वेदवेदान्तवेदनाय,
वेदना न वर्तते।
किन्तु स्वानुभूतिकाय
प्राणवर्तना प्रवर्तते।
वेद वेदान्त जाने की अभिलाषा नहीं है।
लेकिन अपने आत्मा में ही,
जो सारे संसार का नाम -रूप
अनुभव करा रहा है,
उसे देखना चाहता हूँ।
वह निर्गुण भी निराकार भी।
सगुण वही है सदाकार भी।
नहीं हो रहा अनुभव उसका,
माया देती पहरा जिसका।।
माया के चट्टों बट्टों ने
किया हमारा बेड़ा गर्क।
मनुज शरीर निरर्थक होता,
नाहीं चलेगा कोई तर्क।
माया का परिवार बड़ा है।
” सुत” ” वित” “लोक”मनसि चढ़ा है।
नहीं पार इस परीवार से,
करता वार पै वार खड़ा है।।
हे! माया के सर्व अधीश्वर!
हमने किया सरेण्डर है।
आप सँभालो तो हम सँभलें
अब प्रचण्ड इसका डर है।
एक बार शरणागत होकर
तेरा मैं हूँ प्रभु! कह दे।
उसे “अभय” तत्काल “मुक्ति” दे,
यह संकल्प व्यक्त करते।।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतत् व्रतं मम।।
वाल्मीकि रामायण।
इसलिये-
दया करो हे देव! हारता,
मन माया में सदा रता।
आप हमारे अंशी प्रभु!
मैं सर्वांश आपका विभु!
।।हरिगुरू शरणम्।।