सम्मानं कलयातिघोरगरलम्

सम्मान को अत्यंत घोर विषवत् मान कर त्यागना चाहिए। नारायण!

अपने वन गमन के अवसर पर,भगवान्
श्रीसीताराचन्द्र शबरी के निकट पहुँचते हैं। शबरी,वह शबरी है, जो भगवान् की
हजारों वर्ष से प्रतीक्षा में पलक पाँवड़े बिछाए बैठी है।
भगवान् चित्रकूट पधारते हैं, और
शबरी की मनःकामना मूर्तिमती होती है।
भगवान् ,एकमात्र भक्ति का ही सम्बन्ध
स्वीकारते हैं –

कह रघुपति सुनु भामिनि! बाता।
मानहुँ एक भगति कर नाता।।

भगवान् तो भक्ति का ही नाता मानते हैं।

भक्ति पाने के लिए प्रभु ने एक से एक साधन बताए हैं।
कुल नौ साधनों में सन्तसंग,भगवत् कथारति के बाद तीसरी भक्ति के रूप में
अमानिता और गुरुसेवा का उपदेश करते हैं।

गुरुपद पंकज सेवा,
तीसरि भगति अमानि।

मतलब कि गुरुचरणाश्रय मिलने के बाद,
किसी भी तरह के मान की इच्छा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि मान सम्मान में चित्त चले जाने से, मनुष्यता ही आहत हो
जाती है।
और महाभारत के अनुशासन पर्व में तो स्वयं नारायण को ही सबसे बड़ा ” अमानी ” बताया गया। भगवान् अमानी होकर ,
” मानद” हैं। मान देने वाले हैं।
अमानी मानदो मान्यः,
लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।
सुमेधा मेधजो धन्यः,
सत्यमेधा धराधरः।।

              पन्द्रहवीं शताब्दी में जन्म लेकर बंगाल की धरती को पवित्र करनेवाले, युगल श्यामाश्याम के अवतार 

श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु ने,अपनी लीला से
भक्तिरसार्णव में डुबाकर नाना जीवों का उद्धार किया।
आपने अपने लीलाकाल में,किसी भी
ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया। तथापि केवल आठ पद्य संस्कृत भाषा में लिखे ।
इन आठ पद्यों को भक्तिजगत् में बड़ा आदर प्राप्त है।इन्हें ” शिक्षाष्टक ” के
नाम से जाना जाता है।बाद में इनके जीवन और इन पद्यों पर भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये, जिनमें झूँसी(प्रयागराज) के
भगवत् प्राप्त महात्मा सन्त प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का संस्कृत पद्यात्मक ग्रन्थ
श्रीचैतन्यचरितावली ” प्रमुख है।

अब देखिये, ऊपर उक्त महाभारत के श्लोक की छाया” महाप्रभु ” के तृतीय पद्य में अनुभूत होती है-

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।

विचारने पर एक बड़ा विमर्श उपस्थित होता कि, मनुष्य अमानी क्यों बने?
  इसलिये कि भगवान् अंशी हैं और जीव उनका अंश।
    जब भगवान् में अमानिता है तब जीव में भी अंशत्वेन होना चाहिये। 

देखिये-

योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने ईश्वर को
पंचक्लेश से विहीन कहा है।
ये हैं, अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष
और अभिनिवेश।
अब जब ये सभी ईश्वर में नहीं हैं, तब माना जाय कि, ये सभी जीव में नानात्मक, त्रिगुणात्मक जगत् से ही
” अन्तरित ” हुए हैं।
यह सभी वस्तुतः जीव के हैं नहीं।
बल्कि माने हुए हैं।
इनको त्यागे बिना ईश्वर का साक्षात् नहीं होगा, नहीं होगा, नहीं होगा।

मानव जन्म की सार्थकता ईश्वर दर्शन ही है। पचक्लेश को त्यागे बिना दर्शन नहीं
सम्भव है।
और यह “अस्मिता ” आदि का त्याग तब तक सम्भव नहीं होगा,जब तक कि , तुलसी,सूर,कबीर,मीरा,नानक,दादू,मलूक,रैदास को गुरुवत् मान इनके सन्देशों पर
चला नहीं जायेगा।
अथवा इनको आचरण में ढालने वाले
विरल- विरले सन्तसद्गुरु का पादाश्रय
लेकर आगे उन्मेष के मार्ग पर नहीं चला जायेगा।
नहीं तो पतन होगा, और मानव जीवन का उद्देश्य विखंडित हो जायेगा।

और इसीलिये प्रभु के नौ साधन भक्ति के आदेश,महाभारत के वाक्य और
चैतन्य महाप्रभु के लीलावचनों में सारग्राही वाणी प्रवाहित हो उठी है।

इन सभी वाणियों की छाया लेकर एक तात्विक-सात्विक वाणी भी विलसी है।
यह वाणी उन्ही अमानिता आदि को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करने वाली व्रज के महान् सन्त प्रबोधानन्द सरस्वती की वाणी है।
वे कहते हैं कि किसी,वृक्ष के नीचे बैठकर शान्त एकान्त में भजन करना श्रेष्ठ है।पवित्र यमुनादि नदियों का जल और साधारण वस्त्र भी धारण करना ठीक है।
राधामाधव का निरंतर स्मरण करते हुए
धाम तो त्यागना कथमपि उचित नहीं।
और सबसे बड़ी बात तो ये है कि,
सम्मान का विषवत् त्याग तथा किसी नीच से नीच व्यक्ति द्वारा अपमान को अमृतवत् ग्रहण करना होगा।
तभी हम वस्तुतः मनुष्य बन पायेंगे। नहीं तो पद प्रतिष्ठा और सम्मान तो
माया के चट्टे-बट्टे हैं। ये सब काग भुशुण्डिजी के शब्दों में –
सकल माया कर परिवारा।
कौन हैं माया के दुर्दान्त सगे सम्बन्धी?
सुत ,वित्त और लोक की प्रतिष्ठा पाने की लालसा।

सुत बित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।

हमें आत्म स्वरूप पाने नहीं देंगे। मनुष्य
बनने नहीं देंगे।
अपने को और जगत् को जाने बिना करुणानिधान की कृपाकरुणा
से मिला मानवजन्म निरर्थक होगा।
इसीलिये व्रज के रसिक की रसमयी वाणी का आश्रय लें-

भ्रातः तिष्ठ तले तले विटपिनां,
ग्रामेषु भिक्षामट।
स्वच्छन्दं पिब यामुनं जलमलं,
चीराणि कन्थां कुरु।

सम्मानं कलय अतिघोरगरलं,
नीचापमानं सुधा।
श्रीराधामुरलीधरं भज सखे,
वृन्दावनं मा त्यज ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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