भगवान् के प्राणप्यारे सन्त/भक्त अपने दर्शन से ” जीव “को कृतार्थ कर देते हैं।
अप्(जल) मय अर्थात् नदी तीर्थों में जाकर, सविधि स्नान करने पर पाप नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है।
मृत्(मिट्टी) पत्थर आदि शिलाओं से निर्मित ,प्रतिष्ठित प्रतिमाओं का भी श्रद्धा भक्ति पूर्वक अर्चन करके, अभीष्ट सिद्धि होती है।
किन्तु इन दोनों विधियों में स्वयं तत्पर होना पड़ेगा। समय भी लगेगा, तब जाकर
नाना ऐन्द्रिक शुद्धि पूर्वक,मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होगी।
लेकिन ” अजामिल ” आदि का प्रसंग ऐसा है, जहाँ सन्त/भक्त स्वयं दर्शन देकर
पतित अजामिल को ” पतितपावन ” का
” वैकुण्ठ लोक ” अकुण्ठित गति से
प्राप्त करा देते हैं। और मानो सन्त दर्शन से , ” मनुष्यता ” ही कृतार्थ हो जाती है।
उस अजामिल को अपना कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
इससे भी आगे बढ़कर एक विलक्षण बात होती है, जब नाना लोकों और यहाँ तक कि ” ब्रह्मलोक ” तक जाकर वह
बैचारा थका हारा ” जयन्त ” लौट आता है। भगवान् श्रीराम द्वारा छोड़ा गयी वह
” सींक ” काल बन कर पीछे से दौड़ाती हुई पीछा नहीं छोड़ती। वह निराश हो जाता है।जीवन संकटापन्न हो जाता है।
तभी नारद जैसे सन्त उस जयन्त की विकट संकट अवस्था देख कर द्रवित हो जाते हैं।
नारद देखेउ बिकल जयन्ता।
लागि दया कोमलचित सन्ता।।
विलक्षणता क्या कि जयन्त, नारदजी को नहीं देखता, स्वयं दयार्द्र नारद उसे देख लेते हैं।और कोमल चित्त महात्मा उसके उद्धार का मार्ग उसे बता देते हैं।
वह जयन्त आत्मोद्धार कर लेता है।
यहाँ भी साधु, स्वयं दर्शन देकर ही
जीव को कृतार्थ कर जाते हैं।
अजामिल और जयन्त ,इन दोनों की उक्त घटनाओं में अद्भुत साम्य है, जहाँ
साधु/ सन्त स्वयं अपना दर्शन देकर
जीव को धन्य-धन्य कर देते हैं।और
इसीलिये भागवत पुराण में भक्त और भगवान् के तादात्म्य से उद्धारक्रिया शब्दों बह जाती है-
नह्यम्मयानि ( न हि अप् मयानि)तीर्थानि,
न देवा न मृच्छिलामयाः ।
ते पुनन्ति उरुकालेन,
दर्शानादेव साधवः।।
।। हरिः शरणम् ।।
।। गुरुः शरणम् ।।