व्रज के किसी सिद्ध सन्त ने कहा था,कि जो,सह लेते हैं अपमान को,पा लेते हैं,
भगवान् को।
किसी का भी सम्मान हो, तो वह सब झूठा ही है।
पहला तो यह कि, सम्मान पद के कारण है, तो वह “पद” का है, न कि व्यक्ति विशेष का।
क्षमा,दया, करुणा, सत्य, प्रेम, धैर्य,
पराक्रम, वात्सल्य, औदार्यआदि गुणों के
कारण है, तो भी वह, व्यक्ति विशेष में
तो घटित होगा नहीं। क्योंकि उक्त गुणगण
भगवान् के हैं, भगवदीय हैं-
गुण तुम्हार समुझै निज दोसा।
जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
राम भगत प्रिय लागहिं जेहीं।
तेहिं उर बसहु सहित बैदेही।।
इसलिये प्रशंसा होने पर साधु/सज्जन सजग होकर, सिर झुका कर,भगवान् का ध्यान करने लग जाते हैं।
लेकिन कोई दुष्ट जन निन्दा करें, तो उन्हें हमें अपना मित्र बना कर अपने पास रखना चाहिए।वे हमें दुर्गुणों से सचेत करते हैं। यदि दुर्गुण हममें है तो उसे हटाने का यत्न करना होगा और नहीं हैं तो वह मुझमें प्रवेश न करे,सजग रहना होगा-
सन्त कबीर ने कहा-
निन्दक निअरे राखिये,
आँगन कुटी छवाय।
साबुन औ पानी बिना,
निर्मल करे सुभाय।।
देखिये –
शूकरः निन्दकश्चैव विशिष्टौ जगति ध्रुवौ।
सूअर और निन्दक लोग इस जगत् के अत्यंत विशेष प्राणी हैं।
एक हमारे वाह्य मल को जिह्वा से साफ करता है, तो एक हमारे अवगुणों का बखान कर अन्तर के मल को पचा कर अन्त में तो उपकार ही करता है और
अवगुण रूप मल को साफ कर डालता है।
इसीलिये-
तुलसी बाबा ने भी ऐसे निन्दकों की प्रशंसा कर डाली है।सन्त वन्दना के बाद, उन्होंने खलों की वन्दना अनेक दोहे चौपाइयों में की-
बहुरि बन्दि खलगन सतिभाएँ।
जे बिनु काज दाहिने बाएँ।।
सद्भाव पूर्वक, दुष्ट भी बारम्बार प्रमम्य हैं।
जो अकारण अगल-बगल दुष्टता के आचरण में लगे रहते हैं।
परहित हानि लाभ जिन केरे।
उजरें हरष विषाद बसेरे।।
दूसरों की हानि जिन्हें लाभ लगता है।
किसी के उजड़ने पर,हर्ष और बसने पर, जिन्हें विषाद होता है।
बन्दौ खल जस सेष सरोषा।
सहस बदन बरनै पर दोषा।।
दूसरों की निन्दा, रोष पूर्वक करते हुए जिन्हें सुखानुभूति होती है।
शेषनागजी जैसे हजार मुखों से नाम
जप करते हैं वैसे हजार मुखों वाले दुर्जन
दूसरों की निन्दा हजारों मुखों से करते हैं।
अतः वे दुर्जन अभिनन्दनीय हैं।
भैया! प्रशंसा करने वालों से दूर रहना।
एक कथा प्रसिद्ध है-
प्रायः सभी जानते हैं। उल्लेखनीय है कि
वर्तमान मीरजापुर मेंं चुनार तहसील है।
प्राचीन भारत के काशी राज्य के अन्तर्गत आता था।
प्राचीन काल में यहाँ का राजा मूर्ख "पौन्ड्रक" था। इसके अगल -बगल इसे प्रशंसक( चापलूस) घेरे रहते थे। इसके पिता का नाम वसुदेव था।
प्रशंसकों ने इसकी प्रशंसा करनी शुरू की और इसे वसुदेव पुत्र वासुदेव कृष्ण कहने लगे। चिकित्सकों को बुला कर इसे शल्य क्रिया से और अधिक दो हाँथ लगवा दिये।वह द्विभुज से चतुर्भुज भी हो गया ।
विमानशास्त्र प्रवीणों को बुलाकर, एक गरुड पक्षी के आकार का विमान बनवाया।और शंख चक्र गदा आदि उसके चारों हाथों में थमा दिया गया।
वह चक्रधारी वासुदेव कृष्ण की तरह नकली गरुड़ पर सवार होकर आकाश में विचरने लगा। अपने को भगवान् कहने लगा।
इसे प्रशंसकों ने असली कृष्ण ही घोषित कर दिया।
द्वारिकाधीश भगवान् को चिट्ठी भेजी गई। कहा गया कि आप नकली कृष्ण हैं।
असली कृष्ण तो महाराज पौण्ड्रक हैं।
और फिर द्वारिकाधीश को आकर इस पौण्ड्रक का वध करना पड़ा।
अब सोचिये प्रशंसकों ने क्या दुर्गति करा दी,उस बेचारे पौण्ड्रक की।
इसीलिये शुक सम्प्रदाय के आचार्य और सिद्ध सन्त बाबा “श्यामचरण दास” ने निन्दकों को बाबा तुलसी और कबीर की ही तरह ही मित्र कह डाला।
भैया! ये बेचारे निन्दक हमें दुर्गुणों और उससे होने वाले पतन से बचा लेते हैं।
प्रशंसकों को अपने पास फटकने मत दीजिये। निन्दकों को सादर रखिये।
इसीलिये कि वे प्रशस्य और
प्रणम्य हैं, सन्मार्ग पर ले जाते हैं।
बाबा श्यामचरण दास को लोग चरणदास भी कहते थे। इन्होंने कबीर तुलसी का अनुवर्तन करते हुए निन्दक को मित्र कहा-
साधो निन्दक मित्र हमारा।
पाछे निन्दा करि अघ धोवै,
सुनि मन मिटै बिकारा।
जैसे सोना तापि अगिनि में,
निर्मल करै सोनारा।
बिन करनी मम करम कठिन सब,
मेटै निन्दक प्यारा।
सुखी रहो निन्दक जग माहीं,
रोग न हो तन सारा।
हमरी निन्दा करनेवाला,
उतरै भवनिधि पारा ।
निन्दक के चरणों की अस्तुति,
बरनौं बारम्बारा।
चरनदास कह सुनिये साधो,
निन्दक मित्र हमारा।।
गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।