आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी और ज्ञानी
ये सभी भगवान् के अनन्य भक्त हैं।
हम जैसे विषयी मलिन जीव तो
केवल श्रीहनुमान् जी नारद शुक
सनकादि जैसे अनन्य भक्तों का
ही स्मरण कर कृतार्थ हो सकते हैं।
लेकिन अन्तःकरण तो मलिन है।
भगवान् और उनके
प्राणप्यारे भक्त कैसे हृदय में बसें?
आँखे जगद् को ही देखती हैं।
अँखियाँ हरिदर्शन को प्यासी
कब होंगी?
संसार का रूप बसा है बरबस
बस,अब बहुत हो चुका प्रभु!
कानों में संसारी बातें प्रवेश कर
चित्त को मोहती हैं।
हटा दो , मिटा दो ,यह
संसारप्रियता
हे भगवद् भक्त अनन्य शरण!
किसी और नाम रूप को
कभी ध्यान में नहीं लाने वाले
रूद्रावतार प्रभु! भक्तराज!
अंजनीगर्भ-अम्भोधि-सम्भूत!
केसरीचारुलोचनचकोर!
चण्डकर-मण्डल- ग्रासकर्ता!
ऐसे अनन्य भक्त और साधु
सन्त के रखवारे
कृपा करो, कराओ अपने ही
हृदेश में राजाराम का दर्शन
किष्किंधा काण्ड में आपने
प्रभुश्रीराम को पहचान कर कहा था
कि आपके बिना आपकी दुस्तर
माया के पार कोई जा नहीं सकता-
नाथ जीव कर माया मोहा।
सो निस्तरै तुम्हारेहि छोहा।।
आप तो भगवान् के प्रियतम हैं।
ऐसे भक्त कि रामनाम स्मरण
करते करते “उन्हें” वश में कर लिया-
सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस करि राखे रामू।।
किष्किंधा पर्वत पर, तो भगवान् को
पहचान लेने पर आप प्रभुचरणशरण
हो गये थे-
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना।
सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।।
आप रोमांचित होकर कुछ बोल
नहीं पाए।
जिसकी रचना इतनी सुन्दर
वह कितना सुन्दर होगा।
आप देखते ही रह गये थे ।
“रहेउ ठटुकि एकटक पल रोके”
ऐसे विभीषण की तरह-
पुलकित तनु मुख आव न बचना।
देखत रुचिर बेस कै रचना।।
भगवान् ने आपको लक्ष्मण से भी
अधिक प्रिय कहा था-
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना ।
तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ।।
भगवती
जगदम्बा जानकी आशीष जो था-
आसिष दीन्ह रामप्रिय जाना।
होहुँ तात बलशील निधाना ।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू।।
बाबा ने कहा-
सेवक( भक्तसन्त) तो आपके नाम के
भरोसे रामभरोसे ।
जैसे कि माता के भरोसे पुत्र।
माता कभी भी अपने पुत्र को
विष का लड्डू देखकर उससे
छीन कर फेंक ही देती है, क्योंकि
वह पुत्र तो उस माता के भरोसे है।
आप भी संसारविषयविष को,
विषवत् हटाइये।आखिर मुझे इतनी
प्रीति क्यों?
हम आपके, आप हमारे
आप सेव्य हम सेवक ।
अब बाबा की बानी कुछ काम बनाती
दीखती है। हमारा संसार शोक
आपकी सेवा से मिटेगा-
सेवक सुत पति मातु भरोसे।
रहै असोच बनै प्रभु पोसे।।
मैं किसी अन्य देवादि की शरण
नहीं जाउंगा ।
समदर्शी हैं, सभी शरणागतों पर
अनुग्रह आपका स्वभाव है-
समदरसी मोहि कह सब कोऊ।
सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ।।
हरिः शरणम् ।। गुरुः शरणम् ।।