नारायण! भगवान् का स्वस्वभाव ही है
जगत् के दुःखतापसन्ताप से
व्याकुल जनों को दुःख रहित कर देना
और भगवान् का स्वभाव है तो
भक्त भी यही भाव है।
जिस भक्ति और भक्त भाव को लेकर
“शिव” ही रामासक्ति -आसक्त
हनुमान् रूप धरे हैं। और कथाक्रम में
जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-
उमा सन्त कै इहै बड़ाई ।
मन्द करत जो करै भलाई ।
भक्त/सन्त तो भगवन्त प्रकृति होते हैं ।बड़प्पन है इन सन्तों का जो इनको
भला बुरा “चोर-सठ” तक कहने वाले
मन्द-नीच प्राणी की भी भलाई
ही करना चाहते हैं-
“भक्तराज” हनुमान् अभिमान-मूर्तिमान्
रावण और “लंकिनी” दोनों का
भला करने को आतुर हैं।
गीता में भी यही संकल्प दोहराते हैं –
कोई भी कैसा भी कितना भी
दुराचरण-रत हो, यदि सभी पापों
के प्रायश्चित स्वरूप मेरे शरणागत
होकर मेरे ही जैसे जगत् की
स्वार्थ-रहित सेवा(भजन-सेवन)का
संकल्प ले ले,तो मैं तो पहले से ही
” प्राणप्रिय” जीव को आत्मसात्
करने का संकल्प लिये बैठा हूँ-
अपि चेत् सुदुराचारो ,
भजते माम् अनन्यभाक् ।
साधुः एव स मन्तव्यः ,
सम्यग् व्यवसितो हि सः ।।
जो पै दुष्ट हृदय सोइ होई ।
मोरे सनमुख आव कि सोई ।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।
जीवात्मा तो परमात्मा का अपर प्राण
यदि संसार से भयग्रस्त होकर
भगवान् के शरणागत हो तो
भैया! प्रभु उस “अपने” को अपनायेंगे
जों सभीत आवा शरनाई ।
रखिहौं ताहि प्रान की नाईं।
जैसे विभीषण को क्या नहीं दिया ?
उस ” अपर” “जीव” की “अपरा”
“माया” का अपहरण करने को साधु
सन्त भगवन्त तत्पर हैं।
लेकिन अनन्य भाव से आना होगा
सब कुछ मद मोह अभिमान त्याग
कर आना होगा भगवान् तो “साधु”
पद साधने की बाट जोह रहे हैं –तजि मद मोह कपट छल नाना । करौं सद्य तेहि साधु समाना ।।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।