भवसिन्धु बिना जलजान

इस भवाब्धि के पार जाने के लिये
गुरु कृपा अनिवार्य है।और

वस्तुतः गुरु तत्व तो भगवत् तत्व
ही है।

गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः गुरुः देवः महेश्वरः अब देखिये, शास्त्र और सन्त वचनों

पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
भगवान् के परम पावन नाम ही
ही इस युग में परम कल्याण कर्ता हैं।राम सकल नामन ते अधिका । होहु नाथ अघ खग गन बधिका।।

नीलोत्पल तन श्याम ,
काम कोटि सोभा अधिक ।
सुनिअ तासु गुन ग्राम ,
जासु नाम अघ खग बधिक ।।

नीलाम्बुज श्यामल कोमलांग प्रभु हैं ।
क्योंकि जगत् के प्रमुख रंग तमस को
रजस में और रजस् को सत्व गुण में
अन्तरित करके, उससे ऊपर की
गुणातीत अवस्था में पहुँचा देते हैं।इसलिये कि प्रभु भी स्वयं गुणातीत ही

हैं। और गुणातीत हुए बिना संसारातीत
स्थिति की कल्पना स्वप्न है।

संसार का मोह ,अविद्या, माया तो
पंच क्लेश की परधि है।
नाना शरीरों से एकत्रित ये
अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष और
अभिनिवेश तो नामादि जप से
गुरु/भगवत् तत्व की प्राप्ति से ही
जायेगें ।

अज्ञानपूरिता माया अविद्या है। यह जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनायित्री है।

भगवान् अपनी चिरसंगिनी और सदैव
उनसे अभिन्न (कहियत भिन्न न भिन्न)
” विद्या माया ” के संकल्प से सृजन
आदि कराते हैं –

वह विद्या माया जगदम्बा जानकी हैं-

यही सृजनादि कराती हैं। करती नहीं।

पंचक्लेश को हरती, प्रेयमार्ग से विरत
करके श्रेयमार्ग दात्री हैं। हम शरणागत
हैं। अन्यदुपाय नहीं-

उद्भव- स्थिति-संहार-कारिणीम्
क्लेश – हारिणीम् ,

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं,
रामवल्लभाम् ।

नारायण! क्या कहें, यह – अहं ही अस्मिता। और अभिमान, अहन्ता है।

ममता,मेरा शरीर संसार, और उसमें
किसी वस्तु-व्यक्ति-पद-पदार्थ के
लिए काम /राग बुद्धि ” राग” है। और
किसी संसारी वस्तु आदि के लिए
राग न रहने रुप शत्रु भाव ही
द्वेष है।
अथवा संसार मैत्री और शत्रु भाव को “राग” और ” द्वेष ” कहेंगे।

किसी संसारी वस्तु आदि को स्वयं
अपने रुचि के अनुकूल होने से
उसे भ्रमवश मनोनुकूल मानना
“अभिनिवेश” है। अब उपर्युक्त दोषों को दूर करने

वाले भगवान् ,तद्भिन्न भगवती वैष्णवी
शक्ति विन्ध्यवासिनी हैं।

मार्कण्डेय ऋषि ने कहा –

त्वं वैष्णवी शक्तिः अनन्तवीर्या ,
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतद् ,
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः । गुरु रुप में उपजे "कृपासिंधु नर रूप हरि" कृपालु और तच्छक्ति की चरण शरणग्रहण से

से ही पंचक्लेश नाश होगा

यह, भगवन् नाम रूप गुण लीला धाम
ही है जो व्यपाश्रित जीव को आश्रय
प्रदान कर पुनः शरीर के आदान
से बचा लेगा ।

कम से कम बाबा तुलसी की बुध्दि तो
यही निर्धारित करती है-

सकल सुमंगल दायक,
रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं
भवसिंधु बिना जल जान ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment