ब्रज के महान् सिद्ध सन्त सूरदास रहे।
नानायोनि-नर्तन शरीर के उन्होंने कहे।
काम क्रोध वस्त्र बने ग्रस्त किया मोह ने।
शब्दस्पर्श विषयों की माला कण्ठ पहने।
मोह की पायल पाँव पहने भ्रमे हैं सदा।
निन्दा-रस-रसाल में हम मग्न भये सर्वदा।
जगत् में भ्रमित मन बन कर मृदंग सजा।
दुःसंगी जनों संग बना बेताल बजा।
तृष्णा का नाद वाद्य अन्तरगत ध्वनित हुआ। बजता बेढंगा स्वर लोगों को भ्रम हुआ।
माया की रस्सी कटि बाँधे बेहाल रहा।
लोभ का तिलक देता सुन्दर सा भाल रहा
जल थल अकास मध्य पाई अनेक काया।
कोटि कला दिखलाई माया की माया।।
कौन करै दूरि यह अविद्या आप जानिये।
आप के भगाये जाय नन्दलाल मानिये।।
इसीलिये सूरदास-वचनों का मर्म भाव।
समझे,तब बही बानी अपने ही गुणस्वभाव।
तब अपनी अनुभूति जगी।
जगद् भाव मति रही लगी।।
यह अनेक जन्मों के कर्म का गणित
याकि गणित का कर्म ध्वनि दुःखों का रणित।
खुलता ना रहस्य वस्य जगत् के रहता मैं
बना रहता भेद ना सुलझता मर्म एकता
समझ नहीं आती यदि तुलसी
नहीं मिलते।
तुलसी नहीं मिलते हनूमान से मिलाते नहीं ।
कहूँ क्या पीड़ा प्रभू राम भी न मिलते।
राम यदि मिले उन्हे रसनासनासीन कीजै ।
राम नाम लीजै चाहे कृष्ण
नाम लीजै।
श्रीगणेश शंकर शिवा सूर्य नाम लीजै सब
कृष्णानुजा विन्ध्याचल रानी नाम की जै।
अतः
दुर्गा नाम गाइये और राधा नाम
गाइये।
सीता नाम गाते हुए जगद् बिसराइये
जगत् को बिसारे भगवन् नाम
के पुकारे बिना।
कौन तारे जग में,शिव-शिवा ही
सहारे हैं।
हारे हम जैसे जीव मलिन
और विषय-ग्रस्त।
बार-बार गिरते भवकूप
नाथ!भारे हैं।
तुलसी कबीर सूर मीरा औ मलूक गुरू
गौरवपूर्ण वाणी संसार से
उबारे है।
है असीम शक्ति इन भगवत्प्राप्त गुरुजनो में , टारो यह अविद्या हम जगद् के लबारे हैं ।
हम क्या कहें –
व्रज के रस राचे कृष्णराधा भाव सूर रहे।
राधाकृष्णसरिता में डूबे भरपूर रहे।।
इसीलिए दैन्यवश सूरदास जी गा उठे
अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल
कामक्रोध कौ पहिरि चोलना,
कंठ बिषय की माल।
महामोह के नूपुर बाजै,
निन्दा सबद-रसाल।
भरम भयौ मन भयौ पखावज
चलत असंगति चाल।
तृष्ना नाद करति घट भीतर ,
नाना विधि दै ताल ।
माया कौ कटि फेंटा बाँधे ,
लोभ तिलक दिये भाल।
कोटिक कला काछि दिखराई,
जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अबिद्या,
दूरि करौ नन्दलाल ।
अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल ।
गुरः शरणम् ।हरिः शरणम्।