सनमान निरादर आदरहीं।सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।

” मानस ” के उत्तर काण्ड में प्रभु श्रीराम
जब अयोध्या पधारते हैं। तब उनके आगमन की सूचना सर्वप्रथम श्रीहनूमान् जी महाराज विप्रवेश में आकर श्रीभरत जी को देते हैं।सूचना देकर हनुमानजी चले जाते हैं।
भगवान् पुष्पक पर आरूढ़ होकर अयोध्या में उतरते हैं। पुष्पक को वापस श्रीकुबेर जी के पास जाने का आदेश देते हैं। पहले ” वेद ” मूर्तिमन्त होकर उनकी
स्तुति करते हैं।
नाना देवगण भी इस अवसर पर पधारे हैं।आकाश से पुष्पों की वर्षा हो रही है।
यहाँ अयोध्या में ” माया ” का कोई साम्राज्य नहीं है। मायापति भगवान् की नगरी जो ठहरी। ब्रह्मा जी भी आकाश से
फूल बरसा रहे हैं।
आनन्दमग्न देवाधिदेव भगवान् शिव भी आकर भगवद् स्तुति करते हैं।और

इधर –
माया को देखें तो, इन्द्रिय दृश्य नहीं।
विचारने पर यह बात समझी जा सकती है, कि है वह बड़ी प्रचण्ड।
मायाधीश जिसकी माया हर लें,वही कृतकृत्य हो सकता है और मान अपमान से परे वास्तविक आनन्द में रह सकता है।हाँ सन्त तो ,
माया से परे हैं।लेकिन वस्तुतः विरागी और भगवदुन्मुख हों।
महाभारत में भगवान् की माया के सम्बन्ध एक कथा आती है-

एक महर्षि थे नाम था ” बट तालव्य “
अनादि काल से बैठे वे तपश्चर्या लीन थे
शिरोभाग पर एक बट का पत्ता रखकर
उसे ढँके हुए थे। जंघाओं के मध्यऔर अगल बगल भी अनेक वृक्ष उग आए थे।
सहसा मायापति लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण इनके सामने प्रकट हुए।
लीलाधारी जो ठहरे ,लीला करनी चाही।

महर्षि बटतालव्य की समाधि खण्डित हुई। जब नेत्र खोले तो सामने भगवान्। वे
समझ गए कोई लीला होगी।
भगवान् ने अपनी माया छोड़ दी।ऋषि मोहित,भ्रमित हुए।
भगवान् ने पूछा आप कब से तपोलीन हैं। ऋषि ने कहा काल ने सब विस्मृत करा दिया है। आप कालों के काल हैं, पूछते क्यों हैं। सैकड़ों ब्रह्मा और सहस्रों लोमश ऋषि अपना काल हमारे सामने पूरा करके जा चुके हैं। कब से मैं इस समाधि में हूँ, नहीं मालुम।अब देखिये। माया का प्रभाव बड़ा ही चित्र-विचित्र है।
अब आगे क्या होता है?
आश्चर्य चकित ऋषि इतने में ही ब्रह्मलोक में पहुंच गए।चतुर्मुख ब्रह्मा से वेदसम्बन्धी वार्ता चलने लगी। थोडी देर में
ब्रह्मा जी भी मायावशत्वेन उन महर्षि बटतालव्य से वादविवाद करने लगे।
माया कृत अभिमान चढ़ बैठा। एक बवण्डर आया दोनों चतुर्मुख ब्रह्मा और
वे ऋषि उड़ने लगे।
हवा का प्रचण्ड वेग रुका और दोनो लोग एक दूसरे ब्रह्माण्ड के द्वार पर जा
पहुँचे। द्वारपालों से पूछा तो पता चला कि यह भी अलग ब्रह्माण्ड है।
चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने कहा यहाँ कौन रहता है। उत्तर मिला अष्टमुख ब्रह्मा।
अनुमति पूर्वक ऋषि के साथ दरबार में गए।वहाँ अष्टमुख – चतुर्मुख ब्रह्मा और ऋषि की वेद चर्चा चली। पुनः विवाद हो गया। फिर तूफान आया,और तीनों भँवर में घूमने लगे।
शान्त होने पर तीनों ,तीसरे ब्रह्मलोक के द्वार पर खड़े थे। पूछने पर पता चला यहाँ षोडश मुख ब्रह्मा विराजते हैं।
द्वरपालों की आज्ञा से भीतर प्रवेश मिला। षोडश मुख वाले ब्रह्मा जी के साथ
सत्संग प्रारंभ हुआ।और धीरे-धीरे कहासुनी होने लगी। पुनः शान्ति भंग हुई।
तूफान में चार, आठ ,सोलह मुख वाले ब्रह्मा और बटतालव्य उड़ने लगे।
तूफान कम होता है और चारों एक चौथै ब्रह्मलोक के दरवाजे पर खड़े हैं।
पूछने पर पता चला यह बत्तीस मुखी ब्रह्मा जी का दरबार है।
चार ,आठ ,सोलह,बत्तीस और बटतालव्य ऋषि की परस्पर वार्ता में विवाद होता है। और वे सभी चौसठ मुखी ब्रह्मा के लोक में पहुंच चुके होते हैं।
इस तरह शतमुख ब्रह्मा ,सहस्र मुख ब्रह्मा के लोक तक जाने और विवाद की निरन्तर परम्परा चलती जाती है।
भगवान् अपनी माया को खींच लेते हैं। क्रमशः सभी ब्रह्मा गण अपने -अपने
लोक में और बटतालव्य ऋषि धरती पर पद्मासन में विराजे दीखते हैं।
भगवान् के आगे ऋषि विनत हुए।
माया खतम ,अभिमान खतम।

माया कृत गुन दोष सब।

हे प्रभु हरहु आपनी माया।

बालि बध के उपरान्त, माया की वशीभूता
तारा अत्यंत व्याकुल हो जाती है।
भगवान् कृपालु हैं। माया को खींच लेते हैं। तारा आनन्दमूर्ति बन जाती है।
वैकुण्ठ की अधिकारिणी हो जाती है।

तारा बिकल देखि रघुराया ।
दीन्ह ज्ञान हरि लीन्ही माया।।

     अब बात ये है कि, मायापति अपने प्राणप्यारे सन्तो/भक्तों की माया हरते हैं।

बिना हरिगुरुसन्त अनुग्रह के यह जीवन कृतकृत्य नहीं होगा।
हम मानापमान के परे उन्हीं की कृपा से हो पाते हैं।

मानापमानयोः तुल्यः
तो हरिः ओ3म् तत् सत् कृपा पर आधारित है। इसीलिये हमारा सनातन
तो हरिहरात्मक है।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परि तेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।

भक्त/सन्त इससे परे हैं।
इसीलिये मंगल भवन अमंगल हारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, भगवान्
उममहेश्वर, वन्दनीय श्रीराम जी की वन्दना में भक्तोचित भाव से गाते हैं-

सनमान निरादर आदरहीं।
सब सन्त सुखी बिचरन्ति मही।।

।। हरिः शरणम् ।।
।। गुरुः शरणम् ।।

Unknown's avatar

Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

Leave a comment