जहाँ राजा राम बसते हैं,वही उनकी राजधानी है। नाम है, अवध । अवध क्या है? जहाँ किसी के वध का भाव ही नहीं आये।
आचरण की बात तो कहीं नहीं है।
वध शब्द, हिंसा का अर्थ देता है।
तब अवध का अर्थ है ,अहिंसा।
अब देखिये , हिंसा शब्द के दो अर्थ हैं।
हन् हिंसागत्योः, के विमर्श में हिंसा के दो अर्थ हो गये।
एक , हिंसा का अर्थ वध है।
दूसरा गति अर्थवाला है।
दूसरे अर्थ की ओर दृष्टिपात करें, तो
गति न होना ।
मतलब कि , अयोध्या -अवध ,वह क्षेत्र है, जहाँ मानव शरीर मिला तो , तो वह अक्षत-अव्यय स्वरूप हो गया।
तात्पर्य यह कि, वह दूसरे शरीरों में गति नहीं करेगा। अन्यत् जन्म ही नहीं होगा।
और फलतः मानव शरीर मिलना सार्थक
हो गया ।
और मानव शरीर ही क्यों, यह अवध क्षेत्र ऐसा है ,जहाँ विराजे भगवान् श्रीराम
का नाम -जप -स्मरणादि करने से ,इस
नाम को सुनने वाले मानवेतर प्राणी भी
तर गए ।
भगवान् ने नीच से नीच हिंसक प्राणियों
को भी रामावतार में तार दिया।
शबरी ,गीध सुसेवकन्हि सुगति दीन्हि
रघुनाथ ।
नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं ।
सुजन विचार करहुँ मन माहीं ।।
नारायण! श्रीरामकृष्ण नारायण नाम के
स्मरणोच्चारण से यह, दुःखालयम् अशाश्वतम्, संसार-समुद्र ही सूख कर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।
क्योंकि –
सो सुखधाम राम अस नामा ।
अखिल-लोक दायक विश्रामा
सुखनिधान भगवान् ही हैं।
वे ही समस्त प्राणी के आश्रयदाता हैं।
सुख के धाम हैं।
इसीलिये नाम का आश्रयी तो
वस्तुतः रामाश्रयी है ।
अतः ऐसा रामनामाश्रयी उस स्नेह मूर्ति में डूबने वाला तो, डूबकर तरेगा ही।
वह रामनाम के प्रसाद से ,प्रसन्नता से
आनन्द में मग्न होकर मुक्त विचरता है-
फिरत सनेह मगन-सुख अपने।
नाम-प्रसाद सोच नहिं सपने।।
स्वप्न मेंं भी स्वप्नवत् संसार की सोच यानी
कि शोक नहीं होगा।
इसलिये कहा कि सुर-नर-मुनि की वाणी
रामनाम और इनके गुणगणों को गा रही है –
गावत गुन सुर मुनि नर बानी।
राजा राम अवध रजधानी ।।
गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।