नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।
नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई
अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू
श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं
यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब
एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती
भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ
भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे
तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी
भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा
ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर
“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से
भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है
चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई
“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”
“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं
ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज
अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता
रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं
रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी
कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू
ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे
दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे
“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”
नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित
हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना
ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी
बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें
अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर
पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो
नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे
भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं
मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए
किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात
और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि
प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं
इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।
यह है “नाम स्मरण महिमा”
जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे
ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं
ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं
कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब
देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे
देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू
और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके
गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र
श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा
चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है
“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”
“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”
कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!
“मायापति के “सेवक” के साथ माया”
असम्भव असम्भव असम्भव
और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा
“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया
भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं
करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते
नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं
” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”
“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”
जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा
भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं
भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही
देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।
भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।
“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का
साधन देकर अपराधी को बचा सका है
भगवान् तो
मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई
यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो
“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”
अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा
अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई
भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं
राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी
और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है
सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।
कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है
सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू
सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी
बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ
अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-
चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"
गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्