आजादी का अमृत महोत्सव

अपने प्राण किये जो अर्पण,
उनको शीश नवाते हैं।
आजादी का अमृत महोत्सव,
हम समवेत मनाते हैं।।

रामकृष्ण की पावन धरती,
पराधीनता में जकड़ी।
घायल मेरी धरती माता,
जब रोती थी दीख पड़ी।।

राक्षस मलिनमूर्ति दुष्टों ने,
तोड़े थे जब हरिमन्दिर।
भोगवासना-दृष्टि कलंकित,
हुई नारियाँ जब फिर-फिर।।

हीरा-सोना औ मणि-माणिक,
जब उन म्लेच्छों ने लूटे थे।
लक्ष्मीबाई-शिव-राणा- बल,
छद्मी-छक्के तब छूटे थे।।

धर्म और पथ-भ्रष्ट विधर्मी,
लोग किये जब अनाचरण।
वृद्ध-युवा आ- बाल चेतना,
जगी हुआ संकल्पित रण।।

खाओ-पीओ मौज मनाओ,
की आई जब विकृति यहाँ।
गान्धी-बिस्मिल-मंगल पाण्डे,
किये विरोध सुभाष जहाँ।।

अंग्रेजों की भोगी-संस्कृति,
छाई छाया तमस घना।
आजादी-बलि-वेदी पर ,
“आजाद ” दिखा तब रक्तसना।।

भगत-वीर -सावरकर जैसे,
वीर बने ” नरसिंह ” यहाँ।
ऐसे वीरों की धरती सोचो,
रहती परतन्त्र कहाँ ।।

पन्द्रह अगस्त सैंतालिस की,
शुभ मंगल वेला जब आई।
हुई स्वतन्त्र भारती- माँ,
सम्पूर्ण -देश खुशियाँ छाई।।

भगवत् -स्वरूप उन वीरों का,
यश झूम-झूम कर गाते हैं।
आजादी के पहत्तरवें बरष,
हरष हरषाते हैं ।।

अपने प्राण किये जो अर्पण,
उनको शीश नवाते हैं ।
आजादी का अमृत-महोत्सव,
हम समवेत मनाते हैं ।।

हरिः शरणम्। गुरुः शरणम्

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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