अरे भाई माँगना हो तो काशीश मसान निवासी शिव से माँगना चाहिए।
इनसे बड़ा दयालु कौन?
रावण भस्मासुरादि तक को क्या-क्या नहीं दे दिया।
अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति,प्राकाम्या,ईशित्व, वशित्व आदि
आठों ,आपकी दासी हैं।
जाँचिए गिरिजापति कासी।
जासु भवन अनिमादिक दासी।।
हनुमदावतार में भी आप जगदम्बा श्रीजानकी जी की कृपा से अष्टसिद्धियों, नवनिधियों को बाँट रहे हैं-
अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।
आपकी कृपालुता ऐसी,आप ऐसे अवढरदानी हैं कि थोड़ी सी सेवा से पिघल जाते हैं।दीनानाथ ऐसे कि, किसी दीन हीन याचक को हाथ जोड़े देखना,
आपको बर्दाश्त नहीं-
सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।
औढरदानि द्रवत पुनि थोरे।
सकत न देखि दीन कर जोरे।।
ऐसे उदार उमापति!
तुम पुनि राम राम दिनराती।
सादर जपहु अनंग अराती।।
आप तो राम राम जपते हुए याचकों को सब कुछ बाँट रहे हैं। याचक जैसा परम प्रिय आपको दूसरि नहीं-
दानी कहुँ संकर सम नाहीं।
जाचक सदा सोहाहीं।।
आपको छोड़ अन्य जगह जो माँगने जाय, तो उसका पेट कभी नहीं भरेगा।
ईस उदार उमापति परिहरि।
अनत जे जाचन जाहीं।।
तुलसिदास ते मूढ़ माँगते।
कबहुँ न पेट अघाहीं।।
और क्या कहें, जब समुद्रमन्थन होने पर
उसमें से निकले ” कालकूट ” विष की विषमज्वाला से सभी देवता राक्षस जलने लगे, तब आप अत्यन्त कृपालु होकर सभी की प्राणरक्षा के लिये क्षणमात्र में उस गरल को पी गये-
कालकूट-जुर जरत सुरासुर।
निजपन लागि किये बिषपान।।
(श्रीविनय पत्रिका)
जरत सकल सुर वृन्द,
विषम गरल जेहि पान किय।
तेहि न भजसि मतिमन्द,
को कृपालु संकर सरिस।।
( किष्किन्धा-श्रीमद्रामचरितमानस)
।।हरिः शरणम् ।।
।।गुरुः शरणम् ।।