सन्त भक्त चरित्रों का मनोरमण
तो भगवती जगदम्बा जानकी
सीता राधा और विन्ध्यविहारिणी
विन्ध्यवासिनी के विहार विपिनों
में ही होता है।इन सन्त-भक्तों की चार कोटियाँ
गीतागायक गाते हैं-
आर्तः जिज्ञासुः अर्थार्थी
ज्ञानी च भरतर्षभ ।
उक्त सभी सन्त तो, भगवान् की
सुमधुर लीला के लोभी हैं।
लोभ संवरण करना भी इनके वश
में नहीं है।
अतः ये सभी , मिथिला में
आकर निवास करने लगते हैं। अब
लीला-धारी क्या लीला करते हैं।
रसिक दृष्टिपात करें। यज्ञ रक्षार्थ भगवान्
श्रीराम ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के साथ
पधारते हैं।
यज्ञ -कार्य निर्विघ्न पूर्ण
कराते हैं। यज्ञ परिसमाप्ति होते
ही मिथिला-नरेश श्रीजनक जी
का आमन्त्रण, श्रीविश्वामित्र जी को
सीतास्वयंवर में सपरिकर
पधारने के लिये प्राप्त होता है।
भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के
साथ , महर्षि, मिथिला पहुँचते हैं। सुन्दर पर्ण -कुटीर में सादर ठहराया
जाता है।
मिथिला वासी भक्तों को दर्शन
देने और उनकी श्रद्धा फलीभूत करने
के लिये जीवाचार्य शेषावतार
लक्ष्मण जी को ब्याज बनाया जाता
है। भगवान् विश्वामित्र जी से कहते हैं-
लखन हृदय लालसा विसेषी।
जाइ जनक पुर आवहुँ देखी ।।
नाथ लखन पुर देखन चहहीं।
प्रभु सकोच डर प्रकट न कहहीं।।
जौं राउर अनुशासन पावौं।
नगर देखाइ तुरत लै आवौं।।
गुरु आज्ञा मिल जाती है ।
भगवान् मिथिला नगरी में जाकर
अपने दर्शन से सभी को कृतार्थ
करते हैं। लगता है कि-
जल्दी -जल्दी नगर दिखा कर
मानों भगवान् भयवश लौट आए।
वस्तुतः भगवान् अपने अत्यन्त
आत्मीय ऋषि मुनि सन्त भक्त
के द्वारा विहित अनन्या भक्ति
का प्रभाव दिखाने के लिए
डर का नाटक करते हैं-
जासु त्रास डर कहुँ डर होई।
भजन प्रभाव देखावत सोई ।।
रात्रि में ” गुरु पद कमल पलोटत प्रीते”
“बार-बार मुनि अग्या दीन्ही”
तब जाकर शयन करते हैं।
सम्पूर्ण प्रातः कृत्य पूरा कर गुरु
आज्ञा से वाटिका में पुष्प चयन
के लिये जाते हैं-
समय जानि गुरु आयसु पाई।
लेन प्रसून चले दोउ भाई।।मिथिला नरेश के बगीचे में
भगवान् का आगमन जान
वसन्त ऋतु भी लुब्ध होकर
आ बसी है-
भूप बाग बर देखेउ जाई।
जहँ बसन्त ऋतु रही लोभाई।।
अब उपयुक्त अवसर जान कर सभी
भक्त सन्त भी चार पक्षियों का रूप
धरे वृक्षों पर आ विराजते हैं।
देखिये –
आर्त( प्रेमी) भक्त तो चातक बने हैं।
जिज्ञासु सन्तभक्त कोकिल रूप धरे हैं।
अर्थार्थी भक्त कीर (शुक) रूप में हैं।
ज्ञानी भक्तों की शोभा चकोर मण्डली
के रूप में मन्त्र मुग्ध है।
चातक कोकिल कीर चकोरा।
कूजत बिहग नटत मन मोरा।।
इन सभी सन्तों का मन – मयूर नाच
रहा है, पक्षी रूप में सभी
आनन्द विभोर हैं।
आखिर दर्शनीय तो भगवान् ही हैं।
इन्ही की रूपमाधुरी का वर्णन
सभी ओर हो रहा है-
जहँ तहँ छवि बरनत सब लोगू ।
अवसि देखिये देखन जोगू।।
भैया! यह सीता-वाटिका अनुपम
है। इसमें विद्यमान पादप-वृक्ष
पत्ते- फूल-फल सभी ने ” मैथिली”
के हाथों का स्पर्श जो पाया है।
जानकी के चरण-कमलों के “चिन्ह”
जहाँ विलास करते हुए आनन्दित हैं।
सीता और वहाँ वर्तमान सीतापति का
यशोगान करती हुई उक्त
1- आर्त(चातक)
2-जिज्ञासु(कोकिल)
3- अर्थार्थी (शुक)
4- ज्ञानी ( चकोर)
सन्तों की विहग-मण्डली विराज रही
है। और सोचिये ऐसी विहार-वाटिका
में ही भगवत्प्रेमी सन्तो का मनोरम
“मन” रमता है।
रमन्ते योगिनः सन्तः भक्ताः
यद्रूपमाधुर्यां रामा-रामयोः
तत् कथं
नाश्रीयताम्? अत एव –
सीता-करावचित-पल्लव-वल्लरीके ,
सीता-पदाङ्क-विलसन्मधुरस्थलीके ।
सीता-यशो-मुखर-मत्त-खगावलीके,
सीता-विहार-विपिने रमतां मनो मे ।
गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।