कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव-थाहा।।
उत्तरकाण्ड में कलिपावनावतार परम पूज्य गोस्वामी जी का विवेक, नामजप
की सुदृढ सम्मति व्यक्त करता है।
गुरु वन्दना और सज्जन-दुर्जन वन्दना के
उपरान्त बालकाण्ड में बाबा, इक्यानबे
चौपाइयों में नाम वन्दना करते हैं।
प्रारम्भ करते हुए कहते हैं-
बन्दउँ राम नाम रघुबर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
बिधि हरि हर मय बेद प्रान सो।
अगुन अनूपम गुन निधान सो।
राम नाम तो महाराज हैं।
अग्नि, और सूर्य चन्द्र के कारण हैं।
अतः उनसे बढ़कर हैं।
अग्नि जैसे सबको भस्मसात् कर देता है
वैसे ही नाम महाराज भी सभी दुष्कृतों
दैत्यों को जला डालते हैं। नामजप, वह सूर्य का प्रकाश है,जो
ममता-मोह की घनीअँधेरी रात में विचरने
वाले राग-द्वेष जैसे उलूकों को अपने प्रताप से भगा देता है- ममता तरुण तमी अँधियारी। राग द्वेष उलूक सुखकारी ।। तब लगि बसत जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु-प्रताप-रवि नाहीं।।
यह नाममहाराज, चन्द्रमा की शीतल चन्द्रिका की तरह चकोरवद् भक्तों को आनन्द प्रदान करते हैं।
बिधि(ब्रह्मा), हरि और शम्भु मय यह नाम तो सबका सर्वस्व मानो प्राण ही है। और देखिये, बाबा तुलसी के ही समकालिक भगवदाप्त महात्मा बाबा
मलूकदास,एकमात्र नाम- जप को जीव की सद्यः मुक्ति का कारण कहते हैं।
क्योंकि , नाम-जप तो अद्वितीय है।
यह कर्म – क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध
तीन प्रकार के स्वरूपों में क्रमशः बँटा है।
और नारायण! क्या कहें-
नाम-जप इतना शक्तिशाली है कि, यह
कर्मों की इस त्रिवेणी से निर्मित पुण्य और पाप के पर्वतको जला करके मानव जीवन को कृतकृत्य ही कर देता है।
पुनर्जन्म की जंजीर टूट जाती है-
राम नाम एकै रती, पाप कै कोटि पहार।
ऐसी महिमा नाम की,जारि करै सब छार।
क्या कहें-
एक से एक पद, सिद्ध सन्त बाबा मलूक
दास ने नाम महिमा के गाये हैं।
एक पद में बाबा, नाम को इस मलमूत्र के
पुतले(कीड़े) मानव शरीर को निर्मल करने में सर्वविध समर्थ और अमूल्य हीरा कहते हैं-
नाम तुम्हारा निरमला निरमोलक हीरा।तुम साहिब समरत्थ हम मलमूत्र के कीरा।
नारायण!पद तो बड़ा है लेकिन अर्थ बिलकुल स्पष्ट।
क्या महिमा है नाम की-
पाप न राखै देय इसे जब सुमरिन करिये।
इक अक्षर के कहत ही भवसागर तरिये।
अधम उद्धारन सब कहें प्रभु बिरद तुम्हारा। सुनि सरनागत आइया तब पार उतारा।
तुझसा गरुआ औ धनी जामें बड़ै समाई।
जरत उबारे पांडवा ताकी बार न लाई।
कोटिक अवगुन जन करै प्रभु मनहिं न मानै। कहत मलूका ” दास ” को अपना
करि जानै।
मानसकार बाबा ने भी यही भाव व्यक्त करते हुए कहा था-
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ ।
दीनबन्धु अति मृदुल सुभाऊ।।
साधक नाम जपहिं लव लाये।
होहिं सिद्ध अणिमादिक पाये।।
नारायण! राम कृष्ण हरि नाम कोई भी नाम हो , हमारी इस स्वाद लोलुप
जिह्वा को स्वाद आवे न आवे, जपकर
ही इसके लौकिक-अलौकिक प्रभाव को
जाना जा सकता है। और –
इसीलिये इस कलिकाल में भारत के पूर्व में अवस्थित , बंगाल की धरती के अपूर्व राधामाधव के अद्भुत अप्रतिम दिव्य
युगल अवतार श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने
अपने ” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य में
श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन को ऐसा कहा है,
वैसा कोई क्या कहेगा, यह कृष्णनाम – 1- चेतो दर्पणमार्जनम् है।
संसार के चाकचिक्य से मलिनातिमलिन
अन्तःकरण के चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ कर देने वाला है, जो मुक्ति का कारण बन जाता है- 2- भवमहादावाग्नि-निर्वापणम् है।
भवसागर रूपी दावानल की आग बुझा
कर शान्ति देने वाला है।3- श्रेयःकैरव-चन्द्रिका-वितरणम् है।
श्रेय और प्रेय दो मार्ग हैं। प्रेय, संसार की
प्राप्ति वाला और श्रेय, भगवत् प्राप्ति करा देने वाला है। इसलिये इस कृष्णनाम का जप, श्रेय रूपी चन्द्रमा की चाँदनी दे देता है। और जीवन सार्थक हो उठता है।
4- विद्यावधू- जीवनम् है ।
अनेकानेक शरीरों से हमने नाना प्रकार की विद्याओं का जो अर्जन किया है, वह
समस्त विद्याएँ वधू-स्वरूपा हैं। यह नाम
तो इन विद्याओं का जीवन अर्थात् पति है। इस श्रीकृष्ण नाम जप- कीर्तन रूपी
स्वामी(पति) के बिना विद्या-वधू तो
विधवा है।
इसके अभाव में यह उच्छृंखल हो जायेगी और सारी विद्यायें अपना स्वत्व खोकर, मानव जन्म को ही व्यर्थ कर देंगी।
5- आनन्दाम्बुधि – वर्धनम् है।
यह नाम जप, आनन्द -समुद्र में
वृद्धि करने वाला है।6- प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् है। एक- एक नाम जप/कीर्तन से हमारी मलिन जिह्वा, सम्पूर्ण अमृत का स्वाद लेने वाली बन जाती है। 7- सर्वात्मस्नपनम् परम् है।
शरीर तो गंगादि नदियों में स्नान कर
पवित्र हो जाता है, लेकिन आत्मा का स्नान, तो नारायण! इसी राम-कृष्ण नाम
से ही हो सकता है।
इसलिये गौरांग महाप्रभु, अपर नाम श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने अपने इस
” शिक्षाष्टक ” के प्रथम पद्य की पूर्णता पर कहा-
यह श्रीरामकृष्ण संकीर्तन तो नाना जीव जीवनान्तर के अभीष्ट सायुज्य,
सामीप्यादि मुक्ति रूपी परम विजय को दिलाने वाला अमोध अस्त्र है-विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्
गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्।