सर्पास्त्र
बन्धन होने पर
व्याकुलित वानर सेना को देख कर

देवर्षि नारद गरुड को प्रेरित
करके भेजते हैं
और माया का बना प्राकृत
सर्प नष्ट हो जाता है।नारायण!मानो मायापति की माया से सबकी माया ही समाप्त

इहाँ देव रिषि गरुड पठायो
राम समीप सपदि सो धायो

खगपति सब धरि खायो
माया नाग बरूथ
माया बिगत भए सब
हरषे बानर जूथ

युद्ध पूरा होने पर श्रीराम जगदम्बा
जानकी, समस्त परिकर, अयोध्या
पधारता है श्रीरामराज्याभिषेक होता है भगवान् स्वयं निरभिमानता दिखाते सिखाते हैं

युद्ध का सारा श्रेय अपने कुलगुरु
वशिष्ठजी को देते हैं।

देखने विचारने और आचारने योग्य
है, इनकी अभिमानशून्यता पुनि रघुपति सब सखा बोलाए मुनि पद लागहु सबहिं सिखाए गुरु बशिष्ठ कुल पूज्य हमारे इनकी कृपा दनुज रन मारे

मानो भगवान् अपने भक्तों के भक्त हैं

अनन्तर लंका युद्ध के अपने सहयोगी
जनो का परिचय गुरु से कराते हैंसभी युद्ध-सहयोगियों से सद्गुरु वशिष्ठजी को प्रणाम करने का आग्रह करते हैं। और अपने नहीं बल्कि अपने हनुमान् जाम्बवान् सदृश वानर - रीछ समुदाय को भी विजय का श्रेय देते दिखते हैं और श्रेय तो यहाँ तक देते हैं कि इन सभी वानर-रीछों को प्रेममूर्ति अत्यंत विगताभिमान श्रीभरत जी महाराज से भी अधिक प्रेमी बता देते हैं ये सब सखा सुनहु मुनि मेरे भये समर सागर कहुँ बेरे मम हित लागि जन्म इन्ह हारे भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे नरलीला करने वाले भगवान् स्वयं भी निरभिमान और जब स्वयं भगवान् ही भक्ति प्राप्ति का मूल निरभिमानता बतायें तब आश्चर्य क्यों ? इसीलिये बालकाण्ड में भगवान् और उनकी भक्ति पाने के लिये अभिमान दम्भ मद को को छोड़ने का संकल्प दिखाया गया है भगवान् की दृढ प्रेमा भक्ति पाने के लिये "भरद्वाज ऋषि बसहिं प्रयागा" का आग्रह अत्यन्त आदरणीय और वरेण्य है कथाक्रम में वे इसी संकल्प को अभिव्यक्त करते हैं। भवभंग और नित्य भगवान् की सेवा सुख की अनुभूति वाली "भक्ति"

” मद -मान” छोड़ने पर ही मिलेगी कहहुँ राम गुन ग्राम भरद्वाज सादर सुनहु भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment