सततं श्रीरामनामामृतम्

नारायण! यह कलिकाल मलायतन है।
श्रीकृष्ण और श्रीराम नाम के मनन के
बिना पतन के गर्त में डाल ही देगा-

यह कलिकालमलायतन
मन करि देखु बिचार।
श्रीरघुनाथ नाम तजि
नाहिन आन अधार ।।

यह युग, यज्ञ-योग-ज्ञान का नहीं, आधार
तो केवल राम नाम ही है-

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम- गुन गाना।।

सब भरोस तजि जो भज रामहिं।
प्रेम समेत गाव गुन- ग्रामहिं।।

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं।
नाम प्रताप प्रकट कलि माहीं।।

हे प्रभु! आप ही केवल-

शान्त, शाश्वत, अतुलनीय, अव्यर्थ, निर्वाण और शान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शिव, शेष जी के सेव्य,वेदवेदान्तवेदद्य तत्व,
सर्वव्यापी, ब्रह्मांड गुरु, माया-पुरुष,
और करुणानिधान हैं।

राम भजो राम भजो राम भजो बावरेइसके बिना इस युग में कोई भक्ति ज्ञान और वैराग्य का अपर साधन नहीं।

कलि ना बिराग जोग संजम समाधि रे।
राम नाम ही सो अन्त सबही को काम रे।

ए मेरी रसने! संसार रस में रची रसी पगी
जगी सगी होना इसलिये सुहाता है कि,
इस मलमूत्र के पात्र(बर्तन) में वह, सर्व
कारण कारण सुखानुभूति का अनुभावक , परमरम्य राम जो बैठा है।

उसके अन्तः में बसने से ही सारी कान्ति
अशान्ति शान्ति भ्रान्ति भासती है।

अतः सर्वानुभव कारण की अनुभूति कर धन्य है ,वह पुण्यशाली, गुरुपदानुरागी,

जो सतत श्रीकृष्णराम नाम अमृत का पान करता रहता है।
यह,अमृत तो ब्रह्म(वेद) सिन्धु से निकला हुआ है। सज्जनों की जिह्वा पर विराजता है।
कलिमल को निर्मूल कर नष्ट ही कर डालता है ।
अनंगअराति त्रिलोचन के मुखचन्द्र में सदा सर्वदा विराजित यह श्रीरामनाम,
भक्तों को मुक्ति बाँटता है ।
संसार- रोग का शमन करने वाला
संसृति – चक्र से छुडा़ने वाला और समस्त सुखों का मूल भी है ।

अतः हम जनकसुता जगजननि
जानकी वैष्णवी विन्ध्यवासिनी के जीवन श्रीराम को जिह्वा पर रखें ।
पतन(नवनवशरीरधारण) से बचने का
एकमेवोपाय है ।

सन्त सद् गुरु कृपा हो जाय
यह “जग”जाय ।
हम निद्रा से जग जायँ

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं
कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे
संशोभितं सर्वदा ।

संसारामयभेषजं सुखकरं
श्रीजानकीजीवनं
धन्याः ते कृतिनः
पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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