भक्त/सन्त तो भगवान् से बढ़कर हैं।
स्वयं भगवान् अपने को भक्त के अधीन बताते हैं। उनका हृदय साधुओं से ग्रस्त है। मतलब कि सन्तों ने उनके हृदय पर कब्जा कर रखा है।जैसे द्विज, वेदादि शास्त्रों के अनुकूल ही चलता है, वैसे भगवान् भी भक्तों के अनुकूल ही चलते हैं।
वे “भक्तजनप्रिय:” हैं। अर्थात् भक्त जन उन्हें प्रिय हैं और वे भी भक्त जनों के प्रिय हैं-
अहं भक्तपराधीनः हि,
अस्वतन्त्र इव द्विजः।
साधुभिः ग्रस्तहृदयः,
भक्तैः भक्तजनप्रियः।।
भक्त, भगवान् को इसलिये प्रिय,क्योंकि
वे भक्त ही हैं, जो उनका प्रचार -प्रसार करके, विमुख(भगवद् विमुख) जीव को
उनके “सन्मुख”कर कृतार्थ कर देते हैं।
क्योंकि जीव तो सदा से ही भगवान् का ही है। हमारे सद्गुरु भगवान् मलूकपीठ
विराजित, परम पूज्य श्री राजेन्द्र दास
महाराज जी अभी कुछ दिन पहले से
श्रावण मास की शिवचर्चा विनयपत्रिका
के माध्यम से कर रहे हैं। उन्होंने श्रीराम जी के भक्त ” शिव” और “शिव” के भक्त श्रीराम जी के सम्बन्धों का वर्णन करते हुए एक कथा इस प्रकार बताई,कि भक्त और भगवान् परस्पर एक दूसरे के हैं।
कथा इस प्रकार है-
वेदान्त के “विशिष्टाद्वैत” मत प्रवर्तक और
“शेषावतार” श्री रामानुजाचार्य भगवान् ने भारत के दक्षिण भाग को समलंकृत किया था। बात ग्यारहवीं शती की है।
रामानुज भगवान् “मेलकोट” की यात्रा पर थे। मेलकोट यानी मलयपर्वत पर
श्रीरामजी का प्राचीन मन्दिर है।
जिसमें श्रीविग्रह को मुस्लिम शासकों से लाकर पुनः आपने विराजित किया था।
यह मन्दिर है, ” तिरुनारायण स्वामी ” का।
एक बार आचार्य अपने परिकर सहित
मन्दिर में दर्शनार्थ पधारे। भगवान् श्रीस्वामी तिरुनारायण ने आचार्य को हाथ के इशारे से गर्भगृह में आने के लिए कहा। भीतर जाने पर श्रीविग्रह प्रतिमा ने प्रश्न किया-
भक्तों के प्रश्नों का समुचित समाधान आप बराबर करते हैं। असंख्यासंख्य जनों को आपके द्वारा शरणागत किया जाता है। क्या कारण है कि, मेरे अवतार काल में गिने -चुने भक्त ही मेरे शरणागत
हुए। बालि से पिटने, हारने के बाद सुग्रीव आया। रावण की लात खाकर विभीषण चरणों में पड़ा।
आप मुझे यह रहस्य बताइये कि आप अनेकानेक जीवों को कैसे शरणागत कर देते हैं?
आचार्य रामानुज ने कहा, मैं बताऊँगा, अवश्य लेकिन आपके पूछने तरीका ठीक नहीं।
नारायण- प्रतिमा ने कहा क्या तरीका अपनाया जाय?
आचार्य ने कहा-
आपका ही वाक्य है कि , उस परम तत्व को प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा से जानना चाहिए-
तद् विद्धि प्रणिपातेन,
परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति तं ज्ञानं
ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः।।
“भगवत्प्रतिमा” ने इसे सादर स्वीकार किया। और बारी आचार्य चरण की थी।उनके आग्रह पर-
आचार्य रामानुज को उच्च आसन प्रदान किया गया। तब श्रीरामानुजाचार्य ने कहा-
आपकी सबसे बड़ी कमी क्या है?
आप इसे नहीं जानते हैं । आपके पास आपका ” नाम ” नहीं है। आपके पास आपकी ” कथा ” नहीं है।
आप भक्तजनों को अपना नाम नहीं दे सकते।अपनी कथा भी नहीं सुना सकते।
हम सभी आचार्य आपकी माया से दुखी असंख्य आर्त जनों को आपकी कथा सुनाकर संसार से विमुख कर देते हैं। तब आपकी लीला कथा से उन्मुख
उन सभी को ” नाम ” सुनाकर शरणागत
कर देते हैं।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।यह तो आपकी ही कथा और नाम का प्रभाव है।
शरणागत भक्त,मुक्त एवं निष्कामी हो जाता है और वह ,सदा -सदा के लिये जन्मचक्र से छूटकर आपके चरणाश्रय का अविरल आनन्द पा जाता है।अच्छा-बुरा भोग भोगने के लिए उसका जन्म नहीं होता।
इस प्रकार से वह आपकी तरह ही आपके आदेश से धर्म की स्थापना के लिए ही धरती पर उतरता है।
अब ” तिरुनारायण स्वामी ” के विग्रह और रामानुजाचार्य के मध्य होने वाला यह संवाद, तो यही सिद्ध करता है कि
भगवान् से श्रेष्ठ उनके भक्त/आचार्य/ साधु एवं सन्त होते हैं, क्योंकि वे आचार्य सन्त असीमित जीवों का उद्धार करते हैं।
जब कि भगवान् द्वारा उद्धार किये गये भक्तों की संख्या सीमित है।
इसीलिये श्रीरामावतार में शबरी को दिये नव साधन उपदेशों में सातवीं भक्ति में
सन्तभक्त, सर्वत्र भगवद् दर्शन करने के कारण अधिक श्रेष्ठ हैं-
सातम सम मोहिमय जग देखा।
मोते अधिक सन्त करि लेखा।।
संसारमाया मुक्त कबीर की अनुभूति बोलती है-
हरि दुर्लभ नहिं जगत में,
हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेर् याँ सब जग मिलै,
हरिजन कहिं-कहिं होय।।
इसीलिये-
श्रीरामचरितमानस के उत्तर काण्ड में
श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को बताया है कि,राम भगवान् समुद्र हैं ,तो सन्तभक्त मेघ के समान।
वे श्रीराम चन्दनवृक्ष हैं, तो सन्त समाज उस सुगन्ध के वाहक सुवासित वायु।
मानव जीवन का सर्वस्व फल हरिभक्ति
है, और यह तो”सन्तों” के बिना कोई पा नहीं सकता।
भक्ति के दाता “सन्त”/ “भक्त” जब कृपा कर देते हैं,तब भगवान् की अविरल स्मृति मिल जाती है और इसके बाद तो भैया!
अद्वितीय सुख की मूल भक्ति भी मिल जाती है-
राम सिन्धु घन सज्जन धीरा।
चन्दन तरु हरि सन्त समीरा।।
सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु सन्त न काहू पाई।।
भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
भाव सहित खोजने वाला मनुष्य भक्ति रूपी मणि को पा लेता है।
और इसीलिये “मानस” ने कहा-
मेरे मन में ऐसा विश्वास है कि राम से बढ़कर उनके भक्त रामदास / तुलसीदास हैं, जो असंख्यासंख्य जीवों को कराल कलिकाल में भी भगवदुन्मुख करके भव सागर से तार रहे हैं-
भाव सहित जो खोजइ प्रानी।
पाव भगति मनि सब सुख खानी।।
मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा।।
।। गुरुः शरणम् ।।
।। हरिः शरणम् ।।