कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम्

नाना नाम रूपारूपात्मक जगद्
के सर्जक पालक और शामक

लसल्लीलाललाम सर्वकामकाम
कोटिकन्दर्प-दर्पदलन
सन्तसाधुसर्वैकप्राण
आरतार्तिभक्ततारण
जगन्मायाविस्तारण
प्रपञ्चपाथोधिदुस्तरोत्तारण
मोह-मद-क्रोध-रिपुमारण
वसुदेव-सुत-स्वयंभव-स्वीकारण
कंस- चाणूर – गर्व – खर्वीकृत -रण
देवकी-परमानन्द-पूर-कारण
जगदन्धकार-प्रकाश-विस्ताण

अर्जुन -मनोमालिन्य -मल -निवारण

एकतान-सन्तानित-भक्ति-विस्तारण

संसार-प्रियत्व-कुंजर-विदारण

मायावश-विवशीभूत-मायापहारण

उन्मुक्त -मन -मीन -स्वकीयचरण –
जल – उत्ताल -जलधि –
विहार -विहारण समस्त -भक्त -सर्वदा -नन्दकारण

गोपिका-शान्ति-कल-कान्ति-सारण छलितगोपि-राधा-रूप-ग्रहण

रस-रास-रसेस-रासेस-सार-सारण

सच्चिदानन्द-सर्वकारण-कारण

नमामि सततं सराधिकम् त्वाम्

गुरुमखण्डा -नन्त -ब्रह्माण्ड -नायकम्

वासुदेव-सुतं देवं,
कंस-चाणूर-मर्दनम् ।

देवकी-परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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