भगवान् की कथा का कोई पारावार नहीं।
“चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्”
रामायण शत कोटि अपारा
अनन्त ब्रह्माण्डों में विचरते हुए
श्रीकागभुशुण्डि जी कई कल्पों तक
उन ब्रह्माण्डों में रहकर श्रीरामलीलाकथा
रस का पान करके लौटते हैं।भाव विभोर हैं।
इधर बालकाण्ड में बाबा तुलसी ने इस रामकथा की उत्पत्ति सुनाई है।
यह कथा देवाधिदेव,भगवती उमा को सुनाते हैं। और वे ही इस कथा को, योग्य
अधिकारी श्रीकागभुशुण्डि जी को देते हैं।
इनसे यही कथा पाकर याज्ञवल्क्य जी
भरद्वाज ऋषि को सुनाते हैं –
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा।।
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा।
रामभगत अधिकारी चीन्हा।।
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा।
तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।
और देखिये, यह रामलीला कथा पुनः
उत्तरकाण्ड में श्रीगरुड जी ने, इन्ही
कागभुशुण्डि जी से सुनी है।
यह कथा, इस कलिकाल में अभीष्ट सिद्धि देने वाली, सज्जनों की संजीवनी बूटी,और इस धरती पर तो मानो
अमृत की नदी है।
संसृति से मुक्त करने वाली तथा समस्त
अविद्या माया के भ्रम -संशय को दूर
करती है।यह तो भ्रम रूपी मेंढक को
लीलने वाली लीलाकथा है।
क्योंकि “संशयात्मा विनष्यति”
भगवद् वचनों से जीव का आपातपतन
तो संसारानुरक्ति से सुनिश्चित है। अतः
रामकथा कलि कामद गाई।
सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।
सोइ वसुधा तल सुधा तरंगिनि।
भवभंजिनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।
यहाँ उत्तरकाण्ड में गरुड जी इस कथा
को सुन कर वैसे ही धन्य हैं, जैसे कि
जगदम्बा पार्वती जी।
कागभुशुण्डि जैसे रामभक्त/ सन्त को
पाकर गरुड विह्वल हैं, तो ऐसे ही अपूर्व
रामानुरागी भगवान् शिव को पाकर
अपर्णा पार्वती –
धन्य धन्य गिरिराज कुमारी।
नहि कोउ तुम्ह समान उपकारी ।।
गरुड जी ने कहा-
आजु धन्य मैं धन्य अति,
यद्यपि सब विधि हीन।
निज जन जानि राम मोहिं,
सन्त समागम दीन्ह ।।
तब कागभुशुण्डि जी बोले –
जिन भगवान् की महिमा वेद, नेति-नेति
(इतना ही नहीं, इतना ही नहीं बल्कि
इससे भी आगे और ) कहकर गाते हैं,
उनका अतुलनीय बलप्रतापप्रभुत्व ,
कोई कह नहीं सकता-
महिमा निगम नेति करि गाई।
अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।
इनके स्वभाव जैसा कोई देखा सुना नहीं
गया है। इनके समान कोई नहीं।
अस सुभाव कहुँ सुनहुँ न देखहुँ।
केहि खगेस रघुपति सम लेखहुँ।।
अधमाधम प्राणी को भी तारना इनकी
प्रकृति है। अभिमान तो स्पर्श करता
नहीं। अपने किये कामों का श्रेय औरों
को देते हैं।
राक्षस -वध का श्रेय गुरुश्रेष्ठ
वशिष्ठ और वानरों को देते हैं।
क्योंकि श्रीराम जी ने कहा था –
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।
भये समर सागर कहुं बेरे।।
गुरु बसिष्ठ कुल पूज्य हमारे।
इनकी कृपा दनुज रन मारे।।
ऐसे प्रभु की लीलाकथा रस का सेवन
किये बिना – साधक, सिद्ध, विमुक्त,
उदासीन, कवि, विद्वान्, परोपकारी,
सन्यासी, योगी,बलिष्ट, तपस्वी, ज्ञानी,
धर्मशील पण्डित और विशिष्ट ज्ञान से
परिपूर्ण कोई भी प्राणी सृष्टि चक्र से
पार नहीं पा सकता-
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी।
कवि कोबिद कृतग्य सन्यासी।।
जोगी सूर सुतापस ग्यानी।
धर्म निरत पंडित विग्यानी।।
तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी।
राम नमामि नमामि नमामी।।
इसलिये इनके नाना रूप लीला धाम
का आश्रय लेना ही पड़ेगा।
कबीर ने कहा था कि इस माया और
इसके संसार ने ब्रह्मा,शिव आदि को भी
आकृष्ट कर लूट लिया था। औरों की
बात क्या?
गुरु कृपातः प्राप्त वह रामशब्द ही था
जिसने रूपलीलाधाम की अविचल
स्मृति कराते हुए तार दिया, पार दिया-
रमैया की दुलहन ने लूटल बजार
ब्रह्मा को लूटल, शिव को भी लूटल,
लूटल सकल संसार।
कबिरा बच गया साहब कृपा से
सबद डोर गहि उतरा पार ।।
कबीर ने नाम जप से लीला की
अविस्मृत स्मृति में विमुग्ध कुष्ठीकाया
की प्रसंशा की। और सुन्दर शरीरों
की निन्दा भी,जिनके मुखों में राम नहीं
रमता-
नाना जपत कुष्ठी भलो,
चुइ चुइ गिरै जो चाम ।
कंचन देह न काम की,
जिन मुख नाहीं राम ।।
इसलिये कागभुशुण्डि जी महाराज ने
अपने लीलाकथामृत प्रसंग में भगवान्
के नाम चरित्र को अपार-अथाह कह
डाला, जिसके सेवन से ही
संसार में थाह पाया जा सकता है-नाम यथामति भाषेउँ, राखिउँ नहीं कछु गोइ। चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावै कोइ।।
गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।