मानस पुन्य होहिं नहिं पापा

वाह रे प्रभु! आपने ऐसी कृपा क्या कर दी है, कलह युग कलि युग पर।
पतन से बचाने वाले हे पतितपावन!
हे जगदम्बा जानकी! हे राधे!
हे विन्ध्याचलाधीश्वरी!
हे शक्तिमति! मातः! हे भवानि!
हे मृडानि! हे शिवानि! हे रुद्राणि!

गुरु पितु मातु महेश भवानी

सबके माता पिता तो, कलियुग के भी।

हे बाबा कलियुग!

भगवत्कृपा हुईआप पर।
बन बैठे राजा सब जुग कर।

प्रेमियों! जब जिसकी बारी आती है, उसे राजगद्दी तो मिलती है।

शपथ ग्रहण समारोह कलियुग का है।
ऊपर से पूर्व के राजागण सतयुग
त्रेता और द्वापर विस्मय से देख रहे हैं।

भगवत्कृपा से समारोह प्रारंभ हुआ।
न्यौता नहीं था , भूतपूर्व तीनों राजाओं को। सककुचाते ,लजाते, बलखाते,और
ईर्ष्याते भी तीन पूर्व के राजाओं ने अपने
सेवकों से सन्देश भेजा कलियुग के पास।
कहवाया कि आपके तीन मित्र समारोह में शामिल हो कर,निकट से आपको बधाई देना चाहते हैं।
कलियुग ने हामी भरी।
तीनों ने साथ-साथ आकर कलियुग का
शपथग्रहण समारोह देखा।
बधाई दी और गमगीन चले गये।

आखिर इन तीन भूतपूर्व शासकों की समस्या क्या थी? गमगीन क्यों?
कोई जाना नहीं। देखिये-

सतयुग में तप करते-करते थकते जाते हैं।
बड़ी सात्विकता भी थी।बड़े प्रयास से कोई मोक्ष पाता था। क्या कहें माया तो प्रचण्ड है।
त्रेता में ज्ञान -प्राधान्य था। ज्ञान प्राप्ति के लिये कठिन साधना से सिद्धि और मुक्ति मिलती थी।
द्वापर में यज्ञ की श्रेष्ठता रही। विधि पूर्वक
यज्ञादि क्रिया से मानवजीवन का लक्ष्य पूर्ण हो पाता था। लेकिन-

 कलि केवल मल मूल मलीना।
 पापपयोनिधि जल मन मीना।।

लोगों के चित्त को मलिन दूषित किये रहनेवाला कलह( झगड़े)का युग, दान और भगवन् नाम के स्मरण-जप से जीवों को स्पर्श नहीं कर पाता। सद्यः
मुक्ति भी होती ही है।

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।
द्वापरे यज्ञमेवाहुः दानमेकं कलौ युगे।।

बाबा ने कहा-

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव -थाहा।।

कलिजुग सम नहिं आन जुग,
जौ नर करबिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल,
भव तर बिनहिं प्रयास।।

ऐसा यह कलियुग है प्रेमियों!
बड़े -बड़े ऋषि-महर्षि महात्मा गण
तरसते हैं इस युग में जन्मने के लिए।
बड़ी सरलता से भवसागर पार।
क्यों न हो यह सब युगों का सम्राट।

नारायण! सभी युगों में तो ,

कायिक,वाचिक, मानसिक पाप और
पुण्य दोनों होते हैं।
मनवचनकर्म, तीनों से पाप -पुण्य, ये
दोनों बनते हैं, लेकिन यह कलियुग एक बात में सतयुगत्रेताद्वापर से श्रेष्ठ है।
वह श्रेष्ठता इस कलियुग पर भगवत्कृपा बन बरसती है,और इसे सभी युगों का राजा बना देती है।

वह विशेषता है कि, इस युग में मन में हरिस्मरण आदि से पुण्य तो बनेंगे।

लेकिन कि मन से किसी का अहित सोचने पर भी पाप नहीं होगा।

इसीलिये कागभुशुण्डि महाराज ने कहा-

कलि काल का एक पवित्र- प्रताप है,कि इसमें मानस -पुण्य तो होगा,लेकिन पाप नहीं । यही इसके युगराजा होने का कारण है-

कलि कर एक पुनीत प्रतापा।
होहिं पुन्य मानस, नहिं पापा।।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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