विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि।।

टिकट तो कन्फर्म
लेकिन दुर्भाग्य हमारा
क्योंकि यह ” मानवशरीर ” ट्रेन ?
लक्ष्य क्या है इसका?
शुक्रिया करुणानिधान भगवान् का
भोग ही जीवन नहीं।
मजा क्या लोगे ?
सजा की सेज भी बिछी है।
उम्र तो सहज शरीर धर्म है।
जलवत् बहती जा रही
” समुद्र ” मेरा गन्तव्य।
इसे उम्र भर जान नहीं पाया
वही उनकी माया किए है बेचैन
तरसता,तड़पता हूँ बना नहीं “मैन”
अब सोचना तो पड़ेगा।
कब तक नवीन यात्राओं के लिए
नया -नया टिकट लेना पड़ेगा?
जब गन्तव्य पता नहीं
तब नाना शरीर धारण ही
एक नियति होती है।
हमारी “प्रज्ञा ” तो सोती है।
” स्थितप्रज्ञ ” गुरु भगवान् ही
जगाते हैं,गाते हैं, गुनगुनाते हैं।
भगवान् का भगवती का
पावन नाम जब सुनाते हैं,
तब ” जीव ” बेचारा नहीं रहता।
मिल जाता है हारे को हरिनाम
हारा जीत की ओर बढ़ता रहता।
तब
और वह “जीव ” मीरा कबीर सूर तुलसी
रैदास नाभादास प्रियादास बन जाता है।

और ” पायो जी पायो मैंने रामरतनधन
पायो ” की टेर शुरु हो जाती है।
कर्मों की फेर फिर जाती है।
अगाध संसार सागर में
नाम का तिनका जीवन नैया
बन ही जाती है।

और मिल जाता है
” वेदवेदान्तवेद्य तत्व “
व्रजरज में लीलापुरुषोत्तम कहाता है।
“जीव” उजास में नहाता, “तम”नसाता है।
प्रेम की प्रतिमा”अजन्मा” जन्म लेकर
भक्तों को रिझाता ” कृष्ण “कहलाता है।

और इसीलिये अनुभूति बोलती है-

विगतविषयतृष्णः
कृष्णमाराधयामि।।

।।हरिः शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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