धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्।
अभ्युदय और निःश्रेयस
की सिद्धि कराने वाला धर्म
हम मनुष्य हैं इस स्वरूप
को धारण कराने वाला धर्म
और मनुष्यता आ जाने पर
सर्वत्र ” प्रेम” रूप दृश्य “वह”
प्रेम प्रकट घट-घट में बोले।
बिना प्रेम कोई नहिं डोले।
प्रेम बहे विश्वास श्वास है।
गुरु दिखलाए कटे फास है।
संसार में जो ” प्रेम ” है वह दीखता नहीं।
जो “संसार”नहीं है वह दीखता है।
गुरु तत्व (शास्त्र सन्त) “प्रेम” द्रष्टा है।
शरणागत अनुगत को दर्शयिता भी” वही”
सो जानै जेहि देहु जनाई।
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।।
।।हरिः शरणम्। गुरुः शरणम्।।