को कृपालु संकर सरिस

अरे भाई माँगना हो तो काशीश मसान निवासी शिव से माँगना चाहिए।
इनसे बड़ा दयालु कौन?
रावण भस्मासुरादि तक को क्या-क्या नहीं दे दिया।
अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति,प्राकाम्या,ईशित्व, वशित्व आदि
आठों ,आपकी दासी हैं।
जाँचिए गिरिजापति कासी।
जासु भवन अनिमादिक दासी।।

हनुमदावतार में भी आप जगदम्बा श्रीजानकी जी की कृपा से अष्टसिद्धियों, नवनिधियों को बाँट रहे हैं-

अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।

आपकी कृपालुता ऐसी,आप ऐसे अवढरदानी हैं कि थोड़ी सी सेवा से पिघल जाते हैं।दीनानाथ ऐसे कि, किसी दीन हीन याचक को हाथ जोड़े देखना,
आपको बर्दाश्त नहीं-

सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।

औढरदानि द्रवत पुनि थोरे।
सकत न देखि दीन कर जोरे।।

ऐसे उदार उमापति!
तुम पुनि राम राम दिनराती।
सादर जपहु अनंग अराती।।

आप तो राम राम जपते हुए याचकों को सब कुछ बाँट रहे हैं। याचक जैसा परम प्रिय आपको दूसरि नहीं-

दानी कहुँ संकर सम नाहीं।
जाचक सदा सोहाहीं।।

आपको छोड़ अन्य जगह जो माँगने जाय, तो उसका पेट कभी नहीं भरेगा।

ईस उदार उमापति परिहरि।
अनत जे जाचन जाहीं।।
तुलसिदास ते मूढ़ माँगते।
कबहुँ न पेट अघाहीं।।

और क्या कहें, जब समुद्रमन्थन होने पर
उसमें से निकले ” कालकूट ” विष की विषमज्वाला से सभी देवता राक्षस जलने लगे, तब आप अत्यन्त कृपालु होकर सभी की प्राणरक्षा के लिये क्षणमात्र में उस गरल को पी गये-

कालकूट-जुर जरत सुरासुर।
निजपन लागि किये बिषपान।।
(श्रीविनय पत्रिका)
जरत सकल सुर वृन्द,
विषम गरल जेहि पान किय।
तेहि न भजसि मतिमन्द,
को कृपालु संकर सरिस।।

( किष्किन्धा-श्रीमद्रामचरितमानस)

।।हरिः शरणम् ।।
।।गुरुः शरणम् ।।

सनमान निरादर आदरहीं।सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।

” मानस ” के उत्तर काण्ड में प्रभु श्रीराम
जब अयोध्या पधारते हैं। तब उनके आगमन की सूचना सर्वप्रथम श्रीहनूमान् जी महाराज विप्रवेश में आकर श्रीभरत जी को देते हैं।सूचना देकर हनुमानजी चले जाते हैं।
भगवान् पुष्पक पर आरूढ़ होकर अयोध्या में उतरते हैं। पुष्पक को वापस श्रीकुबेर जी के पास जाने का आदेश देते हैं। पहले ” वेद ” मूर्तिमन्त होकर उनकी
स्तुति करते हैं।
नाना देवगण भी इस अवसर पर पधारे हैं।आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है।
यहाँ अयोध्या में ” माया ” का कोई साम्राज्य नहीं है। मायापति भगवान् की नगरी जो ठहरी। ब्रह्मा जी भी आकाश से
फूल बरसा रहे हैं।
आनन्दमग्न देवाधिदेव भगवान् शिव भी आकर भगवद् स्तुति करते हैं।और

इधर –
माया को देखें तो, इन्द्रिय दृश्य नहीं।
विचारने पर यह बात समझी जा सकती है, कि है वह बड़ी प्रचण्ड।
मायाधीश जिसकी माया हर लें,वही कृतकृत्य हो सकता है और मान अपमान से परे वास्तविक आनन्द में रह सकता है।हाँ सन्त तो ,
माया से परे हैं।लेकिन वस्तुतः विरागी और भगवदुन्मुख हों।
महाभारत में भगवान् की माया के सम्बन्ध एक कथा आती है-

एक महर्षि थे नाम था ” बट तालव्य “
अनादि काल से बैठे वे तपश्चर्या लीन थे
शिरोभाग पर एक बट का पत्ता रखकर
उसे ढँके हुए थे। जंघाओं के मध्यऔर अगल बगल भी अनेक वृक्ष उग आए थे।
सहसा मायापति लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण इनके सामने प्रकट हुए।
लीलाधारी जो ठहरे ,लीला करनी चाही।

महर्षि बटतालव्य की समाधि खण्डित हुई। जब नेत्र खोले तो सामने भगवान्। वे
समझ गए कोई लीला होगी।
भगवान् ने अपनी माया छोड़ दी।ऋषि मोहित,भ्रमित हुए।
भगवान् ने पूछा आप कब से तपोलीन हैं। ऋषि ने कहा काल ने सब विस्मृत करा दिया है। आप कालों के काल हैं, पूछते क्यों हैं। सैकड़ों ब्रह्मा और सहस्रों लोमश ऋषि अपना काल हमारे सामने पूरा करके जा चुके हैं। कब से मैं इस समाधि में हूँ, नहीं मालुम।अब देखिये। माया का प्रभाव बड़ा ही चित्र-विचित्र है।
अब आगे क्या होता है?
आश्चर्य चकित ऋषि इतने में ही ब्रह्मलोक में पहुंच गए।चतुर्मुख ब्रह्मा से वेदसम्बन्धी वार्ता चलने लगी। थोडी देर में
ब्रह्मा जी भी मायावशत्वेन उन महर्षि बटतालव्य से वादविवाद करने लगे।
माया कृत अभिमान चढ़ बैठा। एक बवण्डर आया दोनों चतुर्मुख ब्रह्मा और
वे ऋषि उड़ने लगे।
हवा का प्रचण्ड वेग रुका और दोनो लोग एक दूसरे ब्रह्माण्ड के द्वार पर जा
पहुँचे। द्वारपालों से पूछा तो पता चला कि यह भी अलग ब्रह्माण्ड है।
चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने कहा यहाँ कौन रहता है। उत्तर मिला अष्टमुख ब्रह्मा।
अनुमति पूर्वक ऋषि के साथ दरबार में गए।वहाँ अष्टमुख – चतुर्मुख ब्रह्मा और ऋषि की वेद चर्चा चली। पुनः विवाद हो गया। फिर तूफान आया,और तीनों भँवर में घूमने लगे।
शान्त होने पर तीनों ,तीसरे ब्रह्मलोक के द्वार पर खड़े थे। पूछने पर पता चला यहाँ षोडश मुख ब्रह्मा विराजते हैं।
द्वरपालों की आज्ञा से भीतर प्रवेश मिला। षोडश मुख वाले ब्रह्मा जी के साथ
सत्संग प्रारंभ हुआ।और धीरे-धीरे कहासुनी होने लगी। पुनः शान्ति भंग हुई।
तूफान में चार, आठ ,सोलह मुख वाले ब्रह्मा और बटतालव्य उड़ने लगे।
तूफान कम होता है और चारों एक चौथै ब्रह्मलोक के दरवाजे पर खड़े हैं।
पूछने पर पता चला यह बत्तीस मुखी ब्रह्मा जी का दरबार है।
चार ,आठ ,सोलह,बत्तीस और बटतालव्य ऋषि की परस्पर वार्ता में विवाद होता है। और वे सभी चौसठ मुखी ब्रह्मा के लोक में पहुंच चुके होते हैं।
इस तरह शतमुख ब्रह्मा ,सहस्र मुख ब्रह्मा के लोक तक जाने और विवाद की निरन्तर परम्परा चलती जाती है।
भगवान् अपनी माया को खींच लेते हैं। क्रमशः सभी ब्रह्मा गण अपने -अपने
लोक में और बटतालव्य ऋषि धरती पर पद्मासन में विराजे दीखते हैं।
भगवान् के आगे ऋषि विनत हुए।
माया खतम ,अभिमान खतम।

माया कृत गुन दोष सब।

हे प्रभु हरहु आपनी माया।

बालि बध के उपरान्त, माया की वशीभूता
तारा अत्यंत व्याकुल हो जाती है।
भगवान् कृपालु हैं। माया को खींच लेते हैं। तारा आनन्दमूर्ति बन जाती है।
वैकुण्ठ की अधिकारिणी हो जाती है।

तारा बिकल देखि रघुराया ।
दीन्ह ज्ञान हरि लीन्ही माया।।

     अब बात ये है कि, मायापति अपने प्राणप्यारे सन्तो/भक्तों की माया हरते हैं।

बिना हरिगुरुसन्त अनुग्रह के यह जीवन कृतकृत्य नहीं होगा।
हम मानापमान के परे उन्हीं की कृपा से हो पाते हैं।

मानापमानयोः तुल्यः
तो हरिः ओ3म् तत् सत् कृपा पर आधारित है। इसीलिये हमारा सनातन
तो हरिहरात्मक है।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।

भक्त/सन्त इससे परे हैं।
इसीलिये मंगल भवन अमंगल हारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, भगवान्
उममहेश्वर, वन्दनीय श्रीराम जी की वन्दना में भक्तोचित भाव से गाते हैं-

सनमान निरादर आदरहीं।
सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।।

।। हरिः शरणम् ।।
।। गुरुः शरणम् ।।

दर्शनादेव साधवः

भगवान् के प्राणप्यारे सन्त/भक्त अपने दर्शन से ” जीव “को कृतार्थ कर देते हैं।
अप्(जल) मय अर्थात् नदी तीर्थों में जाकर, सविधि स्नान करने पर पाप नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है।
मृत्(मिट्टी) पत्थर आदि शिलाओं से निर्मित ,प्रतिष्ठित प्रतिमाओं का भी श्रद्धा भक्ति पूर्वक अर्चन करके, अभीष्ट सिद्धि होती है।
किन्तु इन दोनों विधियों में स्वयं तत्पर होना पड़ेगा। समय भी लगेगा, तब जाकर
नाना ऐन्द्रिक शुद्धि पूर्वक,मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होगी।
लेकिन ” अजामिल ” आदि का प्रसंग ऐसा है, जहाँ सन्त/भक्त स्वयं दर्शन देकर
पतित अजामिल को ” पतितपावन ” का
” वैकुण्ठ लोक ” अकुण्ठित गति से
प्राप्त करा देते हैं। और मानो सन्त दर्शन से , ” मनुष्यता ” ही कृतार्थ हो जाती है।
उस अजामिल को अपना कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
इससे भी आगे बढ़कर एक विलक्षण बात होती है, जब नाना लोकों और यहाँ तक कि ” ब्रह्मलोक ” तक जाकर वह
बैचारा थका हारा ” जयन्त ” लौट आता है। भगवान् श्रीराम द्वारा छोड़ा गयी वह
” सींक ” काल बन कर पीछे से दौड़ाती हुई पीछा नहीं छोड़ती। वह निराश हो जाता है।जीवन संकटापन्न हो जाता है।
तभी नारद जैसे सन्त उस जयन्त की विकट संकट अवस्था देख कर द्रवित हो जाते हैं।

नारद देखेउ बिकल जयन्ता।
लागि दया कोमलचित सन्ता।।
विलक्षणता क्या कि जयन्त, नारदजी को नहीं देखता, स्वयं दयार्द्र नारद उसे देख लेते हैं।और कोमल चित्त महात्मा उसके उद्धार का मार्ग उसे बता देते हैं।
वह जयन्त आत्मोद्धार कर लेता है।
यहाँ भी साधु, स्वयं दर्शन देकर ही
जीव को कृतार्थ कर जाते हैं।
अजामिल और जयन्त ,इन दोनों की उक्त घटनाओं में अद्भुत साम्य है, जहाँ
साधु/ सन्त स्वयं अपना दर्शन देकर
जीव को धन्य-धन्य कर देते हैं।और
इसीलिये भागवत पुराण में भक्त और भगवान् के तादात्म्य से उद्धारक्रिया शब्दों बह जाती है-

नह्यम्मयानि ( न हि अप् मयानि)तीर्थानि,
न देवा न मृच्छिलामयाः ।
ते पुनन्ति उरुकालेन,
दर्शानादेव साधवः।।

।। हरिः शरणम् ।।

।। गुरुः शरणम् ।।

मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।

भक्त/सन्त तो भगवान् से बढ़कर हैं।
स्वयं भगवान् अपने को भक्त के अधीन बताते हैं। उनका हृदय साधुओं से ग्रस्त है। मतलब कि सन्तों ने उनके हृदय पर कब्जा कर रखा है।जैसे द्विज, वेदादि शास्त्रों के अनुकूल ही चलता है, वैसे भगवान् भी भक्तों के अनुकूल ही चलते हैं।
वे “भक्तजनप्रिय:” हैं। अर्थात् भक्त जन उन्हें प्रिय हैं और वे भी भक्त जनों के प्रिय हैं-

अहं भक्तपराधीनः हि,
अस्वतन्त्र इव द्विजः।
साधुभिः ग्रस्तहृदयः,
भक्तैः भक्तजनप्रियः।।

भक्त, भगवान् को इसलिये प्रिय,क्योंकि
वे भक्त ही हैं, जो उनका प्रचार -प्रसार करके, विमुख(भगवद् विमुख) जीव को
उनके “सन्मुख”कर कृतार्थ कर देते हैं।
क्योंकि जीव तो सदा से ही भगवान् का ही है। हमारे सद्गुरु भगवान् मलूकपीठ

विराजित, परम पूज्य श्री राजेन्द्र दास
महाराज जी अभी कुछ दिन पहले से
श्रावण मास की शिवचर्चा विनयपत्रिका
के माध्यम से कर रहे हैं। उन्होंने श्रीराम जी के भक्त ” शिव” और “शिव” के भक्त श्रीराम जी के सम्बन्धों का वर्णन करते हुए एक कथा इस प्रकार बताई,कि भक्त और भगवान् परस्पर एक दूसरे के हैं।
कथा इस प्रकार है-

वेदान्त के “विशिष्टाद्वैत” मत प्रवर्तक और
“शेषावतार” श्री रामानुजाचार्य भगवान् ने भारत के दक्षिण भाग को समलंकृत किया था। बात ग्यारहवीं शती की है।
रामानुज भगवान् “मेलकोट” की यात्रा पर थे। मेलकोट यानी मलयपर्वत पर
श्रीरामजी का प्राचीन मन्दिर है।
जिसमें श्रीविग्रह को मुस्लिम शासकों से लाकर पुनः आपने विराजित किया था।
यह मन्दिर है, ” तिरुनारायण स्वामी ” का।
एक बार आचार्य अपने परिकर सहित
मन्दिर में दर्शनार्थ पधारे। भगवान् श्रीस्वामी तिरुनारायण ने आचार्य को हाथ के इशारे से गर्भगृह में आने के लिए कहा। भीतर जाने पर श्रीविग्रह प्रतिमा ने प्रश्न किया-
भक्तों के प्रश्नों का समुचित समाधान आप बराबर करते हैं। असंख्यासंख्य जनों को आपके द्वारा शरणागत किया जाता है। क्या कारण है कि, मेरे अवतार काल में गिने -चुने भक्त ही मेरे शरणागत
हुए। बालि से पिटने, हारने के बाद सुग्रीव आया। रावण की लात खाकर विभीषण चरणों में पड़ा।
आप मुझे यह रहस्य बताइये कि आप अनेकानेक जीवों को कैसे शरणागत कर देते हैं?
आचार्य रामानुज ने कहा, मैं बताऊँगा, अवश्य लेकिन आपके पूछने तरीका ठीक नहीं।
नारायण- प्रतिमा ने कहा क्या तरीका अपनाया जाय?
आचार्य ने कहा-
आपका ही वाक्य है कि , उस परम तत्व को प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा से जानना चाहिए-
तद् विद्धि प्रणिपातेन,
परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति तं ज्ञानं
ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः।।

“भगवत्प्रतिमा” ने इसे सादर स्वीकार किया। और बारी आचार्य चरण की थी।उनके आग्रह पर-
आचार्य रामानुज को उच्च आसन प्रदान किया गया। तब श्रीरामानुजाचार्य ने कहा-
आपकी सबसे बड़ी कमी क्या है?
आप इसे नहीं जानते हैं । आपके पास आपका ” नाम ” नहीं है। आपके पास आपकी ” कथा ” नहीं है।
आप भक्तजनों को अपना नाम नहीं दे सकते।अपनी कथा भी नहीं सुना सकते।
हम सभी आचार्य आपकी माया से दुखी असंख्य आर्त जनों को आपकी कथा सुनाकर संसार से विमुख कर देते हैं। तब आपकी लीला कथा से उन्मुख
उन सभी को ” नाम ” सुनाकर शरणागत
कर देते हैं।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।यह तो आपकी ही कथा और नाम का प्रभाव है।
शरणागत भक्त,मुक्त एवं निष्कामी हो जाता है और वह ,सदा -सदा के लिये जन्मचक्र से छूटकर आपके चरणाश्रय का अविरल आनन्द पा जाता है।अच्छा-बुरा भोग भोगने के लिए उसका जन्म नहीं होता।
इस प्रकार से वह आपकी तरह ही आपके आदेश से धर्म की स्थापना के लिए ही धरती पर उतरता है।
अब ” तिरुनारायण स्वामी ” के विग्रह और रामानुजाचार्य के मध्य होने वाला यह संवाद, तो यही सिद्ध करता है कि
भगवान् से श्रेष्ठ उनके भक्त/आचार्य/ साधु एवं सन्त होते हैं, क्योंकि वे आचार्य सन्त असीमित जीवों का उद्धार करते हैं।
जब कि भगवान् द्वारा उद्धार किये गये भक्तों की संख्या सीमित है।

इसीलिये श्रीरामावतार में शबरी को दिये नव साधन उपदेशों में सातवीं भक्ति में
सन्तभक्त, सर्वत्र भगवद् दर्शन करने के कारण अधिक श्रेष्ठ हैं-

सातम सम मोहिमय जग देखा।
मोते अधिक सन्त करि लेखा।।

संसारमाया मुक्त कबीर की अनुभूति बोलती है-

हरि दुर्लभ नहिं जगत में,
हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेर् याँ सब जग मिलै,
हरिजन कहिं-कहिं होय।।

इसीलिये-

श्रीरामचरितमानस के उत्तर काण्ड में
श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को बताया है कि,राम भगवान् समुद्र हैं ,तो सन्तभक्त मेघ के समान।
वे श्रीराम चन्दनवृक्ष हैं, तो सन्त समाज उस सुगन्ध के वाहक सुवासित वायु।
मानव जीवन का सर्वस्व फल हरिभक्ति
है, और यह तो”सन्तों” के बिना कोई पा नहीं सकता।
भक्ति के दाता “सन्त”/ “भक्त” जब कृपा कर देते हैं,तब भगवान् की अविरल स्मृति मिल जाती है और इसके बाद तो भैया!
अद्वितीय सुख की मूल भक्ति भी मिल जाती है-

राम सिन्धु घन सज्जन धीरा।
चन्दन तरु हरि सन्त समीरा।।

सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु सन्त न काहू पाई।।

भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।

भाव सहित खोजने वाला मनुष्य भक्ति रूपी मणि को पा लेता है।

और इसीलिये “मानस” ने कहा-

मेरे मन में ऐसा विश्वास है कि राम से बढ़कर उनके भक्त रामदास / तुलसीदास हैं, जो असंख्यासंख्य जीवों को कराल कलिकाल में भी भगवदुन्मुख करके भव सागर से तार रहे हैं-

भाव सहित जो खोजइ प्रानी।
पाव भगति मनि सब सुख खानी।।

मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।
राम ते अधिक राम कर दासा।।

।। गुरुः शरणम् ।।
।। हरिः शरणम् ।।

विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि।।

टिकट तो कन्फर्म
लेकिन दुर्भाग्य हमारा
क्योंकि यह ” मानवशरीर ” ट्रेन ?
लक्ष्य क्या है इसका?
शुक्रिया करुणानिधान भगवान् का
भोग ही जीवन नहीं।
मजा क्या लोगे ?
सजा की सेज भी बिछी है।
उम्र तो सहज शरीर धर्म है।
जलवत् बहती जा रही
” समुद्र ” मेरा गन्तव्य।
इसे उम्र भर जान नहीं पाया
वही उनकी माया किए है बेचैन
तरसता,तड़पता हूँ बना नहीं “मैन”
अब सोचना तो पड़ेगा।
कब तक नवीन यात्राओं के लिए
नया -नया टिकट लेना पड़ेगा?
जब गन्तव्य पता नहीं
तब नाना शरीर धारण ही
एक नियति होती है।
हमारी “प्रज्ञा ” तो सोती है।
” स्थितप्रज्ञ ” गुरु भगवान् ही
जगाते हैं,गाते हैं, गुनगुनाते हैं।
भगवान् का भगवती का
पावन नाम जब सुनाते हैं,
तब ” जीव ” बेचारा नहीं रहता।
मिल जाता है हारे को हरिनाम
हारा जीत की ओर बढ़ता रहता।
तब
और वह “जीव ” मीरा कबीर सूर तुलसी
रैदास नाभादास प्रियादास बन जाता है।

और ” पायो जी पायो मैंने रामरतनधन
पायो ” की टेर शुरु हो जाती है।
कर्मों की फेर फिर जाती है।
अगाध संसार सागर में
नाम का तिनका जीवन नैया
बन ही जाती है।

और मिल जाता है
” वेदवेदान्तवेद्य तत्व “
व्रजरज में लीलापुरुषोत्तम कहाता है।
“जीव” उजास में नहाता, “तम”नसाता है।
प्रेम की प्रतिमा”अजन्मा” जन्म लेकर
भक्तों को रिझाता ” कृष्ण “कहलाता है।

और इसीलिये अनुभूति बोलती है-

विगतविषयतृष्णः
कृष्णमाराधयामि।।

।।हरिः शरणम्।

जेहि सरीर रति राम, सोइ आदरहिं सुजान। रुद्र देह तजि नेह बस, बानर भे हनुमान।।

जिस शरीर में प्रभु श्रीराम से प्रेम हो जाय, वही शरीर सज्जनों ,सुजनों के आदर का पात्र बन जाता है।
भगवान् ही “प्रेम” स्वरूप सभी चराचर में व्यापक हैं।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।
अब ,उसी प्रेमास्पद, प्रेममूर्ति भगवान्, का प्रेमानुराग, जगत् को अनुभव कराने के लिए, भगवान् शिव
” रुद्र ” देह छोड़कर, भक्तराज श्रीहनुमान् जी महाराज के रूप में अवतरित होते हैं।
कम से कम दोहावली के इस दोहे का आशय तो ऐसा ही लगता है।

जगदम्बा पार्वतीजी भी भगवान् से कहती हैं, कि आप तो दिन-रात प्रतिक्षण ही
श्रीरामनाम जपते रहते हैं। और विशेषता यह कि, आप ही कहते हैं कि, इसी नाम के प्रभाव से मैं(शिव)औरों की बात क्या,
कीट-पतिंगों तक को मुक्ति का अधिकारी बना देता हूँ।
भगवती ने कहा-

तुम पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग अराती।।

भैया! करोड़ों प्रकार की योगसाधना करके, योगीजन जिस मुक्ति मार्ग के अधिकारी बन पाते हैं, वह मुक्ति हे प्रभु!
आप सभी कीट पतिंग तक को दे देते हैं।यह आपके नाम के जप का ही तो परिणाम है-

बेद बिदित तेहि पद पुरारि पुर,
कीट पतंग समाहीं।।
जोग कोटि करि जो गति हरि सों
मुनि माँगत सकुचाहीं।।

भगवान् राम की भक्ति और सकल सुख संपदा शिवभक्ति से मिल जाती है-
सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।
बिनु तव कृपा राम पदपंकज।
सपनेहु भगति न होई।।

और इसीलिये भगवान् राम ने अपने भक्त शिव से द्रोह करने वाले “सेवक” की निन्दा की है।और ऐसे दुष्ट को नारकी तथा दुर्बुद्धि कहा-

शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहिं न भावा।।
संकरबिमुख भगति चह मोरी।
सो नारकी मूढ़मति थोरी।।

कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरे।

लिंग थापि विधिवत करि पूजा।
शिव समान प्रिय मोहिं न दूजा।।

उत्तर काण्ड में तो श्रीराम की शिवभक्ति
पराकाष्ठा पर है,जिसे विनय पूर्वक कहा जा रहा है-

औरौ एक गुपुत मत सबहिं
कहहुँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर
भगति न पावै मोरि।।

इस प्रकार शिवद्रोह,भक्त द्रोह है।
और श्रीरामद्रोह, भगवद् द्रोह।

इसीलिये प्रेमस्वरूप प्रभु श्रीराम की प्रेमा भक्ति की प्राप्ति और जगत् को भक्ति की शिक्षा देने के लिए भगवान् उमामहेश्वर ने
अपना रुद्र रूप छोड़कर, अद्वितीय भक्त के मूर्तिमन्त सन्त श्रीहनुमन्त के रूप में
अवतार ग्रहण किया-

रूद्र रूप तजि नेह बस।
बानर भे हनुमान।।

हरिगुरू शरणम्।

आप हमारे अंशी प्रभु! मैं सर्वांश आपका विभु!

वेदवेदान्तवेदनाय,
वेदना न वर्तते।
किन्तु स्वानुभूतिकाय
प्राणवर्तना प्रवर्तते।

वेद वेदान्त जाने की अभिलाषा नहीं है।
लेकिन अपने आत्मा में ही,
जो सारे संसार का नाम -रूप
अनुभव करा रहा है,
उसे देखना चाहता हूँ।

वह निर्गुण भी निराकार भी।
सगुण वही है सदाकार भी।
नहीं हो रहा अनुभव उसका,
माया देती पहरा जिसका।।

माया के चट्टों बट्टों ने
किया हमारा बेड़ा गर्क।
मनुज शरीर निरर्थक होता,
नाहीं चलेगा कोई तर्क।

माया का परिवार बड़ा है।
” सुत” ” वित” “लोक”मनसि चढ़ा है।
नहीं पार इस परीवार से,
करता वार पै वार खड़ा है।।

हे! माया के सर्व अधीश्वर!
हमने किया सरेण्डर है।
आप सँभालो तो हम सँभलें
अब प्रचण्ड इसका डर है।

एक बार शरणागत होकर
तेरा मैं हूँ प्रभु! कह दे।
उसे “अभय” तत्काल “मुक्ति” दे,
यह संकल्प व्यक्त करते।।

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत् व्रतं मम।।
वाल्मीकि रामायण।
इसलिये-

दया करो हे देव! हारता,
मन माया में सदा रता।
आप हमारे अंशी प्रभु!
मैं सर्वांश आपका विभु!

।।हरिगुरू शरणम्।।

जो है वो दीखता नहीं। जो नहीं है वह दीखता है।

धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्।

अभ्युदय और निःश्रेयस
की सिद्धि कराने वाला धर्म

हम मनुष्य हैं इस स्वरूप
को धारण कराने वाला धर्म

और मनुष्यता आ जाने पर
सर्वत्र ” प्रेम” रूप दृश्य “वह”

प्रेम प्रकट घट-घट में बोले।
बिना प्रेम कोई नहिं डोले।
प्रेम बहे विश्वास श्वास है।
गुरु दिखलाए कटे फास है।

संसार में जो ” प्रेम ” है वह दीखता नहीं।
जो “संसार”नहीं है वह दीखता है।

गुरु तत्व (शास्त्र सन्त) “प्रेम” द्रष्टा है।
शरणागत अनुगत को दर्शयिता भी” वही”

सो जानै जेहि देहु जनाई।
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।।

।।हरिः शरणम्। गुरुः शरणम्।।