सन्तो साधुओं की अवज्ञा अनर्थ ही
उपस्थित कर देगी।
इसलिये कि इनका आदेश तो
मूर्तिमती मर्यादा है।
छल कपट और अभिमान वश
सन्त आज्ञा की अवहेलना होती है।
और रावण तो इन सभी विग्रह ही है।श्रीहनूमान् जी महाराज तो जैसे साधुसन्त के अपर शरीर हैं।
जगदम्बा जानकी मूर्तिमती बुद्धि हैं।
ऐसी अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका
से अजर अमर गुननिधि सुत होने
का वरदान पा चुके,
वानर रूप धरे सुर कोई,
देवाधिदेव महादेव के अवतार,
परमपरमसन्तरूप इनके वेदानुशासन को ठुकराने
का दुःसाहस करने वाले,
मायावी रावण की लंका
जल कर नष्ट भ्रष्ट हो जाती है।
और जो अपराध भगत कै करई।
राम रोष पावक सों जरई ।।
माँ सीता को सादर श्रीरामजी के
पास नहीं भेजने की अवज्ञा,
करने वाला रावण, तो भक्त नहीं,बल्कि
भक्तराज और ज्ञानिनामग्रगण्य
या कहिये भक्तशिरोमणि हनूमान् जी
के प्रति अपराध का दोषी है।
और नारायण! जलती है लंका तो
अग्निकाण्ड का कोई दोष नहीं
वह श्रीरामजी के रोष(क्रोध)से
जलती है।
जलती है तो जैसे इस बेचारी लंका
का कोई नाथ( स्वामी)नहीं।
इसलिये कि विश्वनाथ इसके
“जलने” और “जलाने” के मूल
में जो हैं।एक ऐसा भी स्थल है जो इस
अग्नि क्रिया से अबाध्य है।
और अबाध्य है तो अबध्य है वह
नाम है, राक्षसकुलभूषण
विभीषण
और उसकी कुटी
पलक झपकने के समय मात्र में
जली लंका।
जारा नगर निमिष एक माहीं।
एक विभीषण कै गृह नाहीं।।
और ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा
जरा सो तेहिं कारन गिरिजा।।
भगवान् उमाशंकर ने कहा कि वह
इसलिये नहीं जरा कि अग्नि के
उत्पत्ति कर्ता नारायण का ही वह
दूत जो है । अब सोचिये सर्वकारणकारण " सर्वशिक्षक" स्वयं "परमात्मा" के लीलावतार श्रीसीताराम की आज्ञा से पहुंचे रघुपति प्रिय भक्त भक्तशिरोमणि
जो इसके पहले सुरसा -लंकिनी
आदि को, शिक्षित करके अभी -अभी आये हैं , उनकी
शिक्षा न मानना दुष्फल ही देगा –
साधु अवज्ञा कर फल ऐसा ।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।
शिक्षकः शरणम् ।