जेहि सरीर रति राम, सोइ आदरहिं सुजान। रुद्र देह तजि नेह बस, बानर भे हनुमान।।

जिस शरीर में प्रभु श्रीराम से प्रेम हो जाय, वही शरीर सज्जनों ,सुजनों के आदर का पात्र बन जाता है।
भगवान् ही “प्रेम” स्वरूप सभी चराचर में व्यापक हैं।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।
अब ,उसी प्रेमास्पद, प्रेममूर्ति भगवान्, का प्रेमानुराग, जगत् को अनुभव कराने के लिए, भगवान् शिव
” रुद्र ” देह छोड़कर, भक्तराज श्रीहनुमान् जी महाराज के रूप में अवतरित होते हैं।
कम से कम दोहावली के इस दोहे का आशय तो ऐसा ही लगता है।

जगदम्बा पार्वतीजी भी भगवान् से कहती हैं, कि आप तो दिन-रात प्रतिक्षण ही
श्रीरामनाम जपते रहते हैं। और विशेषता यह कि, आप ही कहते हैं कि, इसी नाम के प्रभाव से मैं(शिव)औरों की बात क्या,
कीट-पतिंगों तक को मुक्ति का अधिकारी बना देता हूँ।
भगवती ने कहा-

तुम पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग अराती।।

भैया! करोड़ों प्रकार की योगसाधना करके, योगीजन जिस मुक्ति मार्ग के अधिकारी बन पाते हैं, वह मुक्ति हे प्रभु!
आप सभी कीट पतिंग तक को दे देते हैं।यह आपके नाम के जप का ही तो परिणाम है-

बेद बिदित तेहि पद पुरारि पुर,
कीट पतंग समाहीं।।
जोग कोटि करि जो गति हरि सों
मुनि माँगत सकुचाहीं।।

भगवान् राम की भक्ति और सकल सुख संपदा शिवभक्ति से मिल जाती है-
सुख संपति मति सुगति सुहाई।
सकल सुलभ संकर सेवकाई।।
बिनु तव कृपा राम पदपंकज।
सपनेहु भगति न होई।।

और इसीलिये भगवान् राम ने अपने भक्त शिव से द्रोह करने वाले “सेवक” की निन्दा की है।और ऐसे दुष्ट को नारकी तथा दुर्बुद्धि कहा-

शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहिं न भावा।।
संकरबिमुख भगति चह मोरी।
सो नारकी मूढ़मति थोरी।।

कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरे।

लिंग थापि विधिवत करि पूजा।
शिव समान प्रिय मोहिं न दूजा।।

उत्तर काण्ड में तो श्रीराम की शिवभक्ति
पराकाष्ठा पर है,जिसे विनय पूर्वक कहा जा रहा है-

औरौ एक गुपुत मत सबहिं
कहहुँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर
भगति न पावै मोरि।।

इस प्रकार शिवद्रोह,भक्त द्रोह है।
और श्रीरामद्रोह, भगवद् द्रोह।

इसीलिये प्रेमस्वरूप प्रभु श्रीराम की प्रेमा भक्ति की प्राप्ति और जगत् को भक्ति की शिक्षा देने के लिए भगवान् उमामहेश्वर ने
अपना रुद्र रूप छोड़कर, अद्वितीय भक्त के मूर्तिमन्त सन्त श्रीहनुमन्त के रूप में
अवतार ग्रहण किया-

रूद्र रूप तजि नेह बस।
बानर भे हनुमान।।

हरिगुरू शरणम्।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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