अरे,नाना शरीरों में अनेक युगों से
मलमूत्र का बर्तन ही तो ढो रहे हैं।
मेरी भवबाधा प्रभु! आप ही हर सकते हैं अथवा आपके प्राणप्यारे सन्त-
मेरी भव बाधा हरो राधानागरि सोय
सन्त इसलिये कि परम करुणा के
विग्रह हैं,वे।
“भक्तमाल” ग्रन्थ के अनुसार
सन्तों ने हाथी,ऊँट,सर्प, श्वान
आदि भोग योनियों में पड़े जीवों
को भी रामनाम सुनाकर मोक्ष दिया ।
तो हम परमार्थी जीवों पर कृपा करुणा
क्यों नहीं करेंगे।
अवश्य किया है करते हैं और करते ही
रहेंगे।
पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाऊ सहज खगराया।।
इन मुक्त सन्तो के अपने जीवन का
कोई स्वार्थ नहीं।
कारुणिक श्रीरामकृष्ण नारायण
की तरह इनमें भी करुणा हैं।
भगवान् करुणा वशीभूत हैं।किसी
अपने को दुखी देख नहीं सकते।
जिसने भी कह दिया मैं आपका हूँ।
आप तो रीझ ही जाते हैं।
आपका ही संकल्प है-
सब मम प्रिय सब मम उपजाये।
जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न
आपके सेवक सन्त साधु भक्त भी
आपसे अन्य नहीं हैं।
इसीलिये यह सन्त साधु अनन्य
कहे गए हैं।और इसी अनन्यता से
ये मुक्तात्मा आपकी तरह ही मुक्ति भी
बाँटते हैं।
ये मुक्त सन्त तुलसी कबीर
तो भगवदाज्ञा से धरती पर आये थे।
और आकर अपनी अमृत वाणी से
जीवों को अमरता दी।और दे भी रहे।
ये सभी –
बिना कारण कृपा करने वाले हैं-
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।
हे प्रभु! आपने गीता में गाया है-
सद् असद् च अहम्- 09
न सद् नासद् उच्यते-13
गुत्थी सुलझती नहीं।लेकिन लगता है,
“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”
संसार आपका कार्य है।और,
आप, तो सर्वकारणकारण
यह संसार आपकी भृकुटी के विलास
से जन्मता, विलीन होता है-
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई।
नारायण!
अनन्य भाव से भजने (सेवा जप
स्मरणादि करने)वाले महात्मा
अप्राप्त की प्राप्ति(योग) और
प्राप्त की सुरक्षा(क्षेम) आपके द्वारा
ही सहज पा जाते हैं।
प्रभु! आपका ही उक्त संकल्प है-
अनन्याः चिन्तयन्तो मां,
ये जनाः परि उपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहामि अहम्।।
अपने ही पूर्व श्रीरामावतार में भी आप
ऐसा ही उद्गार व्यक्त करते हैं।
जिसकी बुद्धि निर्मल है और विवेक
पूर्वक,
तस्य निःश्वसिता वेदाः
आपकी श्वास से जन्मे वेदों और
उसके आचारक सन्तों पर विश्वास
करते हुए, सियाराम मय सब जग जानी
का स्वरूप, जिन्हे दिखता है, वही
आपके,
अनन्य सेवक हैं।और
आप सर्वसेव्य।
अतुलितबल धाम श्रीहनूमान् जी
महाराज से आप बोल पड़े थे।
यह सचराचर जगत् मेरा(प्रभु का )
रूप मानने वाले और ऐसा मानकर
तदनुकूल आचरण करनेवाले,
अनन्य सेवक सन्त भक्त हैं,जिनकी
बुद्धि इसी बिचार पर दृढ है-
सो अनन्य असि जाकी,
मति न टरै हनुमन्त।
मैं सेवक सचराचर,
रूप स्वामि भगवन्त।।
गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम् ।