अचर सचर चर अचर करत को

भगवान् और केवल भगवान् को ही
चाहने वाले भक्त एकाकार एकरस
अनन्तरूप आनन्दैकघन चिन्मय परम
प्रेमास्पद अमृतस्वरूप सर्वसुखकारी
और सीमातीत होते हैं।आत्माराम और
आत्मक्रीड भी हो जाते हैं
” मत्तः भवति स्तब्धः भवति आत्मरामः
भवति”
तात्पर्य यह कि जिन सन्तो भक्तों सेवकों
भगवदनुरागी जनों का अन्तःकरण ही
भगवान् स्वाकृष्ट कर लें अथवा चुरा लें
उनकी जगद् गति अवसित हो जायेगी।
“जगद् गति नष्ट तो भगवद् गति उदित”

नहि स्वात्मरामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति
इसीलिए ऐसे भरतादि सरीखे भक्त तो
नारद जी के मत में ऐसी भक्ति पा जाते
जो “परमप्रेमरूपा अमृतस्वरूपा च”
की सीमातीत श्रेणी है।सोचिये ,भरत
का मन-बुद्धि-चित्ताहंकार भगवान् में
चला गया और भगवद् रसैकघन होकर
ऐसी विस्मय दशा को प्राप्त हैं कि उन्हें
जो देखता है वह जड़वृक्षादि चेतन प्राणी
की तरह आनंद पा रहा और चेतन तो
भरत को जड़वत् निहारता है।

मुनि सिद्ध देवगण तक भरत की दशा
सिहाते हैं। राम नाम लेकर जब भरत
लम्बी साँस लेते हैं,तब वातावरण में प्रेम
ही प्रेम उमड़ पड़ता है।
वज्र और कठोर पत्थर जैसे जड़ का
हृदय चेतन की तरह द्रवित हो जाता है

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं।
दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।
जबहिं राम कहि लेहिं उसासा।
उमगत प्रेमु मनहुँ चहुँ पासा।

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पसाना।
पुरजन प्रेम न जाइ बखाना।।

स्रक् चन्दन बनितादिक भोगा।
देखि सरस विसमय सब लोगा।।

जितने जड़ वृक्षादि और जीव जन्तु रास्ते
में पड़े, वे परमप्रेमी अमृतवत् भरत को
देखकर सद्यः जीवन् मुक्ति पाकर मनुष्य
की तरह ही ” परम पद वैकुण्ठ” के ही
अधिकारी हो गये
जड़ चेतन मग जीव घनेरे ।
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ।
ते सब भए परम पद जोगू ।
भरत दरस मेटा भव रोगू ।।

और यहाँ बड़ी बात ये कि भक्त भरत
राममय तथा श्रीराम जी भरतमय हो
गए हैं । परस्पर भगवान् और भक्त एक
दूसरे का स्मरण कर रहे हैं।
यदि भक्त भगवान् मय हो गया तो उसमें
और भगवान् में अन्तर क्या?
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं।
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं।।
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता।
कस न होइ मगु मंगलदाता।।
सबसे बड़ी बात यह भी कि भक्त और
भगवान् का नाम स्मरण जो एक बार
कर ले तो वह भाग्यशाली जन भी तद्
वत् होकर किसी दूसरे को भी भवसिन्धु
से पार करा देने में समर्थ हो जाय –
बारक राम कहत जग जेऊ।
होत तरन तारन नर तेऊ।।
भरत जैसे भक्त की अवर्णनीय अवस्था
देख कर जड़वृक्षादि पशु-पक्षी भी प्रेम
से सराबोर हो गये।
देखि भरत गति अकथ अतीवा।
प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

आकाश से फूल बरसने लगते हैं।सिद्धों
साधकों में अनुराग उमड़ आता है।
सभी भरत के अद्वितीय परम प्रेम को
सराहने लगते हैं। क्योंकि यह तो कोई
ऐसा असाधारण अनन्य प्रेम है कि
जड़ जीव चेतन की तरह आनन्द की
अभिव्यक्ति करते हैं। और चेतन सिद्ध
मुनि गन्धर्वादि प्रेममूर्ति भरत को एकटक
देखते हुए वृक्ष की तरह जड़ बन गए।
भगवान् भरतादि सरीखे प्रेमी को अपना
कर ऐसी कृपा कर देते हैं कि कृपाप्राप्त
भक्त भी कृपालु बन जाता है।
राम कृपा नहिं करहिं तसि।
जसि निष्केवल प्रेम।
इसलिये गोस्वामी जी ने कहा कि यदि
भरत जैसा प्रेमी पैदा न होता तो प्रभु
को छोड़ कर कौन जड़ को चेतन एवं
चेतन को जड़ बना सकता था।
भरतदर्शन भी कृपालु प्रभु की तरह बन
गया।भगवान् जैसे ही इन्हे देखकर
चराचरात्मक जगत् उलट-पुलट
जा रहा है।

होत न भूतल भाउ भाउ भरत को
“अचर सचर चर अचर करत को”


गुरुः शरणम् हरिः शरणम् ।

भरत हृदय अति प्रेमु

राम-प्रेम-विरह-व्याकुल भरत जैसे-जैसे
चित्रकूट के समीप आते जा रहे हैं, अति
आनन्द उमगि अनुरागा होते जा रहे हैं।

“अति” प्रेम अनुराग आनन्द, केवल
भगवान् और भक्त के लिये ही प्रयोग हो
सकता है । इनके अतिरिक्त किसी दूसरे
के लिए नहीं । इसलिये कि इसमें किसी
अन्य का प्रवेश नहीं।
रावण वध के बाद जब प्रभु अयोध्या आकर विराजते हैं,तब सभी उपस्थित
लोकों से अनेक रामरूप धर कर एक
साथ सबके गले लगे हैं।
सर्वशक्तिमान सर्वकारणकारण जो हैं।
अति शब्द तो भगवान्-भक्त के मध्य ही
संगत है। क्योंकि “अति” अतीन्द्रिय शक्ति
वालों का विपरिणाम है।
लंका में माँ सीता द्वारा हनुमानजी को
रामप्रिय जानने पर, करहुँ बहुत रघुनायक
छोहू काआशीष मिलते ही पवनपुत्रप्रेम में
डूब कर “अति”आनन्दानुभूति करते हैं
” करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना” वानरराज
सुग्रीव भी इसी”अति” प्रेमदशा के शिकार
“मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा”
हनुमानजी महाराज भगवान् के चरणों
में प्रेममग्न ऐसे पड़े हैं, कि प्रभुचरणों को
छोड़ना ही नहीं चाहते। रुद्रावतार हैं जो
उमाशंकर तो इस स्वरूप को देख कर
इसी “अति” प्रेम में डूबे।
“रुद्र देह तजि नेह बस बानर भे हनुमान्”
प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा

इसके पहले की घटना भी “अतिप्रेम”की
साक्षी है, जब
लंका में हनुमान् जी द्वारा रघुनाथ जी का
सन्देश सुनकर जगदम्बा जानकी ऐसी
ही “अति” प्रेम मग्न (प्रेम में डूबी) दशा
को प्राप्त हैं,कि शरीर तक की सुध नहीं
प्रभु सन्देसु सुनत बैदही
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही

नारायण !क्या कहें रावण का भेजा दूत
बेचारा “शुक” कपटकौटिल्य भूल गया।
प्रेममूर्ति श्रीरामलक्ष्मण के दर्शन मात्र से
प्रेमी बन गया।प्रभुगुणों का कायल और
विक्षिप्त होकर प्राकृतिक देव-दुराव ही
विस्मृत कर बैठा-
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ
अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ

इधर चित्रकूट में अतिप्रेमी भगवान्,भरत
के शील-गुण-स्वभाव को कहते हुए इसी
तरह प्रेमसमुद्र में मग्न(डूबे)हैं –
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ
प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ

देवताओं द्वारा भरत को धर्मधुरीण और
और कविसमूहों द्वारा अवर्णनीय चरित्र
वाला कहा गया।राम ही जान सकते हैं
अतिप्रेमी भरत को।देवताओं की इस
बात पर सीतारामलक्ष्मण “अति” सुखी
अवस्था को प्राप्त हैं-
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी
अति सुख लहेउ न जाइ बखानी

भगवद् भक्त नारद जी फिरत सनेह मगन
सुख अपने नामप्रताप सोच नहिं सपने
होकर भावभक्तिविभोर हो जाते हैं और
अपने “भक्तिसूत्र “मे वे भी इस
“अतिप्रेम” दशाको भगवान् भक्त के
मध्य ही संगत मानते हैं,क्योंकि भक्त
अपने किसी भी कार्य से भगवान् के
सुख में ही सुखानुभूति करता है
तदतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं।
” अंशी-अंश ” तभी तक अलग जब तक
नारद से भेंट न हो।
“तत्-सुख-सुखित्वम् “
संसार-सुख-सुखित्वम् नहीं

चित्रकूट की जिस धरती पर धरतीपुत्री
सहित श्री रामजी बिराजे हैं,वहाँ पर्वत
की शोभा का कहना ही क्या

ऐसा लगता है कि तपस्वीजनों ने अपनी
सारी तपस्याऔर नियम धर्म के पालन
का सम्पूर्ण फल ही पा लिया है।
भरत जी का हृदय “अतिप्रेम ” में डूब
जाता है। गोस्वामी जी बोल पड़ते हैं
तापस तप फलु पाइ जिमि
सुखी सिराने नेमु
राम सैल सोभा निरखि
“भरत हृदय अति प्रेमु”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

कबि-कुल अगम भरत-गुन-गाथा

श्रीरामलीला के अद्वितीय पात्र और
त्रपा(लज्जा) की मूर्ति श्रीभरत के
गुणों का वर्णन अनेकानेक सहृदय
धुरीणों काव्य-कला-शिल्प-प्रवीणों
रस-सिद्ध-कवि-वृद्धों के लिए अत्यंत
कठिन है।

भरत अयोध्या का राजपद मिलने
की बात से व्यथित हैं।अत्यंत-अत्यंत
लज्जालु हैं ,क्योंकि कि यह राजपद
तो श्रीराम का है।
जो वस्तु-पद-पदार्थ अपने नहीं वे
निश्चित रूप से सपने भी नहीं।
भरत तो श्रीराम-पद के अधिकारी हैं।
उन्हे मद है तो श्रीरामपदों (चरणों)का।
वह अपने को श्रीराम का सेवक मानते
हैं।अभिमानशून्य उन्हें अभिमान भी है
तो राम के सेवक होने का –
यह अभिमान जाय जनि भोरे
मैं सेवक रघुपति पति मोरे
अब एक विशेष बात यह है कि
जब राजपद श्रीराम का तब त्याग कैसा
लेकिन यह रहा सूक्ष्म विचार।

यदि लौकिक रीति से सोचें तो राम और
लक्ष्मण के वन जाने पर भरत जी को
राजपदसँभालना चाहिए।
लेकिन भरत तो रामपद के अनुरागी हैं
रामचरणों के लिये मतवाले भरत को
श्रीराम के एक नहीं दो-दो पद(चरण)
मिलने हैं, तब एक पद अच्छा कि दो
पद? कहते हैं भरत –
समुझि मोरि करतूति कुलु
प्रभु महिमा जिय जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद
जग बिधि बंचित होइ।
और भी कहते हैं कि ऐसी संपत्ति
सुखपूर्ण भवन मित्र पिता-माता सब
आग में जल कर भस्मसात् हो जाय
जो “रामपद”के सामने राजपद की इच्छा
करै –
जरउ सो संपति सदन सुख
सुहृद मातु पितु भाइ
सनमुख होत जो रामपद
करै न सहस सहाइ
और इसलिये कहा गया कि भरत जी के
गुणों को जानना और वर्णन करने का
सामर्थ्य केवल रामजी में है। कोई भी
कवि-कुल-निकर कर नहीं सकता भरत
के गुणों का वर्णन –

को जानइ तुम बिनु रघुनाथा
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्

भरत सरिस को राम सनेही

भरत के समान सेवक भक्त यदि कोई
नहीं तो भगवान् के समान कोई सेव्य भी
नहीं। और बड़ी बात ये है कि प्रपन्न भक्त
यदि सेव्य भगवान् के अधीन है तो भक्त
सेवक भी उसी तरह।
राम अपने भक्त सेवक साधु सन्त हित
हेतु ही अवतरित हैं
विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निरमित तनु माया
गुन गो पार। देखिए –

गोरूप धरती के उद्धार हेतु वाराह,तो
“सर्वं खलु इदं ब्रह्म” सर्वत्र भगवत् सत्ता
सिद्धि के लिए खम्भे से वरानुकूल और
वधानुकूल नरसिंह रूप धारे ।

द्वापर में शक्ति-शक्तिमान् अभेद और
और “रसो वै सः” तथा अनन्यशरणागति
के गहरे-प्रेम-पीयूष में उतारने के लिये
कृष्णावतार धारा

त्रेता में पुत्र पिता माता भ्राता राजा-प्रजा
की मर्यादा स्थापना हेतु और सतत नाम
स्मरण की महिमा से ऊँच नीच जाति
वर्ग भेद भ्रान्ति मिटते ही सर्वोद्धार के
स्वकीय संकल्प की पूर्णता सिद्ध की।

यदि भक्त पर रीझ कर लौटे
तो इन्द्रादि देवों पर विपत्ति पड़ेगी
अधीर इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति से राम
भरत मिलन में बाधा डालने का आग्रह
होने पर, गुरु ने इन्द्र को समझाया है

बेटा! इन्द्र किसी को भी भक्त-भगवान्
के बीच नहीं पड़ना चाहिए।क्योंकि इससे
तुम्हारी समस्या सुलझेगी नहीं बल्कि
उलझ सकती है।
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भरत
अकाजु।अजसु लोक परलोक दुख दिन
दिन सोक समाज।।

सेवक से बैर का भाव सेव्य के प्रति
विरोध होगा-मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैरु बैरु अधिकाई।

यद्यपि भगवान् तो सदा एकसमान एक
रस सच्चिदानन्द घन हैं, उनका किसी के
प्रति राग-रोष रखने और पाप-पुण्य को
ग्रहण करने का स्वभाव ही नहीं है।
फिर भी संसार अपने भावरुचि के
अनुसार कर्म-स्वातन्त्र्य के अधीन है।
कर्मानुकूल परिणाम भी सिद्ध है-

जद्यपि सम नहिं राग न रोसू
गहहिं न पाप पूनु गुन दोसू
करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फल चाखा

फिर भी लोग रसना नेत्र कर्णादि इन्द्रियों
से शुद्ध-अशुद्ध आहार लेते हैं,क्योंकि
सभी के हृदय , भक्त-अभक्तरूप हैंं।
दो तरह के प्राणी सृष्ट कराये प्रभु ने।
एक देव और असुर –
द्वौ इमौ भूतसर्गौ लोकस्मिन्
दैवः आसुर एवच।।
गोस्वामीजी ने समर्थन किया है
“तदपि करहिं सम बिसम अहारा
भक्त अभक्त हृदय अनुसारा”

ऐसे, भगवान् भक्त के प्रेमबस निर्गुण
होकर सगुण बन जाते हैं। जबकि वे
निर्लेप अमानी और सदैकरस ही हैं –

अगुन अलेप अमान एकरस
राम सगुन भए भगत प्रेमबस

वे तो सेवक अभिलाष पूर्ति के लिये
प्रसिद्ध हैं। “प्रभु का मान भले टल जाये
भक्त का मान न टलते देखा”
अर्जुन के लिये अपना संकल्प तोड़ना
इन्हीं भक्तप्रिय भगवान् का कार्य था।

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी
प्रतिज्ञा क्या?
नारायण ! ये तो परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम् ,धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे है।

जब जब होइ धरम कै हानी
बाढ़हि अधम असुर अभिमानी
तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा
हरहिं सकल सज्जन भव-पीरा

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।तदा तदावतीर्याहं करिष्यामि
अरिसंक्षयम्। ही इनकी संकल्पलीला।

ऐसा संकल्प और वह भी “उनका”
संकल्प वस्तुतः “उन्ही” का पूर्ण होता है
इसलिये कि नानात्मक जगत् में “वही”
सभी रूपों में भासते हैं।

मायापति के साथ माया मलिन बुद्धि का
संकेत है।इन्द्र जो ठहरा “भोगी”
भक्त इसके ठीक विपरीत “योगी”
परदुःखकातर भक्त-भगवान् सभी के
लिये मंगल ही करनेवाले हैं।
दोनों से डरना ठीक नही –
अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई
राम भगत पर हित निरत
परदुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल।।

अब भरत और राम स्वभाव जानकर कि
ये तो सभी के कल्याण कर्ता प्रसिद्ध हैं
इन्द्र का दुख समाप्त हुआ।फूलों की वर्षा
और भरत की सराहना होने लगी –

सुनि सुरबर सुरगुरु बरबानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ
लगे सराहन भरत सुभाऊ

और देखिये, श्रीराम-भरत मिलन होने
पर लौट चलने का आग्रह अवश्य
भरत द्वारा होता है। किन्तु
भगवान् अपने भक्त की प्रसन्नता चाहते
हैं, तो भक्त भगवान् की।
क्योंकि दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक
हैं। “प्रभु” होने से सर्वत्र व्याप्त-सत्ता
और सार्वत्रिक दृष्टि वाले भगवान् ही
उचित निर्णय ले सकते हैं।अतः वह भक्त

जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुणासागर कीजिअ सोई।।
कहकर अयोध्या का “एकपद” राजपद
त्याग कर सर्वसमर्थ श्रीराम के दो-दो
पदों में अनुरक्ति व्यक्त करता है। और
देवगुरु बृहस्पति ने भरत
जैसे विरागी और केवल रामानुरागी के
प्रति अपराध करने पर रामक्रोध में जल
कर नष्ट होने का भी संकेत किया है
जो अपराधु भगत कर करई ।
राम रोष पावक सो जरई ।। अनन्तर
इन्द्र को भरत का रामस्नेह और राम का
भरतस्नेह समझाया गया

जगु जप राम राम जपु जेही

“भरत सरिस को राम सनेही”
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

सकल धरम धुर धरनि धरत को

भरत तो सम्पूर्ण धर्म रूपी रथ-चक्र की धुरी हैं। मातृ-पितृ  गुरु अतिथि गृह-कुटुम्ब  समाज राज्य तथा स्वयं के मानवीय धर्म का शास्त्र-सन्त-दर्शित मार्ग पर चल कर कौन आचरण-शिक्षक  बनता?

  यदि श्रीरामलीला में “भरत-उद्भव” नहीं होता? अयोध्या से  प्रस्थान  करने वाले भरत को विरोधी मान, भरत पर शर-सन्धान करने वाले, श्रीलक्ष्मण को आकाश में स्थित आकाशवाणी द्वारा ऐसा नहीं सोचने के लिये समझाया गया है ।आकाश में रह कर श्रीरामलीला को पल-पल देख रहे, देवताओं के  अनुरोध को सुनकर श्रीलक्ष्मण जी संकुचित होते हैं । सीता जी एवं राम जी का खूब आदर सम्मान करते हैं-

   “सुनि सुर बचन लखन सकुचाने , सीयँ राम सादर   सनमाने” 

और संकुचित होने पर भी सहसा कोई निर्णय नहीं लेने की “नीति” की सराहना तो की,लेकिन यह भी   स्वीकारा कि राजमद बड़ा कठिन है ।

कही तात तुम्ह नीति सुहाई सबसे कठिन  राज-मदु  भाई

जिन सौभाग्यवन्तों को सन्तों की सभा की सन्निधि और सेवा नहीं मिली वे तो “राजमद” की “मदिरा” का  “आचमन” करके “मद-मत्त” होंगे ही 

जो अचवँत नृप मातहिं तेई नाहिन साधुसभा जेहिं  सेई ”

नारायण ! ब्रह्मा की पांचभौतिक सृष्टि  में “भरत” जैसा भला कोई सुनाई  और  दिखाई   पड़ा ?

सुनहु लखन भल भरत  सरीसा विधि प्रपंच महँ सुना न दीसा”

प्रातः काल का तरुण “अरुण” तो हो सकता है तिमिर (अन्धकार)में मिलकर गल जाये आकाश मन करे मगन होकर मेघों में समा जाये गाय के खुर समान गड्ढे के जल में  ” अगस्त्य ऋषि ” चाहे डूब ही जायें प्राकृतिक क्षमा गुण को धरती माँ छोड़ दे मच्छर  के मुँह से निकली एक फूँक से सोने का पर्वत “सुमेरु” भी हो सकता कि आकाश में उड़ जाये।

    “तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई, गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी, सहज छमा बरु छाँड़ै  छोनी

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई, होइ न नृपमदु भरतहिं  भाई  

“भरत को राज सत्ता का मद नहीं हो सकता”  पिता दशरथ और लक्ष्मण दोनों की एक साथ सौगन्ध है कि भरत जैसा पवित्र भ्राता हो नहीं सकता

    “लखन तुम्हार सपथ पितु आना, सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना”

गुण रूपी क्षीर(दूध) और अवगुण रूपी जल एक  साथ जैसै मिले हैं उसी तरह पंच तत्वों को परस्पर  मिला कर ब्रह्मा ने सारे संसार के पद-पदार्थ बना डाले हैं ।   

     ” सगुनु खीरु अवगुन जल ताता, मिलइ रचइ  परपंचु बिधाता”

लेकिन भरत सूर्यवंशतालाब के “हंस” हैं, जिसकी प्रकृति ही दूध-पानी को  पृथक् करने वाली है    

   “भरत हंस रबिबंस तड़ागा, जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा”

    नारायण ! समुद्र के क्षारीय जल को मेघ ग्रहण करके, जब बरसाता है तब धरती पर पड़ा जल गन्दा हो जाता है, जैसे “जीव” से “माया” मिल जाती है। लेकिन साधुसन्त महात्मा की प्रकृति है कि वह जीव की “माया-माटी” को  “जीव” से अलग कर उसे “अमायिक” बना कर निर्मल-जल के समान निर्विकार-मन  वाला बना देते हैं-

    भूमि परत भा ढाबर पानी, जिमि जीवहिं माया लिपटानी  

भगवदीय गुणों वाले साधु भगवदीय प्रकृति वाले हैं । वे जड़ को चैतन्य करनेवाले हैं –

    जड़हिं करइ चैतन्य जो”

फलतः जीवात्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप पा लेता है।भरत भी ऐसे ही हंसवत् सन्त हैं, जो मायिक विकारों  का अपहरण (परिहरण) कर लेते हैं –   सन्त हंस गुन गहहिं, परिहरि बारि बिकार”

भरत का हंसत्व और सन्तत्व सिद्ध है क्योंकि इन्होंने अपने यश से एक अद्भुत प्रकाश बिखेरा है,जिससे सारा जगद् प्रकाशमय है-  गहि  गुन पय तजि अवगुन बारी, निज जस जगत कीन्ह उजियारी”

भरत  के गुण-शील-स्वभाव को कहते नारायण! नारायण प्रेम-पयोधि में डूब ही गये – 

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ, प्रेम-पयोधि मगन   रघुराऊ

 भगवान्  की दशा देख कर और उनकी भरत के प्रति प्रीति समझ कर ऋषि-मुनि  देवगणों सहित सभी ने भरत के परहेतु ( जैसे साधु पर कार्य साधन) हित उत्पति को सराहा है । करुणासिन्धु  कृपायतन भगवान् भी सभी भक्तों द्वारा सराहे गये-

   सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु, सकल सराहत राम सो प्रभु को  कृपानिकेत

  इसीलिये भरत को समस्त धर्मों का धुरन्धर कहा गया –

  जौं होत जग जनम भरत को, सकल धरम धुरि धरनि धरत को”

  गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

छीरसिन्धु बिनसाइ

भले क्षीरसागर अपना मूल स्वभाव
बदल कर विशेष रुप से नष्ट ही क्यों
नहो जाये, भरत की रामभक्ति तो
अविनष्ट ही रहेगी।

भरत को राजसिंहासन का मद नहीं
हो सकता।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश जैसा पद भी मिले
तब भी भरत को अभिमान होना
असम्भव है।

खट्टे दही मट्ठे की एकबूँद से समुद्र
का खारा जल खट्टा हो सके तो हो
जाय, किन्तु भरत को राजमद नहीं
हो सकता।

भरत जी श्रीराम सेवित मार्ग से अत्यंत
व्याकुल होकर चले जा रहे हैं,लेकिन
उनका दर्शन कितना पवित्र है

जैसे इन्हें देखकर सभी का सौभाग्य
खुल गया है, मानो यह भरत नहीं बल्कि
चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग ही
जा रहा है –
भरत दरसु देखत खुलेउ
मग लोगन्ह कर भाग
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ
बिधि बस सुलभ ” प्रयाग”

प्रत्येक गाँव में ऐसा आनंद छा जाता
जेसे मरुस्थल में कल्पवृक्ष ही आगया-

अस अनंदु अचिरजु प्रति ग्रामा।
जनु मरूभूमि कलपतरु जामा।।

भरत की विह्वलता देख कर रास्ते में
माताएं परस्पर कहती हैं कि अति
रागानुरागिणी कैकेयी जैसी माता,

अत्यंत वैराग्यशाली भरत की माता
होने योग्य नहीं हैं-

सुनि गुनि दसा देखि पछिताहीं।
कैकई जननि जोगु सुतु नाहीं।।

मार्ग में पड़ने वाले प्रत्येक तीर्थ
मुनियों के आश्रम,देवस्थानों में
स्नानशुचि होकर, प्रणाम निवेदित
करते हुए प्रभु को सुमिरते,

मन ही मन श्रीसीताराम
पद-प्रेम की याचना करते और
सभीसे श्रीराम-गुण-श्रवण करते
चल रहे हैं –

निज गुन सहित राम गुन गाथा।
सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा।
निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनाम।।

मन ही मन माँहहिं बरु एहू
सीय-राम पद पदुम सनेहू।।

आसपास के ग्रामवासी उमड़ पड़ते हैं
प्रभु राम का समाचार सुनाते हैं।
भरत को देख कर सारे जन्म के
प्राप्तव्य धर्मार्थकाममोक्ष को मानो

एक साथ पा जाते है-

करि प्रनामु पूछहिं जेहि जेहीं।
केहि बन राम लखनु बैदेही।।
ते प्रभु समाचार सब कहहीं।
भरतहिं देख जनम फलु लहहीं।।

और सबसे बड़ी बात इस यात्रा की
नारायण!कि जो लोग यह कहते कि

हम लोगों ने अनुज लक्ष्मण के साथ
श्रीराम को देखा है, वे सभी नर-नारी

श्रीभरत जी को सीता-राम-लक्ष्मण
के समान दिखाई पड़ते हैं-

“जे जन कहहिं कुसल हम देखे
ते सिय राम लखन सम लेखे”

नारायण !भरत जी का रामप्रेम ऐसा है
कि हजार मुखों वाले शेषनाग भी इस
प्रेम का वर्णन करने में असमर्थ हैं।

अहन्ता ममता से मलिन मन वाले
अभागे लोग क्या कहेंगे, ब्रह्मसुख तो
इन्हें सम्भव नहीं, नारायण!

भरत जी का प्रेम क्रान्तदर्शी कविगणों
के लिए भी अप्राप्य-अगम्य है-

भरत प्रेमु तेहि समय जस
तस कहि सकइ न सेषु
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु
अह मम मलिन जनेषु

उधर श्रीसीता जी को स्वप्न हुआ है कि
परिकरों सहित भरत जी हमारे मार्ग
का अनुसरण करते हम सभी के पास
आरहे हैं।
सीता जी के सपने को सोच कर
सभी के सोच-विमोचन राम जी भी
सोचवश हो गयेहैं।
“नरलीलानाटक ” का खेल
जो खेल रहे हैं।

लक्ष्मण से इस स्वप्न को किसी
अनचाही समस्या के रूप में बताते हैं

लखन सपन यह नीक न होई।
कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।

बहुरि सोचबस भे सिय-रवनू।
कारन कवन भरत आगवनू।।

किसी ने उनके साथ चतुरंगिणी सेना
होने की बात कह दी।

एक आइ अस कहा बहोरी।
सेन संग चतुरंग न थोरी।।

राम जी को सोच है तो समाधान भी
हो जाता है।सबके सोचविमोचन हैं। "भरत साधु-शिरोमणि हैं "

“और साधुमात्र तो स्वयं में कोई
समस्या नहीं बल्कि समाधान है “

समाधान तब भा यह जाने
भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।

लक्ष्मण जी ने कहा भैया! आप तो
ऐसे हैं कि, सभी को अपने जैसा
समझ बैठते हैं।

सब पर प्रीति प्रतीति जियँ।
जानिअ आपु समान।।

भरत साधु सज्जन तो हैं, लेकिन
राम-राज्य पाकर धर्म-मर्यादा को
विस्मृत कर बैठे हैं –

भरत नीतिरत साधु सुजाना।
प्रभुपद प्रेम सकल जग जाना।।

तेऊ आजु राम पदु पाई।
चले धरम मरजाद मेटाई।।

लगता है निष्कंटक राज्य पाने हेतु
मन में अनुचित विचार कर
आरहे हैं –

कुटिल कुबंधु कुअवसर ताकी।
जानि राम बन बास एकाकी।।
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू।
आए करै अकंटक राजू।।

लक्ष्मण जी सरोष होकर तीर-धनुष
सँभालते हुए दोनों भाईयों
श्रीभरत जीऔरशत्रुघ्नलाल को
समर-भूमि में एक साथ सुला देने
का आदेश माँगते हैं-

आजु राम सेवक जसु लेऊँ।
भरतहिं समर सिखावनु देऊँ।।
राम निरादर कर फलु पाई।
सोवहुँ समर सिखावनु देऊँ।।

शिव भी उनके साथ सहयोग करें
तो भी श्रीराम की दोहाई है,
रण में उन्हें मार ही डालूँगा –

जौं सहाय कर संकरु आई।
तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
अब इस प्रकार की

लक्ष्मण की भ्रम-लीला के विभ्रम
वश देवताओं ने आकाशवाणी की है।
समझाया है देवों ने

“अनुचित उचित काजु किछु होऊ
समुझि करिअ भल कह सब कोऊ “

वेदों ने ऐसे बोध-वाले लोगों को
प्रबोधवान् नहीं कहा है, जो सहसा
कोई अविचारित काम करके
पाछे पछताते हैं-

” सहसा करि पाछे पछिताहीं
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं”

“सहसा विदधीत न क्रियाम्
अविवेकः परमापदाम् पदम्” इत्यादि महाभारत कथाधारित भारवि रचित

“किरातार्जुनीय” में पाण्डवों को
द्रौपदी नेभी यही समझाया था।

और इसीलिये, लक्ष्मण जी को भी
भरत का शील-स्वभाव बताया जाता है

कि भरत को राजसत्ता का अभिमान
नहीं हो सकता।

चाहे “देवत्रितयी” जैसा पद ही क्योंन
दे दिया जाय।

खारे समुद्र के गाम्भीर्य का परीक्षण
करने के लिए उसमें अति खट्टी दही
मट्ठे की बूँदें(काँजी )डालकर

कभी भी “उसको” खट्टे स्वाद में बदला
नहीं जा सकता।

“भरत भी भक्ति के अथाह गम्भीर
सागर हैं”

अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड के सुख
साम्राज्य वैभव को देकर भी भरत
के मन में क्षण भर के लिए भी कोई
विक्षोभ-हलचल नहीं पैदा की
जा सकती है –

” भरतहिं होइ न राजमदु”

विधि-हरि-हर सन पाइ कबहुँ की काँजी सीकरनि छीर सिन्धु बिनसाइ

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

शुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना

“भरत जैसा मन वचन कर्म से पवित्र
कोई अन्य नहीं हो सकता
यह बात लक्ष्मण और पिताश्री
दशरथ की “शपथ” खाकर मैं राम
कह रहा हूँ”

नारायण ! भगवान् श्रीराम सौगन्ध
खाकर भरत की पवित्रता का
प्रमाण-पत्र देते हैं।

अब देखिये, गोपियों ने भगवान् से
कहा था, कि मेरे( जीवों के )प्रिय!
आप सभी के हृदय में राजते हैं।

शरीरान्तर्वर्ती आप हैं इसलिये सारी
इन्द्रियाँ क्रियाशील हैं।

किसी का कैसा भी कोई भी शरीर
हो आप के रहने से ही परस्पर

पति-पत्नी, पिता-माता-पुत्रादि के
संसार के सारे सम्बन्ध रहते हैं।

और आपके शरीर से हटते ही
सारी चेतना लुप्त हो जाती है

शरीर केवल पार्थिव (मिट्टी) रूप में
अवशिष्ट बचता है।

फिर ऐसे शरीरों से किसी को प्रेम
नहीं होता।

वस्तुतः सभी आपसे ही प्रेम करते हैं
प्रेम मानते हैं,बस आपको जानते नहीं

इसलिये आप ही सभी शरीरों के प्रिय
नहीं बल्कि अतिप्रिय(प्रियतम) हैं।

” प्रेष्ठो भवान् तनुभृतां
किल बन्धुरात्मा “

भगवान् के शरीर में विराजते रहते
प्रत्येक का परस्पर सांसारिक
सम्बन्ध अक्षुण्ण है।इसलिए हर एक व्यक्ति आपस में परम प्रभु! प्रियतम! आपसे ही वस्तुतः व्यवहार करता है।

“हाँ यह अवश्य है कि हम आपकी ही
माया से ग्रस्त मलिन अन्तःकरण
के कारण और संसार ही प्रिय
लगने के कारण सभी शरीरों में
अन्दर से व्यवहार करनेवाले आपको
पहचान नहीं पाते”"हमारा अन्तः करण अर्थात् मन बुद्धि चित्त और अहंकार अशुद्ध रहने से आपको नहीं पहचानने का भयंकर संकट है" "लेकिन भक्त ,सेवक और साधु के जीवन का यह संकट कभी नहीं " संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बल बीरा भक्तिमूर्ति सीता , अनन्त बलवन्त हनुमन्त और श्रीभरत जी के जीवन का यह संकट कदापि नहीं है

बल्कि इन सभी का स्मरण इस
मलिन अन्तःकरण को पवित्र
कर देने वाला है।

श्रीभरत तो ऐसे पवित्र अन्तःकरण
के हैं कि राज्य भार धारण का
प्रस्ताव सुनकर व्यथित हो जाते हैं

“सानी सरल रस मातु बानी सुनि
भरत व्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत
विरह उर अंकुर नए”

श्रीराम का वनगमन जान कर
पिता की मृत्यु विस्मृत हो उठती है

” भरतहिं बिसरेउ पितु मरन
सुनत राम बन गौनु”

और विकलता ऐसी कि तत्क्षण
अविस्मृत अविरल स्मृत श्रीराम
के चरणों लिए दीन-हीन हो जाते हैं

सबको प्रणाम करते हुये बताते हैं कि
बिना श्रीरघुनाथ जी को देखे हृदय
की जलन शान्त नहीं होगी-

आपुनि दारुन दीनता
कहउँ सबहि सिरु नाइ
देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ

“ऐसा है ज्ञान स्वरुप श्रीराम का ज्ञान
श्रीभरत जी को, क्योंकि उनका तो
मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार श्रीराम
रामाकारकाराकारित है”इसलिये भगवान् ने लक्ष्मण से कहा था कि भरत की आँखों में संसार बसा ही नहीं है। उसके रोम-रोम में मैं(राम) बसा हूँ।

और इसीलिए भरत
मन-वचन-कर्म से इतना निर्मल है कि

पिता श्रीदशरथ और
लक्ष्मण का शपथ लेकर भी
यह बात कहने में
मुझे कोई संकोच नहीं –

लखन तुम्हार सपथ पितु आना

“सुचि सुबन्धु नहिं भरत समाना “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

भरत हंस रबिबंस तड़ागा

सूर्यवंश में जनमे भरत जी “हंस” के
समान हैं।
यह सूर्यवंश मानो सुन्दर तालाब है
जिसमें विचरणशील भरत एक हंस
के समान हैं।हंस पर तो वाग्देवी सरस्वती विराजती है, जो बुद्धि की अधिष्ठात्री है। अतः भरत का राज्य पद ठुकराना और श्रीराम को लौटाने चलना सुविचारित बुद्धि-विवेकमय निर्णय है।

तीन बजे दिन में तीर्थराज प्रयाग में
प्रवेश करते हैं, जब भरत, तब प्रभु
सेवित स्थान पर सेवक की दशा
गम्भीर हो जाती है।

सीतारामप्रेम-पीयूष रूपाकार होकर
शब्दरूप में आकाश में विकीर्ण हो
जाता है ” शब्दगुणकम् आकाशम्”

भरत तीसरे पहर कहँ
कीन्ह प्रबेसु प्रयाग
कहत राम सिय राम सिय
उमगि उमगि अनुराग

सारा समाज दुखी है पैदल भरत
के चलने से उत्पन्न पैरों में पड़े छाले
को देखकर।
कमलवत् इन चरणों में पड़ चुका
“झलका” ऐसा लगता है मानों
कमल पंखुड़ी पर पड़ा ओस-कण

झलका झलकत पायन्ह कैसे
पंकज कोस ओस कन जैसे

त्रिवेणी स्नान कर भरद्वाज को सादर
दण्डवत् प्रणाम किया है। और मुनि
को ऐसा लगा कि यह भरत तो मेरा

मूर्तिमान् सौभाग्य है-

दंड प्रनामु करत मुनि देखे।
मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

ऋषि ने कहा कि यह विधि का विधान
था, जिस पर किसी का वश नहीं होता

सुनहु भरत हम सब सुधि पाई।
बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

देखिय यही भाव गुरु वशिष्ठ जी का है।

जब श्रीरामराज्याभिषेक शुभ लग्न
विचार पूर्वक आयोजित था, तब
राजा राम का वनगमन क्यों उपस्थित
हुआ?
भरत के प्रश्न पर “विधि” को ही वन
“प्राप्तिरूप हानि” का कारण कहा गया

सुनहु भरत भावी प्रबल
बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभ जीवन मरण
जस अपजस बिधि हाथ

इसीलिये भरद्वाज जी ने रानी के
द्वारा कुचाल रचकर और विधि वश
हुआ समझ में आने पर पछताने
का उल्लेख किया –

सो भावी बस रानि अयानी।
करि कुचालि अन्तहुँ पछितानी।।

और ऐसे में तुम्हारा स्वल्प भी अपराध
समझने वाला व्यक्ति बड़ा अधम
और दुर्जन है-

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू।
कहै सो अधम अयान असाधू।।

भरत ने उचित और ठीक रास्ता चुना
है , राम को लौटा लाने का, क्योंकि
श्रीरघुनाथ जी के चरणों में प्रीति ही
समस्त मंगल की जड़ है –

अब अति कीन्हेउ भरत भल
तुम्हहि उचित मत एहु
सकल सुमंगल मूल जग
रघुबर चरन सनेहु

और सभी ऋषियों का यह भी मत है
कि भरत की दृष्टि में जो कलंक
उनपर लगा है वह कलंक नहीं,बल्कि

“भरत जी की भक्ति-रस की सिद्धि
के लिए यह श्रीगणेशाय नमः है”तुम्ह कहँ भरत कलंक यह सम सब कहँ उपदेसु राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु

इन्द्र को सोच हुआ कि प्रभु वन से
लौट आयेंगे तो हमारी दशा शोचनीय
हो जायेगी
देवगुरु से कोई उपाय करने
की प्रार्थना हुई है। देवगुरु ने ऐसी सोच
रखने से मना किया है।

वैश्विक कर्म-फल प्राप्ति का अटल
सिद्धान्त समझाया गया है

करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा

और श्रीराम-भरत के प्रति कपट
व्यवहार को निषिद्ध किया है, क्योंकि
उसका परिणाम दुःखद बताया है

राम -भरत से डरने की आवश्यकता
नहीं, क्योंकि भगवान्भक्त से अधिक
परहित करनेवाला दूसरा नहीं।

भगवान्भक्त अभिन्न हैं। इनका धरती
पर आना ही परमार्थ के लिए है।
इनका अपना कोई स्वार्थ नहीं।
ये सभी से निष्कारण प्रेम करनेवाले हैं

हेतुरहित जग जुग उपकारी
तुम तुम्हार सेवक असुरारी

और इसलिए निष्केवल प्रेमी
सेव्य-सेवक भगवान्-भक्त अनन्य
हैं, वह सभी पर कृपा ही करेंगे

राम भगत परहित निरत
पर दुख दुखी दयाल
भगत सिरोमनि भरत तें
जनि डरपहु सुरपाल

और इसीलिये श्रीभरत जी के विषय
में, उचित अवधारणा यही है कि
जैसे जल और दुग्ध रूप दोष-गुण को
अलग करनेवाला हंस होता है , वैसे ही

श्रीभरत जी भी सूर्यवंश रूपी तालाब
के हंस हैं जो गुन-दोष विभाग में

सिद्धहस्त होता है-

जनमि कीन्ह गुन दोस बिभागा

” भरत हंस रबिबंस तड़ागा “

हरिः शरणम्
गुरुः शरणम्

भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्

भरत सरिस को आजु

नारायण! भरत के समान चरित्र मिलना
कठिन है।

नाम आता है श्रीभरत जी के समान
तो केवल एकमात्र श्रीहनुमान् जी
महाराज का जो रघुनाथ जी के
अति प्रिय हैं

तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई

अब श्रीभरत जी हनुमान् जी की तरह
कैसे ,तो ऐसे कि स्मरण मात्र से वश
में हैं श्रीराम
सुमिरि पवन सुत पावन नामू
अपने बस करि राखे रामू

श्रीराम ,लक्ष्मण सीता माता के साथ
बिना पैरों में कुछ पहने बन गए हैं

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं
करि मुनि बेस फिरहिं बन बनहीं

यह स्मरण करने पर भरत का दिल
जलने लगता है। भूख प्यास नींद भी
गायब

एहि दुख दाह दहइ दिन छाती
भुख न बासर नीद न राती

भरद्वाज जी से भरत ने कहा कि
समस्या का समाधान एकमात्र राम जी
का लौट आना ही है

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ
बसइ अवध नहिं आन उपाएँ

भरद्वाज ऋषि ने आशीष दिया है कि
श्रीसीताराम का चरणकमल देखने
पर सारे कष्ट समाप्त हो जायेंगे

तात करहु जनि सोच विसेषी
सब दुख मिटिहिं राम पग देखी

भरत ने मस्तक नवाये हैं मुनि के
और ऋषि का आदेश परम धर्म रूप
स्वीकारा है

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा
परम धरम यहु नाथ हमारा

ऋषि ने भरत का जामातृवत्
आदर करने का निश्चय किया।मुनि का यह भाव समझ कर

“रिद्धि-सिद्धि” इस आतिथ्य को
पूर्ण करनेआ गई हैं।आदेश माँगती हैं
ऋषिवर से

भरद्वाज जी को चिन्ता है कि
इन देवतुल्य अतुल्य भरत का आदर
इसलिये वैसा होना चाहिये,क्योंकि
जैसा देवता वैसी पूजा होती है

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई
कन्द मूल फल आनहु जाई

“मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता
तसि पूजा चाहिअ जस नेवता”

“सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं
आयसु होइ सो करहिं गोसाईं

ऋषिश्रेष्ठ ने श्रीरामविरह में दुखी
भरत का अनुज श्रीशत्रुघ्नलाल
और सभी परिकर सहित आतिथ्य
करके श्रम दूर करनेकी इच्छा प्रकट कीराम विरह व्याकुल भरत सानुज सहित समाज पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज

अब देखिये नारायण!
भरत जैसे अतुलनीय चरित्र
के चित्र विचित्र आतिथ्य की पूर्णता

रिद्धिसिद्धियाँ अपना परम सौभाग्य
मानती हैं

रिधि सिधि धरि सिर मुनिबर बानी
बड़भागिनि आपुहिं अनुमानी

कहहिं परसपर सिधि समुदाई
अतुलित अतिथि राम लघु भाई
मुनि पथ बन्दि करिअ सोइ आजू
होइ सुखी सब राज समाजू

ऐसा सुन्दर गृह बनाया कि देवता
बिलख पड़े हैं। ऐसा ऐश्वर्य कि इन्द्र की
नगरी में भी नहीं

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना
जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना
भोग बिभूति भूरि भरि राखे
देखत जिन्हहिं अमर अभिलाषे

दासी दास साजु सब लीन्हे
जोगवत रहत मनहिं मनु दीन्हे

“सब समाजु सजि सिधि पल माहीं
जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं”

नारायण ! ऐसा लुब्ध कर देने वाला
ऐश्वर्य भरत जी की सेवा में उपस्थित

हो गया कि ज्ञानी-जन को अपना

ज्ञान-वैराग्य भी विस्मृत हो गया

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी
देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी

बेचारा इन्द्र तो सपत्नीक ऐसी शोभा
देखकर इस आतिथ्य का लोभी
हो गया।
जबकि उसके पास सेवक-देवकसमूह
कामधेनु और सर्वप्रदाता कल्पवृक्ष
भी है लेकिन –

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें
लखि अभिलाषु सुरेश सची कें

अब भरत की गति देखिये। ऋषि का
अद्वितीय आतिथ्य स्वीकार कर

पदत्राण विहीन बिना छाया के चल
पड़े हैं भरत।प्रेम का नियम लिये हैं। धर्म का व्रत(संकल्प)लिये हैं। माया का लेशमात्र नहीं है जैसे मूर्ति धरे अनुराग जा रहा हो

नहिं पदत्रान सीस नहिं छाया
प्रेम नेम व्रत धरमु अमायाराम सखा कर दीन्हे आगे चलत देह धरि जनु अनुरागे

भरत का स्वरुप नारायण!
अकथनीय
ऐसा कि मेघ-वायु जो भगवान् के
दासदासानुदास ही हैं

मार्ग में वैसे सुखद उनके लिए नहीं
हुए थे जैसा कि “मूर्तिमन्त प्रेम”
श्रीभरत जी के लिए

किए जाहिं छाया जलद
सुखद बहइ बर बात
तसु मगु भयउ न राम कहँ
जस भा भरतहिं जात

और बड़ी बात ये भी है कि
श्रीहनुमन्तलाल
सरीखे श्रीरामप्रेमपरायण श्रीभरत जी
राम-नाम स्मरण करते चल रहे हैं।
और बड़ी उससे विशेषता ये कि

प्रभु राम भी भरत का स्मरण करते हैं

इसलिये भरत जी के दर्शन मात्र से
जीव-जन्तु जड़-चेतन सभी
परम पद वैकुण्ठ के अधिकारी बन
जा रहे हैं।

यह है “नाम स्मरण महिमा”

जड़ चेतन मग जीव घनेरे
जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे

ते सब भए परम पद जोगू
भरत दरस मेटा भव रोगू

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं
सुमिरत जिनहिं रामु मन माहीं

ऐसा श्रीभरत जी का प्रभाव देख कर
इन्द्र की दशा शोचनीय हो जाती है
देव गुरु बृहस्पति से आग्रह करते हैं

कि यदि परम संकोची श्रीराम वन
से लौटे, तो देवशत्रुओं (राक्षसों)का
विनाश टल जायेगा और हम सब

देवता गण संकट ग्रस्त हो जायेंगे

देखी प्रभाउ सुरेसहिं सोचू
जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू

और इसलिए हे गुरुवर ! आप कोई
ऐसा दाय-उपाय करें कि राम-भरत
की भेंट ही न हो सके

गुरु सन कहेउ करिअ प्रभु सोई
रामहिं भरतहिं भेंट न होई क्योंकि राम सँकोची प्रेमबस भरत सप्रेम पयोधि बनी बात बिगरनि चहति करिअ जतनु छलु सोधि अब देवगुरु मुस्करा उठते हैं। क्योंकि जो इन्द्र

श्रीरामसीताविवाह को सहस्र लोचन
से देख चुके हैं, जिनके सौभाग्य पर
पंचमुख पन्द्रह नेत्र – शिव तथा

चतुर्मुख अष्टनेत्र ब्रह्मा ईर्ष्यालु हो
गये थे
वह लगता है “अन्धा” हो गया है

“आश्चर्य! हजार नेत्र वाला इन्द्र
और अन्धा”

“बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने
सहस नयन बिनु लोचन जाने”

कहा देवगुरु ने भैया इन्द्र!

“मायापति के “सेवक” के साथ माया”

असम्भव असम्भव असम्भव

और इन्द्र को ऐसी सोच से बचना
होगा, नहीं तो इन्द्रासन सहित
नीचे उलट पड़ेगा

“मायापति सेवक सन माया
करइ त उलटि परइ सुरराया

भगवान् के साथ स्वयं कोई
अपराध कर बैठे तो,उन्हें क्रोध नहीं

करुणानिधान उसे क्षमा ही कर देते हैं
किन्तु भक्त के प्रति अपराध
प्रभु क्षमा नहीं करते

नारायण! दुर्वासा ऋषि, तो भक्त
की महिमा से सुपरिचित हैं

” भक्त अम्बरीष और दुर्वासा प्रसंग”

“इस बात का ऐतिहासिक गवाह है”

जो अपराध भगत कर करई
राम रोष पावक सों जरई

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा
यह महिमा जानहिं दुरबासा

भरत के समान रामनाम अमृत पीने
वाले श्रीहनुमन्तलाल ही हैं

भरत सरिस को राम सनेही
जगु जप राम-राम जप जेही

देव ऋषि ने इन्द्र को ऐसे विचारों को
मन में लाने से मना किया है।

भरतादिक भक्त सेवक से वैर विरोध
करनेवाले से भगवान् और अधिक
वैर ही करते हैं।

“और भगवान् वैर करें तो भक्त
देवर्षि नारद जैसा दयालु त्राता”"सीता" जैसी साक्षाद् भक्ति के प्रति कृत अपराध से मुक्ति का

साधन देकर अपराधी को बचा सका है

भगवान् तो

मानत सुखु सेवक सेवकाई
सेवक बैर बैरु अधिकाई

यह संसार कर्म और फल वाला है
जो जैसा करेगा, तदनुरूप फल
तो मिलेगा ही। सावधान रहो

“करम प्रधान बिस्व करि राखा
जो जस करइ सो तस फलु चाखा”

अतः भरत के प्रति कुटिल भाव
छोड़ो और भरतचरणों में प्रेम करो
तो कल्याण ही कल्याण होगा

अस जिय जानि तजहु कुटिलाई
करहु भरत पद प्रीति सुहाई

भगवान् सदैव अपने भरत सरीखे
सेवकों की रुचि पूरी करते हैं
वेद पुराण सभी सन्त इसके साक्षी हैं

राम सदा सेवक रुचि राखी
बेद पुरान साधु सुर साखी

और इन्द्रादि देवों ने देवगुरू वृहस्पति
की शिक्षा सादर ग्रहण की है

सभी देवों का दुख दूर हो गया है
भरत की सराहना हुई है।

कृपालु भगवान् कोई उपाय करेंगे
और दानव विनाश निश्चित है

सत्यसन्ध प्रभु सुर हितकारी
भरत राम आयसु अनुसारी
स्वारथ बिबस बिकल तुम होहू
भरत दोसु नहिं राउर मोहू

सुनि सुरबर सुरगुरु बर बानी
भा प्रमोदु मन मिटी गलानी

बरसि प्रसून हरषि सुरराऊ
लहगे सराहन भरत सुभाऊ

अब ऐसी शोभा भरत की बनी है कि
सभी सराहना कर रहे हैं-

चलत पयादे खात फल
पिता दीन्ह तजि राजु
जात मनावन रघुबरहिं "भरत सरिस को आजु"

गुरुः शरणम्
हरिः शरणम्