भगवान् की जिस कथा के निरन्तर श्रवण करते-करते,हमारा कलुषित चित शुद्ध
हो जाता है।
अपवित्र वाह्य आभ्यन्तर काया को, जो भगवान् स्मरण मात्र कर लेने से पवित्र कर देते हैं।
और स्वयं बारम्बार नामरूप स्मरण
तथा कथा-श्रवण से जो भक्त हृदयों में
विराजते हुए अपनी साक्षाद् अनुभूति
ही करा देते हैं, ऐसे आनन्दकन्द भगवान्
और उनकी कथा को सतत प्रणाम ।
भगवान् की ऐसी जनमनरंजिनी कथा, जिसे –
रचि महेस निज मानस राखा
पाइ सुसमउ शिवा सन भाषा।।
जैसे भक्त-हृदय तुलसी के हृदय में क्यों
न विराजे और श्रीरामचरितमानस के
रूप में कल्याणकरिणी हो जाय ।
सन्त संगति वश सुनी जाती हुई वह कथा
स्वयं के प्रति ,प्रीति जगा देगी ही । क्योंकि यह विद्वानों को शान्तिदात्री, समस्त रसिकों को मोदप्रदात्री और कलियुग के कालुष्य की नाशकर्त्री है। सर्प को काट खाने वाली मोरनी है।
विवेकशक्ति रूपी अग्नि को जलाने वाली
अरणि( लकड़ी) है-
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि ।
राम कथा कलि कलुष विभंजनि।।
राम – कथा कलिपन्नग भरनी।
पुनि बिवेक पावक महुँ अरनी ।।
यह तो चन्द्रमा की चन्द्रिका है, जिसका
सन्त/भक्त चकोर बन कर पान करते हैं
यह कामधेनु है ,जो सेवन करने पर सब सुखों को देने वाली है।
सज्जन-समाज और देववृन्द ऐसी कथा अवश्य ही सुनते हैं-
रामकथा ससि किरन समाना।
सन्त चकोर करहिं जेहिं पाना।।
राम कथा सुर धेनु सम,
सेवत सब सुख दानि।
सत समाज सुर लोक सब,
को न सुनै अस जानि ।।
और क्या -क्या कहें , मन ही नहीं भरता
मोह सकल ब्याधिन कर मूला ।
ताते उपजहिं बहु बिध सूला।। जैसे इस कलि काल में शस्त्रसज्ज
महामोह रूपी महिषासुर के लिए यह
साक्षाद् महिषासुर मर्दिनी दुर्गा है-
महा मोह महिषेस विसाला।
राम – कथा कालिका कराला । और
हाथ की ताली की तरह सुन्दर यह
कथा तो, संशय – पक्षी को उड़ा कर
भगा देती और सारा भ्रम नष्ट –
रामकथा सुन्दर करतारी।
संशय बिहग उड़ावन हारी।।
इसे सुनकर जिनका मन भर गया, तो
यह समझिये कि ऐसे लोगों ने –
” रसो वै सः। रसं हि एव अयं लब्ध्वा
आनन्दी भवति । “
जैसे रस/आनन्द विशेष परमात्मा को जाना ही नहीं –
रामकथा/रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेस जाना तिन नाहीं ।।
तो इसलिये जिन रसिकों के कर्णेन्द्रिय
समुद्र के समान हैं,उनके लिए कथा तो
ऐसे सुन्दर सरोवर के समान है ,जो
निरन्तर कथाजल से भरते हुए भी
कभी भरने का नाम नहीं लेती।
और ऐसे श्रेष्ठ भक्तों के हृदय में
परमात्मा विराजते हैं-
जिनके श्रवण समुद्र समाना ।
कथा तुम्हारि सुभग – सर नाना।।
भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे ।
तिनके हियँ तुम्ह कहुँ गुह रूरे ।।
इसलिये भगवान् की कथा सदैव
आश्रयणीय है। जिसके श्रवण मात्र
से भगवान् स्वयं आकृष्ट होकर , राम(रमने वाले) कृष्ण (आकृष्ट होने/होवाने वाले) नाम को सार्थक करते हुए
आकर भक्त हृद्देश को प्रतिष्ठित करते हैं-
अतः भगवत् भागवत् माहात्म्य है-
सेव्या सेव्या सदा सेव्या
श्रीमद्भागवती कथा ।
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिः
चित्तं समाश्रयेत् ।।
गुरूः शरणम् । हरिः शरणम् ।