बिनु बिस्वास भगति नहिं

जब इस मुक्तसाधिनी काया में
श्वास वायु “वि” अर्थात् “विशेष” हो।

वह “विशेष” ओर कोई नहीं है।
वह श्रीसीतारामजी ही हैं।

जिसमें कोई शेष बचता ही नहीं
वही ” विशेष “
इस तरह जब विशेष श्वास होगी तब, यह काया अपनी सार्थकता सिद्ध करेगी ।

सार्थकता क्या है? भक्ति की प्राप्ति । और भक्ति का अर्थ क्या ?

भक्ति शब्द संस्कृत व्याकरण की

दृष्टि से अनेकार्थी है। इस शब्द का
निर्माण दो धातुओं से है।
एक है भंग और दूसरा है सेवा –

1- भञ्ज् ( मर्दन,खण्डन )धातु से
अर्थ मानें तो, इसका अर्थ , है – संसार के प्रति मोह-भंगता

संसार प्रिय न लगना

2- दूसरा है, सेवा भज् सेवायाम् धातु भी संस्कृत

धातु-पाठ में पढ़ी गई है।

अतः भक्ति माने “सेवा-भावना”

अब , इसमें दूसरा “सेवा भावना”
वाला अर्थ प्रायः ज्ञात है ।

तब इसका मतलब है, भगवद्
भागवद् भाव से संसार की सेवा

तात्पर्य कि संसार, तो भगवत् स्वरूप
वाला ही है ।अतः सभी को भगवद्
दृ्ष्टि से देख कर व्यवहार

जड़ चेतन जग जीव जत,
सकल राममय जानि।
बन्दउँ तिनके पदकमल,
सदा जोरि जुग पानि।।

सियाराममय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।

संसार का सेवन सर्वत्र
सब को श्रीराममय मानकर
करो।

और जब यह संसार हमारे “सेव्य”
श्रीराम से ओत-प्रोत है, तब

तब हम इसके सेवक(भक्त) हैं।

पहला वाला अर्थ, संसार के
वस्तु व्यक्ति पदार्थ से मोहभंग तो स्वतः ही सिद्ध हो जायेगा क्योंकि -

“जो मोहिं राम लागते मीठे”
विनयपत्रिका

संसार ही भंग हो जायेगा राम ही संग हो जायेगा। इसलिये कि हमारी श्वास का प्रत्येक अनुक्रम राम ही निकालेगा यह श्वास - प्रश्वास में बहने वाली राम-हवा, तो

नारायण ! सभी पतनों दुःखों

की हवा ही निकाल कर रख देगी ।

राम ही विश्वास, विशिष्ट श्वास हैं ।

इन्ही की भक्ति कल्याण करी है ।
श्वास से प्रश्वास से अन्दर -बाहर
होता यह सतत प्रवहणशील राम तो हनुमान का आकर्षण करके आकर्षक-संसार-लंका अवश्य जलायेगा।

यह राम ही कल्याण करेगा ।

इसलिये कहा – "बिनु बिश्वास भगति नहिं," तेहिं बिनु द्रवै न राम।

रामकृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह विश्राम।।

गुरुः शरणम् ।। हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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