जग बूझत बूझत बूझै

संसार माया तुम हरो,
करो माँ तुम कुछ करो।
अब मनुशरीर सफल बने,
ममता अहन्ता हैं तने।

जाये न अब तेरे बिना,
यह मोह छाये है घना।
तव चरणपंकजप्रीति हो,
सोऊँ तुम्हारी स्मृति सना।

मोह का है तम घना
दीखे न पथ जाऊँ कहाँ।
विवश बरबस स्थिर खड़ा,
तेरे चरण अब गिर पड़ा।।

यह जगत बहुत विचित्र है,
सपनों सरीखा चित्र है।।
मधु-मधुरता आभासती,
है भ्रान्त माँ मेरी मती।।

मन है विकल चंचल सदा,
क्या यही है मुझको बदा।।
अपने चरण में रती दो,
हे सती! सुन्दरि! गती दो।।

मन का विकार न रह सके,
तव मधुर-गुण-गण कह सके।
भागे अविद्या-जनित भ्रम,
हो प्रीति का ही सतत क्रम।।

जब कृपा माता आपकी,
करुणा मिले शिव-बाप की।
हे भक्ति-मूर्ति-मयी शुभा,
छाँटो तमस दे दो प्रभा।।

तूँ राम हो तूँ कृष्ण हो,
राधे तुहीं तूँ वितृष्ण हो।
तूँ सती सीता राम की,
आधार हो सुख-धाम की।।

तब इसलिये भक्ती-निरत,
कवी अग्रणी तुलसी फिरत
तव भगति-वारि पवित्र चित,
परमात्म जाने जगत-हित।।

रघुपति-भगति-बारि छालित चित,
बिनु प्रयास ही सूझै।
तुलसिदास यह चिद-बिलास ,
जग बूझत बूझत बूझै।।

हरिः शरणम्। गुरः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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