पर दुख दुखी सन्त सुपुनीता

बिना कारण के सबका उपकार करने वाले इस जगत में केवल भगवान् और उनके भक्त ही हैं,क्योंकि कौन नहीं जानता-

हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।

कबहुँक करि करुना नर देही ।
देत ईश बिनु हेतु सनेही।।

करुणासिन्धु भगवान् ने तो अत्यंत कृपा करुणा करके बार-बार के नाना देहों में पतन से मुक्त करने के लिए यह मनुज तन हमें प्रदान किया है।यह उनकी अहैतुकी कृपा है।यह उनकी अपने ” अंश ” जीव पर प्रकट ममता और वात्सल्य गुण है।
उन्हें सब से ममता है-

सब मम प्रिय सब मम उपजाए।
वह- वात्सल्यगुणसागर हैं।

और सन्त/भक्त नारद जी ब्रह्मलोक तक की परिक्रमा करके निराश जयन्त को
देखकर करुणा द्रवित हो जाते हैं।
और भगवान् की शरणागति देकर उसके प्राण बचाते हैं-

नारद देखेउ बिकल जयन्ता।
दया लागि कोमल चित सन्ता।।

अरे नारायण! प्रकृति से तमोगुणी राक्षसी लंकिनी भी सन्त समागम को अतुलनीय कहकर, श्रीहनूमान् जी जैसे सन्त/भक्त का सम्मान करती है,और वह भी पिटने पर।
लगता है रुद्रावतार के हाथों का स्पर्श पाकर ,वह धन्य -धन्य हो गई है-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख,
धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि,
जो सुख लव सतसंग।।

भगवान् भोलेनाथ भगवती उमा से सन्तसमागम की प्रशंसा करते हैं।
किन्तु यह सन्त/भक्त सन्निधि भी श्रीहरि – हाथों में ही है-

गिरिजा सन्त समागम,
सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरिकृपा न होइ सो,
गावहिं वेद पुरान।।
रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्ह कै सतसंगति अति प्यारी।।

कागभुशुण्डि जी भी सन्तमिलन को दुर्लभ बताते हैं।हरिकृपा से यदि पल भर के लिए, क्षणमात्र के लिए, हो जाय तो मनुष्यता आ जाय और जीवन सार्थक हो जाय-

सतसंगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।

और क्या कहें , कागभुशुण्डि जी जैसे भगवल्लीन वक्ता, और पक्षिराज गरुड जी जैसे भक्त श्रोता के मध्य जब श्रीराम
जी की कथासुधासरिता बहती है, तब जीव, धन्य होने का मार्ग,बरबस पा ही जाता है। श्रीरामकथा केवल कथा नहीं है भैया!
यह अमृत है, यह जीव को अमृत कर डालती है, फिर कोई डाली नहीं पकड़नी होती।
श्रीगरुड जी, श्रीकागभुशुण्डि जी को श्रीराम चरणों का अनुरागी, और बड़भागी
मानते हैं। सन्त,वृक्ष,सरिता, पर्वत और और धरती जैसा कोई पर उपकारी नहीं।
वे गा उठते हैं-
पूरन काम राम अनुरागी।
तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।

और सन्तो/भक्तों का कोमल हृदय तो
मक्खन के समान सुकोमल है, ऐसी उपमा देकर कविगणों ने सही तुलना नहीं की है।
वस्तुतः मक्खन तो स्वयं के ताप से पिघलने वाला है, किन्तु सन्त, दूसरों के सन्ताप,विषाद के परिताप से पिघल कर दुखी जनों को उनका खोया हुआ ” राम “
देकर संसार- ताप को सदा -सदा के लिए
नष्ट ही कर देते हैं। और जीव कृतकृत्य हो जाता है-

सन्त हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह पर कहै न जाना।।

निज परिताप द्रवइ नवनीता।
परदुख दुखी सन्त सुपुनीता।।

हरिः शरणम्। गुरः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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