जब -जब धर्म क्षीण होगा
उपजेगा अधर्म भीषण।
गो सन्त साधु संरक्षण हित,
आऊँगा तब लेता मैं प्रण।।कारागृह संसार समझ कर आया मैं कारागृह में।
सन्त भक्त आनन्दित करने,
जन्म लिया कारागृह में।।
ऋषी मुनी जन गोप गोपियाँ,
आये आत्म स्वरूप हुए।
उत्कट इच्छा जान समझ,
सह जन्मे थे सब गोप हुए।।
प्रेरित हुई “योगमाया” तब
नारी रूप धरे आई।
जसुदा-नन्द गर्भ-गत माता
माँ उसको न समझ पाई।।आधी रात भाद्र कृष्णा में देव-देवकी अष्टम सुत । गाढ़ी निद्रा निद्रित था जग, अवतरित "कृष्ण" कोई अद्भुत।।
भगवत्प्रेरित वसुदेव हुए,
तब कृष्ण -सूर्प-सज्जित करके।
ले गए यशोदा ढिंग रक्खा,
सबको निद्रा से जित करके।।
वसुदेव मस्तकारूढ चली,
कन्या कैसी युग माया हर,
आई कारागार मध्य ,
देवकी गोद बैठी चढ़कर।।
आया कंस जान अष्टम सुत,
कन्या देख हुआ सस्मित।
कन्या नहीं योगमाया थी,
छूटी हाथ हुआ विस्मित।।
आकर विन्ध्याचल पर बैठी,
कृष्ण योगमाया रानी।
सरस्वती वह अष्टभुजा माँ,
विन्ध्यवासिनी जग-दानी।।
योगमातृका विन्ध्य अधीश्वरि,
जगद् वन्दिता श्रीमाता।
चरणकमलरज मधु आकर्षित,
भगत-जगत है सुख पाता।।
लिये अजन्मा जन्म कृष्ण बन,
आत्मा रूप सन्त ज्ञानी।
उपजे उनकी कृपा प्राप्त करके,
मन प्रमुदित हुआ कृपा जानी।।
हे भारत जब हो धर्म ग्लानि,
धरती पर हो अधर्म नर्तन।
तब मानव देह धरे लीला,
करता मैं करता परिवर्तन।।
यदा यदा हि धर्मस्य,
ग्लानिः भवति भारत।
अभि उत्थानम् अधर्मस्य,
तदा आत्मानं सृजामि अहम्।।
गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।