हरिजन कहिं – कहिं होय

सन्त तो दुर्लभ हैं लेकिन भगवान्
सुलभ।
श्रद्धा भक्ति प्रेम सत्य करुणा से
मिल जाते हैं सर्वत्र-

हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।

सन्त क्या हैं?

सन्त सभा अनुपम अवध ।
सकल सुमंगल मूल।

सन्तों की उपमा या समता किसी से
भी सम्भव नहीं।

हाँ यह सन्त समूह ” अवध ” हो तो हो
सकता है, जो सारे मंगलों का मूल है।वस्तुतः सन्त तो समान चित्त वाले हैं।

इनका अपना कोई हिताभिलाष नहीं।
किसी प्रकार का उँच-नीच गत भेद-भाव
भी इनमें नहीं है।

एक हाथ से जब फूल तोड़कर
दूसरे हाथ में रखा जाय, तब एक जैसा
सुगन्ध दोनों ही हाथों में होता है।

एक हाथ तो फूल तोड़ने वाला होने से
तोड़ने से अपराधी(भक्षक) है तो
दूसरा उसे अपने में रखकर, सुरक्षा देने
से रक्षक भी ।
लेकिन “पुष्प” तो शरणागत सन्त
भक्त की तरह है, जिसे किसी भी
भक्षक या रक्षक,हाथ से कोई गिला
शिकवा नहीं।

पुष्प की भाँति, सन्त, तो दोनों हाथों
को समान सुगन्ध से सुवासित
करते हैं। अतः हमारे लिये सभी सन्त
वन्दनीय हैं-

बन्दउँ सन्त समान चित,
हित अनहित नहिं कोउ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि,
सम सुगन्ध कर दोउ।।

अब इसीलिये “भक्तमाल” ग्रन्थ का
प्रतिपाद्य ही भगवद् भागवत् या
भगवान् भक्त का भजन है-

“भजिबे को दोऊ सुघर कै हरि कै
हरिदास।”

ये हरिदास तो भगवान् के भक्त
निष्कामी साधु ही हैं।

भगवान् की चरण शरण ही इनकी
एक कामना है।
वे जैसे रखना चाहें रखें उनकी मर्जी।

“भागवत” के एकादश स्कन्ध के
चौदहवें अध्याय में भगवान् ने इन
साधु भक्तों को अत्यन्त निष्कामी
कहा है- इन सन्तों के लिये ब्रह्मा और इन्द्र

का साम्राज्य व्यर्थ है।
धरती का एकच्छत्र राजत्व
इन्हें नहीं चाहिए।
योग की सिद्घियाँ और मोक्ष भी
इन्हें तुच्छ प्रतीत होती हैं।
ये सन्त स्वयं को भगदर्पित कर
देते हैं, और इन्हें भगवान् और उनकी
आज्ञाकारिता के सिवा कुछ भी
अपेक्षित नहीं है-

न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं ,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं ।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,
मयि अर्पितात् मेच्छति मद बिनान्यद् ।

इसलिये भगवान् का अर्चावतार उनकी
मूर्ति के रूप में तो सर्वत्र है।
हम श्रद्धा विश्वास से पूजते ही हैं।
लेकिन साधु सन्त तो हरिकृपा और
पुण्यसमूह के इकट्ठा होने पर,
बड़ी कठिनाई से मिलते हैं-

हरि दुर्लभ नहिं जगत् में,
हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेर् याँ सब जग मिलै,

हरिजन कहिं-कहिं होय।।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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