सम्भवामि युगे युगे

साधु/सज्जनों की समग्र रक्षा
दुष्ट/दानव दैत्याचरण दमन
धर्म संस्थापन आदि के लिए
अजन्मा का भी जन्म सम्भव है।

जब जब होइ धरम कै हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी।।
तब-तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।

भगवती उमा के प्रश्न पर उमापति ने उत्तर देना प्रारंभ किया था।उन्होंने कहा था कि भगवान् के धरा धाम पर आने के कारणों को इदमित्थं नहीं कहा जा सकता, फिर भी कह रहा हूँ-

हरि अवतार हेतु जेहिं होई।
इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
तस मैं सुमुखि सुनावहुँ तोहीं।
समुझि परै जस कारन मोहीं।।

महादेव ने आगे कहा,जिसका अर्थ स्पष्ट है-
असुर मारि थापहिं सुरन,
राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस,
राम जनम कर हेतु।।
इसीतरह –

मार्कण्डेयपुराण में ऋषि ने भी महिषासुर मर्दिनी के भी अवतरण को ऐसा ही बताया था। यहाँ तो स्वयं भगवती ही अपने मुख से अपने अवतरण का हेतु,
असुर -वध बताती हैं-

इत्थं यदा यदा बाधा,
दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याहं,
करिष्यामि अरिसंक्षयम्।।

अब “मानस” में पुन प्रवेश करें तो –

परवश जीव स्वबस भगवन्ता, होने से
भगवान् को कोई बाध्य कैसे कर सकता है ?संकल्प मात्र से वह असुरसंहार कर सकते हैं।
किन्तु अपने स्वरूप को प्राप्त माया
मुक्त जीवों/सन्तों को अपनी विविध लीला का दर्शन करा कर आनन्द प्रदान करने के लिये,वह अवतार लेते हैं-

विप्र धेनु सुरसन्तहित,
लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार ।।

अपने चूडान्त चरम ग्रन्थ, विनयपत्रिका में भी बाबा जी ने भगवान् केअवतरणकरण को लीलाकरण-कार्य कहा-

सच्चिद् व्यापकानन्द परब्रह्म-पद,
विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।
विकल ब्रह्मादि,सुर,सिद्ध,संकोचवश,
विमल गुण- गेह नर-देह धारी।।

मध्यदिवस तहँ सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

त्रेता में भगवान् श्रीरामावतार में दिन के मध्य काल को आनन्दित करते हैं, तो
द्वापर में रात्रि के मध्य काल को।

अब गीतागायक परमश्रीगुरु भी इसी तरह
अपने अवतरण को स्वयं कहते हैं, जैसे
कि भगवती दुर्गा ने कहा था।
अर्जुन को भगवान् बताते हैं-

परित्राणाय साधूनां ,
विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय,
सम्भवामि युगे युगे।।

इसमें विमर्श का बिन्दु एक ही है, और
वह है – सम्भवामि।

सम्भवामि यह क्रिया पद है।
इसका कर्ता आत्मानम् है।
मतलब कि मैं (परब्रम्ह परमात्मा)
आत्मा को उत्पन्न करता हूँ।
यह आत्मा कौन है?

देखिये, सातवें अध्याय मेंभगवान् ने चार प्रकार के भक्त -आर्त,जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी के रूप में बताये हैं।
अब उनमें एकीभाव(अनन्यभाव) से रहने वाला ज्ञानी-भक्त भगवान् का प्रिय है।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्तः,
एकभक्तिः विशिष्यते।
प्रियः हि ज्ञानिनः अति अर्थम्,
अहं स च मम प्रियः

ज्ञानी भक्त मेरा और मैं उसका आत्मा हूँ।
और अगले श्लोक में अधिक स्पष्ट कर
देते हैं-
उदराः सर्व एवैते,
ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।।
(07/18)
तो इस विमर्श में स्पष्ट होता है कि भगवान् स्वयं अपने(आत्मा) को अर्थात्
ज्ञानी भक्तजनों को भी जन्माते/जन्मते
हैं।
भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव -सम्भव खेदा।
अब इस तरह भगवान् और उनके सन्त
भक्त दोनों उतरते हैं, इस धरा धाम पर-

इसीलिये गीतोक्त वाणी विमर्श करती है-

सम्भवामि युगे युगे

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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