समञ्जस! त्वां विरहय्य काङ्क्षे

हे सर्वसमर्थ! अकारणकरुणावरुणालय
आर्तों के आर्तिहर अज्ञानतिमिरहर
सर्वार्थदाता ज्ञानप्रकाशप्रदाता

आपकी कृपा करुणा बिना
ब्याकुल तो यह जीव रहेगा ही।

करुणाकर करुणानिधि तो
विश्वास रूप ही हैं।

बिनु बिस्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।

बिना विश्वास भक्ति कैसी-

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिश्वासा।
बिनु हरिभजन न भव भय नासा।।
देखिये भक्ति का का अर्थ सेवा भी है।

भगवान् के सर्वश्रेष्ठ सेवक भक्तराज
श्रीहनूमान् जी महाराज –

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई।
जबत तव सुमिरन भजन न होई।।

आशय क्या?
संसार -शरीर सेवन ।अर्थात्-
रूपया पैसा मान बड़ाई पद प्रतिष्ठा
मन में बैठा तो चूके। और पतन।
यानी की कर्मजाल तनेगा ।
अच्छा बुरा भोग ।
इन्द्र यक्ष गन्धर्व शूकर कूकर भोगों
शरीरों का मिलना।

इसलिये वह भक्त आर्त- चातक
जिज्ञासु – कोयल
अर्थार्थी- तोता
ज्ञानी – चक्रवाक
बन कर प्रिया-प्रिय के इस धरती पर
प्रथम मिलन की रूपमाधुरी-रस के
आस्वाद का आतुर है।
और काल है श्रीसीताराम- विवाह
का अनादि -नित्य उपस्करण साधन।

1-आर्त भक्त अत्यन्त अनन्य प्रेमी
है। जैसे चाहहुँ तुमहिं समान
सुत के कामी महाराज मनु।
और अन्यद् जन्म में श्रीदशरथ।
यही चातक पक्षी है। आप सरिस खोजहि कहँ जाऊँ। कहकर स्वयं दशरथ बने मनु को धन्य करने तद् जन्य श्रीराम। और इन्हीं श्रीराम के वन जाने पर परम दुखी श्रीदशरथ जी महाराज की आर्ति अद्भुत है। भगवान् का सबसे बड़ा भक्त यही आर्त है। जिसके प्राण तो सर्वप्राणनाथ प्रभु ही हैं।

व्याकुल हैं विक्षिप्त हैं।
इनके समान है ही कोई नहीं।
व्याकुलता बढ़ती जाती है।
श्रीराम का वियोग असह्य है-

हा रघुनन्दन प्राणपिरीते।
तुम बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

जैसे चातक की अनन्यता स्वाति नक्षत्र
के जल में है, वह इसके समक्ष
गंगा के परमपवित्र जल का तिरस्कार
करता है ।

वैसे ही पुकारते -पुकारते अधीर
हो जाते हैं महाराज-

हा जानकी लखन हा रघुबर।
हा पितु हित चित-चातक जलधर।।

और चातक पक्षी की तरह महाराज
का प्राण ही प्रयाण कर जाता है-राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरह, राउ गयेउ सुर-धाम ।।

2- जिज्ञासु, तो कोकिल पक्षी की तरह
है, जो अपनी कुहू में ऐसा
राग देता कि, कहाँ-कहाँ की ध्वनि का
नाद भगवान् को स्तब्ध कर देता है।

इस भक्त की भी अनन्यता है।
जैसे आर्त की।
इसे भी ऐहलौकिक, पारलौकिक
भोगों से विरति और श्रीरामरति ही है।

वह, तो श्रवणमनननिदिध्यासनादि
द्वारा अज्ञान-तिमिरान्ध संसार
का उच्छेद चाहता है।

अज्ञानसंसार की विस्मृति हुई नहीं कि
ज्ञानस्वरूप तो विद्यमान है-
संसार विस्मृति और प्रभु-स्मृति ही
इस जिज्ञासु जिज्ञासा है-

“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”

इस संसार की हूक(दुख) से व्यथित वह
कोकिल की तरह कुहू-कुहू के
राग में कहाँ -कहाँ हेरता है अपना
आत्म।

3- ज्ञानी भक्त चकोर पक्षी है।
यह भी अनन्य भक्त है।
इसे परम प्रभु, जो ज्ञानस्वरुप हैं,
की अविचल स्मृति चाहिए।

ज्ञानी और भक्त में कोई भेद नहीं।

ग्यानिहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसंभव खेदा।।

जानना(ज्ञान) इसलिये कि जाने बिना
तो प्रेम संभव नहीं। और वह तो
“परमप्रेम” हैं।

जाने बिनु न होइ परतीती ।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।

प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई।
जिमि खगेस जल कै चिकनाई।।

4 – अर्थार्थी भक्त, शुक (कीर) भी
पूर्व -पूर्व भक्तों की तरह ही अनन्य
प्रेमी है। इन प्रेमियों का अर्थ-पुरुषार्थ

सामान्य नहीं है। इन्हें लौकिक या
अलौकिक कुछ भी नहीं चाहिए।

जैसे कि प्रह्लादजी, ध्रुव जी।
और परम भक्त वृत्रासुर।

इन्द्र,ध्रुव आदि लोक की कामना नहीं।

ब्रह्मलोक और ब्रह्मादि पद तुच्छ हैं।

सारी धरती का साम्राज्य नहीं चाहिए।

धरती के नीचे के सुतल तलातल
पाताल का आधिपत्य भी नहीं।

योगसिद्धि भी नहीं। और मोक्ष भी नहीं।

उसे तो मात्र प्रभु चाहिए।

इसलिये परीक्षित् से वृत्रासुरमाध्यम
द्वारा बोलता है शुक(देव)-

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,

समञ्जस! त्वां विरहय्य काङ्क्षे ।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सीता -विहार-विपिनेरमतां मनो मे

सन्त भक्त चरित्रों का मनोरमण
तो भगवती जगदम्बा जानकी
सीता राधा और विन्ध्यविहारिणी
विन्ध्यवासिनी के विहार विपिनों
में ही होता है।इन सन्त-भक्तों की चार कोटियाँ

गीतागायक गाते हैं-

आर्तः जिज्ञासुः अर्थार्थी
ज्ञानी च भरतर्षभ ।
उक्त सभी सन्त तो, भगवान् की
सुमधुर लीला के लोभी हैं।
लोभ संवरण करना भी इनके वश
में नहीं है।
अतः ये सभी , मिथिला में
आकर निवास करने लगते हैं। अब
लीला-धारी क्या लीला करते हैं।
रसिक दृष्टिपात करें। यज्ञ रक्षार्थ भगवान्

श्रीराम ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के साथ
पधारते हैं।
यज्ञ -कार्य निर्विघ्न पूर्ण
कराते हैं। यज्ञ परिसमाप्ति होते
ही मिथिला-नरेश श्रीजनक जी
का आमन्त्रण, श्रीविश्वामित्र जी को
सीतास्वयंवर में सपरिकर
पधारने के लिये प्राप्त होता है।

भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के
साथ , महर्षि, मिथिला पहुँचते हैं। सुन्दर पर्ण -कुटीर में सादर ठहराया

जाता है।
मिथिला वासी भक्तों को दर्शन
देने और उनकी श्रद्धा फलीभूत करने
के लिये जीवाचार्य शेषावतार
लक्ष्मण जी को ब्याज बनाया जाता
है। भगवान् विश्वामित्र जी से कहते हैं-

लखन हृदय लालसा विसेषी।
जाइ जनक पुर आवहुँ देखी ।।

नाथ लखन पुर देखन चहहीं।
प्रभु सकोच डर प्रकट न कहहीं।।

जौं राउर अनुशासन पावौं।
नगर देखाइ तुरत लै आवौं।।

गुरु आज्ञा मिल जाती है ।
भगवान् मिथिला नगरी में जाकर
अपने दर्शन से सभी को कृतार्थ
करते हैं। लगता है कि-
जल्दी -जल्दी नगर दिखा कर
मानों भगवान् भयवश लौट आए।

वस्तुतः भगवान् अपने अत्यन्त
आत्मीय ऋषि मुनि सन्त भक्त
के द्वारा विहित अनन्या भक्ति
का प्रभाव दिखाने के लिए
डर का नाटक करते हैं-

जासु त्रास डर कहुँ डर होई।
भजन प्रभाव देखावत सोई ।।

रात्रि में ” गुरु पद कमल पलोटत प्रीते”
“बार-बार मुनि अग्या दीन्ही”
तब जाकर शयन करते हैं।

सम्पूर्ण प्रातः कृत्य पूरा कर गुरु
आज्ञा से वाटिका में पुष्प चयन
के लिये जाते हैं-

समय जानि गुरु आयसु पाई।
लेन प्रसून चले दोउ भाई।।मिथिला नरेश के बगीचे में

भगवान् का आगमन जान
वसन्त ऋतु भी लुब्ध होकर
आ बसी है-

भूप बाग बर देखेउ जाई।
जहँ बसन्त ऋतु रही लोभाई।।

अब उपयुक्त अवसर जान कर सभी
भक्त सन्त भी चार पक्षियों का रूप
धरे वृक्षों पर आ विराजते हैं।
देखिये –

आर्त( प्रेमी) भक्त तो चातक बने हैं।

जिज्ञासु सन्तभक्त कोकिल रूप धरे हैं।

अर्थार्थी भक्त कीर (शुक) रूप में हैं।

ज्ञानी भक्तों की शोभा चकोर मण्डली
के रूप में मन्त्र मुग्ध है।

चातक कोकिल कीर चकोरा।
कूजत बिहग नटत मन मोरा।।

इन सभी सन्तों का मन – मयूर नाच
रहा है, पक्षी रूप में सभी
आनन्द विभोर हैं।

आखिर दर्शनीय तो भगवान् ही हैं।
इन्ही की रूपमाधुरी का वर्णन
सभी ओर हो रहा है-

जहँ तहँ छवि बरनत सब लोगू ।
अवसि देखिये देखन जोगू।।

भैया! यह सीता-वाटिका अनुपम
है। इसमें विद्यमान पादप-वृक्ष
पत्ते- फूल-फल सभी ने ” मैथिली”
के हाथों का स्पर्श जो पाया है।

जानकी के चरण-कमलों के “चिन्ह”
जहाँ विलास करते हुए आनन्दित हैं।

सीता और वहाँ वर्तमान सीतापति का
यशोगान करती हुई उक्त
1- आर्त(चातक)
2-जिज्ञासु(कोकिल)
3- अर्थार्थी (शुक)
4- ज्ञानी ( चकोर)

सन्तों की विहग-मण्डली विराज रही
है। और सोचिये ऐसी विहार-वाटिका
में ही भगवत्प्रेमी सन्तो का मनोरम
“मन” रमता है।

रमन्ते योगिनः सन्तः भक्ताः
यद्रूपमाधुर्यां रामा-रामयोः
तत् कथं
नाश्रीयताम्? अत एव –

सीता-करावचित-पल्लव-वल्लरीके ,

सीता-पदाङ्क-विलसन्मधुरस्थलीके ।

सीता-यशो-मुखर-मत्त-खगावलीके,

सीता-विहार-विपिने रमतां मनो मे ।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

हरिजन कहिं – कहिं होय

सन्त तो दुर्लभ हैं लेकिन भगवान्
सुलभ।
श्रद्धा भक्ति प्रेम सत्य करुणा से
मिल जाते हैं सर्वत्र-

हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।

सन्त क्या हैं?

सन्त सभा अनुपम अवध ।
सकल सुमंगल मूल।

सन्तों की उपमा या समता किसी से
भी सम्भव नहीं।

हाँ यह सन्त समूह ” अवध ” हो तो हो
सकता है, जो सारे मंगलों का मूल है।वस्तुतः सन्त तो समान चित्त वाले हैं।

इनका अपना कोई हिताभिलाष नहीं।
किसी प्रकार का उँच-नीच गत भेद-भाव
भी इनमें नहीं है।

एक हाथ से जब फूल तोड़कर
दूसरे हाथ में रखा जाय, तब एक जैसा
सुगन्ध दोनों ही हाथों में होता है।

एक हाथ तो फूल तोड़ने वाला होने से
तोड़ने से अपराधी(भक्षक) है तो
दूसरा उसे अपने में रखकर, सुरक्षा देने
से रक्षक भी ।
लेकिन “पुष्प” तो शरणागत सन्त
भक्त की तरह है, जिसे किसी भी
भक्षक या रक्षक,हाथ से कोई गिला
शिकवा नहीं।

पुष्प की भाँति, सन्त, तो दोनों हाथों
को समान सुगन्ध से सुवासित
करते हैं। अतः हमारे लिये सभी सन्त
वन्दनीय हैं-

बन्दउँ सन्त समान चित,
हित अनहित नहिं कोउ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि,
सम सुगन्ध कर दोउ।।

अब इसीलिये “भक्तमाल” ग्रन्थ का
प्रतिपाद्य ही भगवद् भागवत् या
भगवान् भक्त का भजन है-

“भजिबे को दोऊ सुघर कै हरि कै
हरिदास।”

ये हरिदास तो भगवान् के भक्त
निष्कामी साधु ही हैं।

भगवान् की चरण शरण ही इनकी
एक कामना है।
वे जैसे रखना चाहें रखें उनकी मर्जी।

“भागवत” के एकादश स्कन्ध के
चौदहवें अध्याय में भगवान् ने इन
साधु भक्तों को अत्यन्त निष्कामी
कहा है- इन सन्तों के लिये ब्रह्मा और इन्द्र

का साम्राज्य व्यर्थ है।
धरती का एकच्छत्र राजत्व
इन्हें नहीं चाहिए।
योग की सिद्घियाँ और मोक्ष भी
इन्हें तुच्छ प्रतीत होती हैं।
ये सन्त स्वयं को भगदर्पित कर
देते हैं, और इन्हें भगवान् और उनकी
आज्ञाकारिता के सिवा कुछ भी
अपेक्षित नहीं है-

न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं ,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं ।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,
मयि अर्पितात् मेच्छति मद बिनान्यद् ।

इसलिये भगवान् का अर्चावतार उनकी
मूर्ति के रूप में तो सर्वत्र है।
हम श्रद्धा विश्वास से पूजते ही हैं।
लेकिन साधु सन्त तो हरिकृपा और
पुण्यसमूह के इकट्ठा होने पर,
बड़ी कठिनाई से मिलते हैं-

हरि दुर्लभ नहिं जगत् में,
हरिजन दुर्लभ होय।
हरि हेर् याँ सब जग मिलै,

हरिजन कहिं-कहिं होय।।

गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।

कहत साधु महिमा सकुचानी

बड़े-बड़े पतितों के कल्मष का काल ,
बनी कल कल निनादिनी गंगा ।

उस गंगा का पाप धो देते हैं,
साधु।

इसलिये साधु महिमा कहना
कठिन है । साधु और गंगा की प्रकृति एक है, वह है पाप प्रक्षालनता ।

“दर्शनादेव साधवः” और

गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः । दर्शन मात्र से जीवन-मुक्त करनेवाले दोनों

लेकिन गंगा का भी पापताप
सन्ताप धोने वाले होने से
साधु/ सन्त श्रेष्ठ हैं। क्यों नहीं हों? एक अर्थ तो साधु का यह कि

पर- कार्य को साधने वाले होते हैं। इन साधुओं का स्वयं का अपना

अपना कोई स्वकार्य ही नहीं है।

नदी,वृक्ष ,पर्वत धरती की तरह सन्त
भी परहित पूरा करने के लिये
भगवान् की आज्ञा से जन्म लेते हैं-

सन्त विटप सरिता गिरि धरनी ।
पर हित हेतु सबन्हि कै करनी ।।

यह तो अपना परम (चरम) और
अन्तिम हित,पहले ही सिद्ध
कर चुके होते हैं। नारायण!
वह है परम परात्पर परब्रह्म
परमात्मा की प्राप्ति ।

इसलिये दूसरों (पर) के कार्य का सिद्ध करना ही इनका अशेष शेष
कार्य है।

साध्नोति परकार्यम् परकार्याणि वा
इति साधुः । मतलब कि – 1- पर अर्थात् दूसरों का कार्य साध

देना।
इस तरह एक अर्थ इस शब्द
से ही प्रतीत होता है।

2- अब दूसरा अर्थ है पर यानी कि
परमात्मा से ही मिला कर दूसरों का
भी अन्तिम लक्ष्य पूर्ण कर देना-

साध्नोति परं परमात्मानम् इति साधुः परोपकाराय सतां विभूतयः

परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर

“अजामिल” को सन्त मिले और उसके
द्वारा पुत्र के बहाने से ” नारायण “
नाम लेने पर, उसका पापक्षय हुआ।
और परमात्मप्राप्ति भी हो गई।

परमहंस श्रीरामकृष्ण देव ने
विवेकानन्द स्वामी को
माँ काली का दर्शन करा कर
उनका परम लक्ष्य दे दिया। "नाम सप्रेम जपत अनयासा।

भगत होहिं मुद-मंगल-वासा ।।” नामजापक विभीषण को

भक्तराज श्रीहनूमान् जी दर्शन क्या
हुआ, उसको श्रीराम जी की ही
प्राप्ति हो गई। लंका का राज्य
भोग कर रमावैकुण्ठ मिला।

भैया! क्या कहें, चन्द्र और सूर्य
अलग -अलग समय में उगते हैं,
सन्त तो एक समय में, एक साथ
दोनों बन जाते हैं।
सूर्य बनकर पापराशि जलाते हैं।

तो, चन्द्रमा बनकर शीतलता से
“परमशान्ति” रूप “परममात्मा”
की प्राप्ति कराते हैं-

“सन्त उदय सन्तत सुखकारी।
विश्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।।”

इसलिये पर (दूसरों) के दोनों
हित – संसारलोक/ परलोक
रमावैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कराने
साधु सन्तों की महिमा कौन कहे?चाहे वह कोई भी -

“विधि-हरि-हर कवि कोविद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।”

संकोच लगता है भगवान् को भी
अपने प्राणप्यारे साधुसन्तों का
यश कहने में।
क्योंकि कि ये सन्त तो भगवन्त
से भी एक कदम आगे हैं।आत्मरूप परमात्मरूप होने

लगता है, भगवान् को इन सन्तों
का यशोगान अपना स्वयं का
यशोगान लगता है।
आपन मुँह आपन करनी
बखानना तो धृष्टता है।

इसलिये बाबा का सिंहनाद
जोर-जोर से जोरदार कई बार

बिधि हरि हर कवि कोबिद बानी।
कहत साधु महिमा सकुचानी।।

हरिः शरणम् । गुरः शरणम् ।

सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं

आखिर सन्तों के पक्ष में क्यों ऐसा
पतन,कि इनके मिलन के समान
लोक/अलोक का कोई सुख नहीं। बाबा की बात है। कौन अकड़ेगा ।

सोचना तो पड़ेगा ।

वस्तुतः गंगा जब पापियों के पाप से
सपाप होती है, तब सन्त इसे,
निष्पाप बनाते हैं ।

श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध के नवें
अध्याय में एक प्रसंग है-
गंगा-भगीरथ का संवाद ।

अपने पितरों के सन्तरण हेतु भगीरथ
कठोर तपश्चरण रत होते हैं ।

श्रीविष्णु-पादाब्ज-जाता , भगवती
गंगा धरती पर आकर सगर-पुत्रों को
तारने के लिए उद्यत होती हैं। किन्तु एक बड़ा प्रश्न हो गया खड़ा । गंगा ने भगीरथ से कहा- मैं आपके

पितरों को तारने को तैयार हूँ।

लेकिन, अनेक पापिष्ठ लोगों के मल से
जब मैं भी मलिन हो जाउंगी तब
हमारा मालिन्य कौन धोयेगा ?

भगीरथ ने माँ गंगा से कहा – साधवः न्यासिनः शान्ताः , ब्रह्मिष्ठाः लोकपावनाः । हरन्ति अघं तेङ्गसङ्गात् , तेषु आस्ते हि अघभिद् हरिः।।

साधु/सन्त
मतलब कि – साधु सन्त जो
परहित हेतु भगवदाज्ञा से आते हैं, वे
आपका मालिन्य धोयेंगे।
साध्नोति परकार्यम् इति साधुः ।

न्यासी, यानी कि एषणा त्रय,
सुत-वित-लोक की अभिलाषा
का न्यास “सत्” में करनेवाले सन्यासी
अपने दण्डादि सहित स्वयं आपके
जल में उतर कर आपके पाप
का प्रक्षालन सर्वहित में करेंगें।

जिनका संसार-समुद्र किसी चन्द्र को
देखकर कभी हिलोरें नहीं मारता, ऐसे
शान्त, मन-बुद्धि-चित्ताहंकार वाले
महात्मा आपको निर्मल करेंगे ।

ब्रह्म के दो अर्थ हैं- वेद और परब्रह्म।ब्रह्मिष्ठ अर्थात् अमृतवद् वेद और ब्रह्मवेत्ता " ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"

जैसे ब्रह्मपरायण आपका पापसन्ताप
पराजित करेंगे। लोक को अपने मनवचनकर्म से

पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु आपकी –
पाप राशि को जीर्ण-शीर्ण (विनष्ट) कर
डालेंगे।
इसलिये कि हे गंगे! उनका
अंग-संग आपको मिलेगा ।

अब सबसे बड़ी तो ये है कि करेंगे कैसे
ऐसा दुःसाहसिक कार्य?

करेंगे अवश्य क्योंकि इनके हृदय में
“अघासुर” जैसे मूर्तिमान् अघियों
का घात करने वाले
भगवान् श्रीहरि जो विराजे हैं।

श्रीहरि जिन सन्तों के हृदय में
प्रतिष्ठित हो गये हैं, ऐसे-
हनुमत् शुकसनकादि
नारद, व्यास-वाल्मीकि, तुलसी,
ही ऐसा करने में समर्थ हैं।

इनका समाज तो मुदमंगलमय है।
ये सन्त तो चलते फिरते तीर्थराज
प्रयाग हैं।
ये साधु सभी स्थानों पर, सदैव
सभी को आसानी से मिल जाते हैं।
और इनका सेवन सभी का क्लेश- हर्ता
बन कर भवसिंधु से तार देता है-

सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा।
सादर सेवत समन कलेसा।।

सन्त-त्रिवेणी में सानुराग स्नान करने
वाले लोग, धर्मार्थकाममोक्ष भी इसी
शरीर के रहते पा जाते हैं-

सुनि समुझहिं जन मुदित मन,
मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु,
साधु- समाज प्रयाग ।।

इसीलिये, असहज को सहज, मलिन
को निर्मल बना कर भगवान् को ही दे
देने वाले परोपकारमूर्ति सन्त,

पतितपावनी गंगा को निर्मल बनायेंगे
ऐसा भगवद्- भागवद् वचनों पर
विश्वास करना चाहिए-

पर उपकार वचन मन काया।
सन्त सहज सुभाव खगराया।।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

भवसिन्धु बिना जलजान

इस भवाब्धि के पार जाने के लिये
गुरु कृपा अनिवार्य है।और

वस्तुतः गुरु तत्व तो भगवत् तत्व
ही है।

गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः गुरुः देवः महेश्वरः अब देखिये, शास्त्र और सन्त वचनों

पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
भगवान् के परम पावन नाम ही
ही इस युग में परम कल्याण कर्ता हैं।राम सकल नामन ते अधिका । होहु नाथ अघ खग गन बधिका।।

नीलोत्पल तन श्याम ,
काम कोटि सोभा अधिक ।
सुनिअ तासु गुन ग्राम ,
जासु नाम अघ खग बधिक ।।

नीलाम्बुज श्यामल कोमलांग प्रभु हैं ।
क्योंकि जगत् के प्रमुख रंग तमस को
रजस में और रजस् को सत्व गुण में
अन्तरित करके, उससे ऊपर की
गुणातीत अवस्था में पहुँचा देते हैं।इसलिये कि प्रभु भी स्वयं गुणातीत ही

हैं। और गुणातीत हुए बिना संसारातीत
स्थिति की कल्पना स्वप्न है।

संसार का मोह ,अविद्या, माया तो
पंच क्लेश की परधि है।
नाना शरीरों से एकत्रित ये
अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष और
अभिनिवेश तो नामादि जप से
गुरु/भगवत् तत्व की प्राप्ति से ही
जायेगें ।

अज्ञानपूरिता माया अविद्या है। यह जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनायित्री है।

भगवान् अपनी चिरसंगिनी और सदैव
उनसे अभिन्न (कहियत भिन्न न भिन्न)
” विद्या माया ” के संकल्प से सृजन
आदि कराते हैं –

वह विद्या माया जगदम्बा जानकी हैं-

यही सृजनादि कराती हैं। करती नहीं।

पंचक्लेश को हरती, प्रेयमार्ग से विरत
करके श्रेयमार्ग दात्री हैं। हम शरणागत
हैं। अन्यदुपाय नहीं-

उद्भव- स्थिति-संहार-कारिणीम्
क्लेश – हारिणीम् ,

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं,
रामवल्लभाम् ।

नारायण! क्या कहें, यह – अहं ही अस्मिता। और अभिमान, अहन्ता है।

ममता,मेरा शरीर संसार, और उसमें
किसी वस्तु-व्यक्ति-पद-पदार्थ के
लिए काम /राग बुद्धि ” राग” है। और
किसी संसारी वस्तु आदि के लिए
राग न रहने रुप शत्रु भाव ही
द्वेष है।
अथवा संसार मैत्री और शत्रु भाव को “राग” और ” द्वेष ” कहेंगे।

किसी संसारी वस्तु आदि को स्वयं
अपने रुचि के अनुकूल होने से
उसे भ्रमवश मनोनुकूल मानना
“अभिनिवेश” है। अब उपर्युक्त दोषों को दूर करने

वाले भगवान् ,तद्भिन्न भगवती वैष्णवी
शक्ति विन्ध्यवासिनी हैं।

मार्कण्डेय ऋषि ने कहा –

त्वं वैष्णवी शक्तिः अनन्तवीर्या ,
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतद् ,
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः । गुरु रुप में उपजे "कृपासिंधु नर रूप हरि" कृपालु और तच्छक्ति की चरण शरणग्रहण से

से ही पंचक्लेश नाश होगा

यह, भगवन् नाम रूप गुण लीला धाम
ही है जो व्यपाश्रित जीव को आश्रय
प्रदान कर पुनः शरीर के आदान
से बचा लेगा ।

कम से कम बाबा तुलसी की बुध्दि तो
यही निर्धारित करती है-

सकल सुमंगल दायक,
रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं
भवसिंधु बिना जल जान ।।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम् ।

चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावै कोइ।

भगवान् की कथा का कोई पारावार नहीं।
“चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्”
रामायण शत कोटि अपारा

अनन्त ब्रह्माण्डों में विचरते हुए
श्रीकागभुशुण्डि जी कई कल्पों तक
उन ब्रह्माण्डों में रहकर श्रीरामलीलाकथा
रस का पान करके लौटते हैं।भाव विभोर हैं।

इधर बालकाण्ड में बाबा तुलसी ने इस रामकथा की उत्पत्ति सुनाई है।
यह कथा देवाधिदेव,भगवती उमा को सुनाते हैं। और वे ही इस कथा को, योग्य
अधिकारी श्रीकागभुशुण्डि जी को देते हैं।
इनसे यही कथा पाकर याज्ञवल्क्य जी
भरद्वाज ऋषि को सुनाते हैं –

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा।।

सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा।
रामभगत अधिकारी चीन्हा।।

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा।
तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।

और देखिये, यह रामलीला कथा पुनः
उत्तरकाण्ड में श्रीगरुड जी ने, इन्ही
कागभुशुण्डि जी से सुनी है।

यह कथा, इस कलिकाल में अभीष्ट सिद्धि देने वाली, सज्जनों की संजीवनी बूटी,और इस धरती पर तो मानो
अमृत की नदी है।
संसृति से मुक्त करने वाली तथा समस्त
अविद्या माया के भ्रम -संशय को दूर
करती है।यह तो भ्रम रूपी मेंढक को
लीलने वाली लीलाकथा है।
क्योंकि “संशयात्मा विनष्यति”
भगवद् वचनों से जीव का आपातपतन
तो संसारानुरक्ति से सुनिश्चित है। अतः

रामकथा कलि कामद गाई।
सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।

सोइ वसुधा तल सुधा तरंगिनि।
भवभंजिनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।

यहाँ उत्तरकाण्ड में गरुड जी इस कथा
को सुन कर वैसे ही धन्य हैं, जैसे कि
जगदम्बा पार्वती जी।
कागभुशुण्डि जैसे रामभक्त/ सन्त को
पाकर गरुड विह्वल हैं, तो ऐसे ही अपूर्व
रामानुरागी भगवान् शिव को पाकर
अपर्णा पार्वती –

धन्य धन्य गिरिराज कुमारी।
नहि कोउ तुम्ह समान उपकारी ।।

गरुड जी ने कहा-

आजु धन्य मैं धन्य अति,
यद्यपि सब विधि हीन।

निज जन जानि राम मोहिं,
सन्त समागम दीन्ह ।।

तब कागभुशुण्डि जी बोले –

जिन भगवान् की महिमा वेद, नेति-नेति
(इतना ही नहीं, इतना ही नहीं बल्कि
इससे भी आगे और ) कहकर गाते हैं,
उनका अतुलनीय बलप्रतापप्रभुत्व ,
कोई कह नहीं सकता-

महिमा निगम नेति करि गाई।
अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।

इनके स्वभाव जैसा कोई देखा सुना नहीं
गया है। इनके समान कोई नहीं।

अस सुभाव कहुँ सुनहुँ न देखहुँ।
केहि खगेस रघुपति सम लेखहुँ।।

अधमाधम प्राणी को भी तारना इनकी
प्रकृति है। अभिमान तो स्पर्श करता
नहीं। अपने किये कामों का श्रेय औरों
को देते हैं।
राक्षस -वध का श्रेय गुरुश्रेष्ठ
वशिष्ठ और वानरों को देते हैं।

क्योंकि श्रीराम जी ने कहा था –

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।
भये समर सागर कहुं बेरे।।

गुरु बसिष्ठ कुल पूज्य हमारे।
इनकी कृपा दनुज रन मारे।।

ऐसे प्रभु की लीलाकथा रस का सेवन
किये बिना – साधक, सिद्ध, विमुक्त,
उदासीन, कवि, विद्वान्, परोपकारी,
सन्यासी, योगी,बलिष्ट, तपस्वी, ज्ञानी,
धर्मशील पण्डित और विशिष्ट ज्ञान से
परिपूर्ण कोई भी प्राणी सृष्टि चक्र से
पार नहीं पा सकता-

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी।
कवि कोबिद कृतग्य सन्यासी।।

जोगी सूर सुतापस ग्यानी।
धर्म निरत पंडित विग्यानी।।

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी।
राम नमामि नमामि नमामी।।

इसलिये इनके नाना रूप लीला धाम
का आश्रय लेना ही पड़ेगा।

कबीर ने कहा था कि इस माया और
इसके संसार ने ब्रह्मा,शिव आदि को भी
आकृष्ट कर लूट लिया था। औरों की
बात क्या?
गुरु कृपातः प्राप्त वह रामशब्द ही था
जिसने रूपलीलाधाम की अविचल
स्मृति कराते हुए तार दिया, पार दिया-

रमैया की दुलहन ने लूटल बजार
ब्रह्मा को लूटल, शिव को भी लूटल,
लूटल सकल संसार।
कबिरा बच गया साहब कृपा से
सबद डोर गहि उतरा पार ।।

कबीर ने नाम जप से लीला की
अविस्मृत स्मृति में विमुग्ध कुष्ठीकाया
की प्रसंशा की। और सुन्दर शरीरों
की निन्दा भी,जिनके मुखों में राम नहीं
रमता-

नाना जपत कुष्ठी भलो,
चुइ चुइ गिरै जो चाम ।
कंचन देह न काम की,
जिन मुख नाहीं राम ।।

इसलिये कागभुशुण्डि जी महाराज ने
अपने लीलाकथामृत प्रसंग में भगवान्
के नाम चरित्र को अपार-अथाह कह
डाला, जिसके सेवन से ही
संसार में थाह पाया जा सकता है-नाम यथामति भाषेउँ, राखिउँ नहीं कछु गोइ। चरित सिन्धु रघुनायक, थाह कि पावै कोइ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

सेव्या सेव्या सदा सेव्या श्रीभद्भागवती कथा। यस्याः स्मरणमात्रेण, हरिः चित्तं समाश्रयेत्।

भगवान् की जिस कथा के निरन्तर श्रवण करते-करते,हमारा कलुषित चित शुद्ध
हो जाता है।
अपवित्र वाह्य आभ्यन्तर काया को, जो भगवान् स्मरण मात्र कर लेने से पवित्र कर देते हैं।
और स्वयं बारम्बार नामरूप स्मरण
तथा कथा-श्रवण से जो भक्त हृदयों में
विराजते हुए अपनी साक्षाद् अनुभूति
ही करा देते हैं, ऐसे आनन्दकन्द भगवान्
और उनकी कथा को सतत प्रणाम ।

भगवान् की ऐसी जनमनरंजिनी कथा, जिसे –
रचि महेस निज मानस राखा
पाइ सुसमउ शिवा सन भाषा।।

जैसे भक्त-हृदय तुलसी के हृदय में क्यों
न विराजे और श्रीरामचरितमानस के
रूप में कल्याणकरिणी हो जाय ।

सन्त संगति वश सुनी जाती हुई वह कथा
स्वयं के प्रति ,प्रीति जगा देगी ही । क्योंकि यह विद्वानों को शान्तिदात्री, समस्त रसिकों को मोदप्रदात्री और कलियुग के कालुष्य की नाशकर्त्री है। सर्प को काट खाने वाली मोरनी है।

विवेकशक्ति रूपी अग्नि को जलाने वाली
अरणि( लकड़ी) है-

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि ।
राम कथा कलि कलुष विभंजनि।।
राम – कथा कलिपन्नग भरनी।
पुनि बिवेक पावक महुँ अरनी ।।

यह तो चन्द्रमा की चन्द्रिका है, जिसका
सन्त/भक्त चकोर बन कर पान करते हैं
यह कामधेनु है ,जो सेवन करने पर सब सुखों को देने वाली है।
सज्जन-समाज और देववृन्द ऐसी कथा अवश्य ही सुनते हैं-

रामकथा ससि किरन समाना।
सन्त चकोर करहिं जेहिं पाना।।

राम कथा सुर धेनु सम,
सेवत सब सुख दानि।
सत समाज सुर लोक सब,
को न सुनै अस जानि ।।

और क्या -क्या कहें , मन ही नहीं भरता

मोह सकल ब्याधिन कर मूला ।
ताते उपजहिं बहु बिध सूला।। जैसे इस कलि काल में शस्त्रसज्ज

महामोह रूपी महिषासुर के लिए यह
साक्षाद् महिषासुर मर्दिनी दुर्गा है-

महा मोह महिषेस विसाला।
राम – कथा कालिका कराला । और

हाथ की ताली की तरह सुन्दर यह
कथा तो, संशय – पक्षी को उड़ा कर
भगा देती और सारा भ्रम नष्ट –

रामकथा सुन्दर करतारी।
संशय बिहग उड़ावन हारी।।

इसे सुनकर जिनका मन भर गया, तो
यह समझिये कि ऐसे लोगों ने –
” रसो वै सः। रसं हि एव अयं लब्ध्वा
आनन्दी भवति । “
जैसे रस/आनन्द विशेष परमात्मा को जाना ही नहीं –

रामकथा/रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रस बिसेस जाना तिन नाहीं ।।

तो इसलिये जिन रसिकों के कर्णेन्द्रिय
समुद्र के समान हैं,उनके लिए कथा तो
ऐसे सुन्दर सरोवर के समान है ,जो
निरन्तर कथाजल से भरते हुए भी
कभी भरने का नाम नहीं लेती।
और ऐसे श्रेष्ठ भक्तों के हृदय में
परमात्मा विराजते हैं-

जिनके श्रवण समुद्र समाना ।
कथा तुम्हारि सुभग – सर नाना।।

भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे ।
तिनके हियँ तुम्ह कहुँ गुह रूरे ।।

इसलिये भगवान् की कथा सदैव
आश्रयणीय है। जिसके श्रवण मात्र
से भगवान् स्वयं आकृष्ट होकर , राम(रमने वाले) कृष्ण (आकृष्ट होने/होवाने वाले) नाम को सार्थक करते हुए
आकर भक्त हृद्देश को प्रतिष्ठित करते हैं-

अतः भगवत् भागवत् माहात्म्य है-

सेव्या सेव्या सदा सेव्या
श्रीमद्भागवती कथा ।
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिः
चित्तं समाश्रयेत् ।।

गुरूः शरणम् । हरिः शरणम् ।

गावत गुन सुर मुनि नर बानी । राजा राम अवध रजधानी।।

जहाँ राजा राम बसते हैं,वही उनकी राजधानी है। नाम है, अवध । अवध क्या है? जहाँ किसी के वध का भाव ही नहीं आये।

आचरण की बात तो कहीं नहीं है।

वध शब्द, हिंसा का अर्थ देता है।

तब अवध का अर्थ है ,अहिंसा।

अब देखिये , हिंसा शब्द के दो अर्थ हैं।

हन् हिंसागत्योः, के विमर्श में हिंसा के दो अर्थ हो गये।

एक , हिंसा का अर्थ वध है।

दूसरा गति अर्थवाला है।

दूसरे अर्थ की ओर दृष्टिपात करें, तो

गति न होना ।
मतलब कि , अयोध्या -अवध ,वह क्षेत्र है, जहाँ मानव शरीर मिला तो , तो वह अक्षत-अव्यय स्वरूप हो गया।
तात्पर्य यह कि, वह दूसरे शरीरों में गति नहीं करेगा। अन्यत् जन्म ही नहीं होगा।

और फलतः मानव शरीर मिलना सार्थक
हो गया ।
और मानव शरीर ही क्यों, यह अवध क्षेत्र ऐसा है ,जहाँ विराजे भगवान् श्रीराम
का नाम -जप -स्मरणादि करने से ,इस
नाम को सुनने वाले मानवेतर प्राणी भी
तर गए ।

भगवान् ने नीच से नीच हिंसक प्राणियों
को भी रामावतार में तार दिया।

शबरी ,गीध सुसेवकन्हि सुगति दीन्हि
रघुनाथ ।

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं ।
सुजन विचार करहुँ मन माहीं ।।

नारायण! श्रीरामकृष्ण नारायण नाम के
स्मरणोच्चारण से यह, दुःखालयम् अशाश्वतम्, संसार-समुद्र ही सूख कर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

क्योंकि –

सो सुखधाम राम अस नामा ।
अखिल-लोक दायक विश्रामा

सुखनिधान भगवान् ही हैं।
वे ही समस्त प्राणी के आश्रयदाता हैं।
सुख के धाम हैं।

इसीलिये नाम का आश्रयी तो
वस्तुतः रामाश्रयी है ।

अतः ऐसा रामनामाश्रयी उस स्नेह मूर्ति में डूबने वाला तो, डूबकर तरेगा ही।

वह रामनाम के प्रसाद से ,प्रसन्नता से
आनन्द में मग्न होकर मुक्त विचरता है-

फिरत सनेह मगन-सुख अपने।
नाम-प्रसाद सोच नहिं सपने।।

स्वप्न मेंं भी स्वप्नवत् संसार की सोच यानी
कि शोक नहीं होगा।

इसलिये कहा कि सुर-नर-मुनि की वाणी
रामनाम और इनके गुणगणों को गा रही है –

गावत गुन सुर मुनि नर बानी।

राजा राम अवध रजधानी ।।

गुरः शरणम् । हरिः शरणम् ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल!

ब्रज के महान् सिद्ध सन्त सूरदास रहे।
नानायोनि-नर्तन शरीर के उन्होंने कहे।

काम क्रोध वस्त्र बने ग्रस्त किया मोह ने।
शब्दस्पर्श विषयों की माला कण्ठ पहने।

मोह की पायल पाँव पहने भ्रमे हैं सदा।
निन्दा-रस-रसाल में हम मग्न भये सर्वदा।

जगत् में भ्रमित मन बन कर मृदंग सजा।
दुःसंगी जनों संग बना बेताल बजा।

तृष्णा का नाद वाद्य अन्तरगत ध्वनित हुआ। बजता बेढंगा स्वर लोगों को भ्रम हुआ।

माया की रस्सी कटि बाँधे बेहाल रहा।
लोभ का तिलक देता सुन्दर सा भाल रहा

जल थल अकास मध्य पाई अनेक काया।
कोटि कला दिखलाई माया की माया।।

कौन करै दूरि यह अविद्या आप जानिये।
आप के भगाये जाय नन्दलाल मानिये।।

इसीलिये सूरदास-वचनों का मर्म भाव।
समझे,तब बही बानी अपने ही गुणस्वभाव।

तब अपनी अनुभूति जगी।
जगद् भाव मति रही लगी।।

यह अनेक जन्मों के कर्म का गणित
याकि गणित का कर्म ध्वनि दुःखों का रणित।

खुलता ना रहस्य वस्य जगत् के रहता मैं
बना रहता भेद ना सुलझता मर्म एकता

समझ नहीं आती यदि तुलसी
नहीं मिलते।
तुलसी नहीं मिलते हनूमान से मिलाते नहीं ।
कहूँ क्या पीड़ा प्रभू राम भी न मिलते।

राम यदि मिले उन्हे रसनासनासीन कीजै ।
राम नाम लीजै चाहे कृष्ण
नाम लीजै।
श्रीगणेश शंकर शिवा सूर्य नाम लीजै सब
कृष्णानुजा विन्ध्याचल रानी नाम की जै।

अतः

दुर्गा नाम गाइये और राधा नाम
गाइये।
सीता नाम गाते हुए जगद् बिसराइये
जगत् को बिसारे भगवन् नाम
के पुकारे बिना।
कौन तारे जग में,शिव-शिवा ही
सहारे हैं।
हारे हम जैसे जीव मलिन
और विषय-ग्रस्त।
बार-बार गिरते भवकूप
नाथ!भारे हैं।
तुलसी कबीर सूर मीरा औ मलूक गुरू
गौरवपूर्ण वाणी संसार से
उबारे है।

है असीम शक्ति इन भगवत्प्राप्त गुरुजनो में , टारो यह अविद्या हम जगद् के लबारे हैं ।
हम क्या कहें –

व्रज के रस राचे कृष्णराधा भाव सूर रहे।
राधाकृष्णसरिता में डूबे भरपूर रहे।।

इसीलिए दैन्यवश सूरदास जी गा उठे

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल
कामक्रोध कौ पहिरि चोलना,
कंठ बिषय की माल।
महामोह के नूपुर बाजै,
निन्दा सबद-रसाल।
भरम भयौ मन भयौ पखावज
चलत असंगति चाल।
तृष्ना नाद करति घट भीतर ,
नाना विधि दै ताल ।
माया कौ कटि फेंटा बाँधे ,
लोभ तिलक दिये भाल।
कोटिक कला काछि दिखराई,
जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अबिद्या,
दूरि करौ नन्दलाल ।

अब मैं नाच्यौं बहुत गोपाल ।

गुरः शरणम् ।हरिः शरणम्।