कहत साधु महिमा सकुचानी

बड़े-बड़े पतितों के कल्मष का काल ,
बनी कल कल निनादिनी गंगा ।

उस गंगा का पाप धो देते हैं,
साधु।

इसलिये साधु महिमा कहना
कठिन है । साधु और गंगा की प्रकृति एक है, वह है पाप प्रक्षालनता ।

“दर्शनादेव साधवः” और

गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः । दर्शन मात्र से जीवन-मुक्त करनेवाले दोनों

लेकिन गंगा का भी पापताप
सन्ताप धोने वाले होने से
साधु/ सन्त श्रेष्ठ हैं। क्यों नहीं हों? एक अर्थ तो साधु का यह कि

पर- कार्य को साधने वाले होते हैं। इन साधुओं का स्वयं का अपना

अपना कोई स्वकार्य ही नहीं है।

नदी,वृक्ष ,पर्वत धरती की तरह सन्त
भी परहित पूरा करने के लिये
भगवान् की आज्ञा से जन्म लेते हैं-

सन्त विटप सरिता गिरि धरनी ।
पर हित हेतु सबन्हि कै करनी ।।

यह तो अपना परम (चरम) और
अन्तिम हित,पहले ही सिद्ध
कर चुके होते हैं। नारायण!
वह है परम परात्पर परब्रह्म
परमात्मा की प्राप्ति ।

इसलिये दूसरों (पर) के कार्य का सिद्ध करना ही इनका अशेष शेष
कार्य है।

साध्नोति परकार्यम् परकार्याणि वा
इति साधुः । मतलब कि – 1- पर अर्थात् दूसरों का कार्य साध

देना।
इस तरह एक अर्थ इस शब्द
से ही प्रतीत होता है।

2- अब दूसरा अर्थ है पर यानी कि
परमात्मा से ही मिला कर दूसरों का
भी अन्तिम लक्ष्य पूर्ण कर देना-

साध्नोति परं परमात्मानम् इति साधुः परोपकाराय सतां विभूतयः

परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर

“अजामिल” को सन्त मिले और उसके
द्वारा पुत्र के बहाने से ” नारायण “
नाम लेने पर, उसका पापक्षय हुआ।
और परमात्मप्राप्ति भी हो गई।

परमहंस श्रीरामकृष्ण देव ने
विवेकानन्द स्वामी को
माँ काली का दर्शन करा कर
उनका परम लक्ष्य दे दिया। "नाम सप्रेम जपत अनयासा।

भगत होहिं मुद-मंगल-वासा ।।” नामजापक विभीषण को

भक्तराज श्रीहनूमान् जी दर्शन क्या
हुआ, उसको श्रीराम जी की ही
प्राप्ति हो गई। लंका का राज्य
भोग कर रमावैकुण्ठ मिला।

भैया! क्या कहें, चन्द्र और सूर्य
अलग -अलग समय में उगते हैं,
सन्त तो एक समय में, एक साथ
दोनों बन जाते हैं।
सूर्य बनकर पापराशि जलाते हैं।

तो, चन्द्रमा बनकर शीतलता से
“परमशान्ति” रूप “परममात्मा”
की प्राप्ति कराते हैं-

“सन्त उदय सन्तत सुखकारी।
विश्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।।”

इसलिये पर (दूसरों) के दोनों
हित – संसारलोक/ परलोक
रमावैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कराने
साधु सन्तों की महिमा कौन कहे?चाहे वह कोई भी -

“विधि-हरि-हर कवि कोविद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।”

संकोच लगता है भगवान् को भी
अपने प्राणप्यारे साधुसन्तों का
यश कहने में।
क्योंकि कि ये सन्त तो भगवन्त
से भी एक कदम आगे हैं।आत्मरूप परमात्मरूप होने

लगता है, भगवान् को इन सन्तों
का यशोगान अपना स्वयं का
यशोगान लगता है।
आपन मुँह आपन करनी
बखानना तो धृष्टता है।

इसलिये बाबा का सिंहनाद
जोर-जोर से जोरदार कई बार

बिधि हरि हर कवि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।

हरिः शरणम् । गुरः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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