सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं

आखिर सन्तों के पक्ष में क्यों ऐसा
पतन,कि इनके मिलन के समान
लोक/अलोक का कोई सुख नहीं। बाबा की बात है। कौन अकड़ेगा ।

सोचना तो पड़ेगा ।

वस्तुतः गंगा जब पापियों के पाप से
सपाप होती है, तब सन्त इसे,
निष्पाप बनाते हैं ।

श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध के नवें
अध्याय में एक प्रसंग है-
गंगा-भगीरथ का संवाद ।

अपने पितरों के सन्तरण हेतु भगीरथ
कठोर तपश्चरण रत होते हैं ।

श्रीविष्णु-पादाब्ज-जाता , भगवती
गंगा धरती पर आकर सगर-पुत्रों को
तारने के लिए उद्यत होती हैं। किन्तु एक बड़ा प्रश्न हो गया खड़ा । गंगा ने भगीरथ से कहा- मैं आपके

पितरों को तारने को तैयार हूँ।

लेकिन, अनेक पापिष्ठ लोगों के मल से
जब मैं भी मलिन हो जाउंगी तब
हमारा मालिन्य कौन धोयेगा ?

भगीरथ ने माँ गंगा से कहा – साधवः न्यासिनः शान्ताः , ब्रह्मिष्ठाः लोकपावनाः । हरन्ति अघं तेङ्गसङ्गात् , तेषु आस्ते हि अघभिद् हरिः।।

साधु/सन्त
मतलब कि – साधु सन्त जो
परहित हेतु भगवदाज्ञा से आते हैं, वे
आपका मालिन्य धोयेंगे।
साध्नोति परकार्यम् इति साधुः ।

न्यासी, यानी कि एषणा त्रय,
सुत-वित-लोक की अभिलाषा
का न्यास “सत्” में करनेवाले सन्यासी
अपने दण्डादि सहित स्वयं आपके
जल में उतर कर आपके पाप
का प्रक्षालन सर्वहित में करेंगें।

जिनका संसार-समुद्र किसी चन्द्र को
देखकर कभी हिलोरें नहीं मारता, ऐसे
शान्त, मन-बुद्धि-चित्ताहंकार वाले
महात्मा आपको निर्मल करेंगे ।

ब्रह्म के दो अर्थ हैं- वेद और परब्रह्म।ब्रह्मिष्ठ अर्थात् अमृतवद् वेद और ब्रह्मवेत्ता " ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"

जैसे ब्रह्मपरायण आपका पापसन्ताप
पराजित करेंगे। लोक को अपने मनवचनकर्म से

पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु आपकी –
पाप राशि को जीर्ण-शीर्ण (विनष्ट) कर
डालेंगे।
इसलिये कि हे गंगे! उनका
अंग-संग आपको मिलेगा ।

अब सबसे बड़ी तो ये है कि करेंगे कैसे
ऐसा दुःसाहसिक कार्य?

करेंगे अवश्य क्योंकि इनके हृदय में
“अघासुर” जैसे मूर्तिमान् अघियों
का घात करने वाले
भगवान् श्रीहरि जो विराजे हैं।

श्रीहरि जिन सन्तों के हृदय में
प्रतिष्ठित हो गये हैं, ऐसे-
हनुमत् शुकसनकादि
नारद, व्यास-वाल्मीकि, तुलसी,
ही ऐसा करने में समर्थ हैं।

इनका समाज तो मुदमंगलमय है।
ये सन्त तो चलते फिरते तीर्थराज
प्रयाग हैं।
ये साधु सभी स्थानों पर, सदैव
सभी को आसानी से मिल जाते हैं।
और इनका सेवन सभी का क्लेश- हर्ता
बन कर भवसिंधु से तार देता है-

सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा।
सादर सेवत समन कलेसा।।

सन्त-त्रिवेणी में सानुराग स्नान करने
वाले लोग, धर्मार्थकाममोक्ष भी इसी
शरीर के रहते पा जाते हैं-

सुनि समुझहिं जन मुदित मन,
मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु,
साधु- समाज प्रयाग ।।

इसीलिये, असहज को सहज, मलिन
को निर्मल बना कर भगवान् को ही दे
देने वाले परोपकारमूर्ति सन्त,

पतितपावनी गंगा को निर्मल बनायेंगे
ऐसा भगवद्- भागवद् वचनों पर
विश्वास करना चाहिए-

पर उपकार वचन मन काया।
सन्त सहज सुभाव खगराया।।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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