सन्त हंस हैं।
साधना क्षेत्र में यह हंस तो
जीव है। हंस का अन्यार्थ जीव है।
और जीव कैसा कि विशुद्धान्तःकरण।
सन्त का मन, इनकी बुद्धि, चित्त और
अहं, ये चारों निर्मल होते हैं।सन्त स्वयं निर्मल होते हैं।
निर्मलता सर्वप्रथम मन की होती है।क्योंकि "सा विद्या या विमुक्तये"
इनमें प्रविष्ट है।
ये भी भगवान् की तरह करुणा
करके किसी भी योनि में पड़े जीव
को सद्यः मुक्ति दे देते हैं।
अत्यन्त विनय, धैर्य, और प्रेम की
प्रतिमूर्ति हैं सन्त।
ज्ञान विज्ञान सम्पन्न और वह
ज्ञान विज्ञान इनमें प्रविष्ट होने से
मुक्ति दाता हैं सन्त।
भगवान् ने अपने अवतरण का
कारण इन सन्तों को बताया-
विप्र धेनु सुर सन्त हित
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।। सन्तो का स्मरण, प्रभु सभी के अन्त
में करते हैं।
ऐसा लगता है कि, ये अपने पूर्व
के विप्र धेनु और सुर( देवता) सभी
के आधार हैं। सुन्दर काण्ड में प्रभुश्रीराम ने इन
सन्तों को अपना अत्यंत प्रीतिपात्र
कह दिया है।
भगवान् के “प्रेयान्” इन्हीं सन्त
जनों के लिये सविशेष, उनका
अवतार होता है।
विभीषण के लिये प्रभु ने कहा-
तुम सारिखे सन्त प्रिय मोरे।
धरौं देह नहिं आन निहोरे।।बालकाण्ड के प्रारंभ में बाबा इन सन्तों को हंस की उपमा देते हैं। संसार और शरीर तो जड़ प्रकृति का
अंश होने जड़ ही है।
प्रकृति सद् रजः तमः त्रिगुणमयी
होने गुण -दोष का कोष है।
लेकिन भगवान् के प्राणप्रिय ये सन्त
निर्मल हैं।
और बड़ी बात कि ये दूध को दूध और
पानी को पानी करने वाले हैं।
जो गुण “परमगुरु” ने “हंस” पक्षी
को दिया है।वह इनमें भी है।ये सन्त गोस्वामी जी की मति में हंस हैं तो इनके ऊपर विद्या की अधिष्ठात्री " सरस्वती"
तो विराजेगी ही। सरस्वती इन पर
हमेशा सवार है।और सारस्वत कृपातः ये अत्यंत
विनयी, विवेकी, और गुण-दोष का
पार्थक्य करने वाले हैं-
जड़ चेतन गुण दोषमय,
विश्व कीन्ह करतार।
सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार।।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्