हे सर्वसमर्थ! अकारणकरुणावरुणालय
आर्तों के आर्तिहर अज्ञानतिमिरहर
सर्वार्थदाता ज्ञानप्रकाशप्रदाता
आपकी कृपा करुणा बिना
ब्याकुल तो यह जीव रहेगा ही।
करुणाकर करुणानिधि तो
विश्वास रूप ही हैं।
बिनु बिस्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।
बिना विश्वास भक्ति कैसी-
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिश्वासा।
बिनु हरिभजन न भव भय नासा।।
देखिये भक्ति का का अर्थ सेवा भी है।
भगवान् के सर्वश्रेष्ठ सेवक भक्तराज
श्रीहनूमान् जी महाराज –
कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई।
जबत तव सुमिरन भजन न होई।।
आशय क्या?
संसार -शरीर सेवन ।अर्थात्-
रूपया पैसा मान बड़ाई पद प्रतिष्ठा
मन में बैठा तो चूके। और पतन।
यानी की कर्मजाल तनेगा ।
अच्छा बुरा भोग ।
इन्द्र यक्ष गन्धर्व शूकर कूकर भोगों
शरीरों का मिलना।
इसलिये वह भक्त आर्त- चातक
जिज्ञासु – कोयल
अर्थार्थी- तोता
ज्ञानी – चक्रवाक
बन कर प्रिया-प्रिय के इस धरती पर
प्रथम मिलन की रूपमाधुरी-रस के
आस्वाद का आतुर है।
और काल है श्रीसीताराम- विवाह
का अनादि -नित्य उपस्करण साधन।
1-आर्त भक्त अत्यन्त अनन्य प्रेमी
है। जैसे चाहहुँ तुमहिं समान
सुत के कामी महाराज मनु।
और अन्यद् जन्म में श्रीदशरथ।
यही चातक पक्षी है। आप सरिस खोजहि कहँ जाऊँ। कहकर स्वयं दशरथ बने मनु को धन्य करने तद् जन्य श्रीराम। और इन्हीं श्रीराम के वन जाने पर परम दुखी श्रीदशरथ जी महाराज की आर्ति अद्भुत है। भगवान् का सबसे बड़ा भक्त यही आर्त है। जिसके प्राण तो सर्वप्राणनाथ प्रभु ही हैं।
व्याकुल हैं विक्षिप्त हैं।
इनके समान है ही कोई नहीं।
व्याकुलता बढ़ती जाती है।
श्रीराम का वियोग असह्य है-
हा रघुनन्दन प्राणपिरीते।
तुम बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।
जैसे चातक की अनन्यता स्वाति नक्षत्र
के जल में है, वह इसके समक्ष
गंगा के परमपवित्र जल का तिरस्कार
करता है ।
वैसे ही पुकारते -पुकारते अधीर
हो जाते हैं महाराज-
हा जानकी लखन हा रघुबर।
हा पितु हित चित-चातक जलधर।।
और चातक पक्षी की तरह महाराज
का प्राण ही प्रयाण कर जाता है-राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरह, राउ गयेउ सुर-धाम ।।
2- जिज्ञासु, तो कोकिल पक्षी की तरह
है, जो अपनी कुहू में ऐसा
राग देता कि, कहाँ-कहाँ की ध्वनि का
नाद भगवान् को स्तब्ध कर देता है।
इस भक्त की भी अनन्यता है।
जैसे आर्त की।
इसे भी ऐहलौकिक, पारलौकिक
भोगों से विरति और श्रीरामरति ही है।
वह, तो श्रवणमनननिदिध्यासनादि
द्वारा अज्ञान-तिमिरान्ध संसार
का उच्छेद चाहता है।
अज्ञानसंसार की विस्मृति हुई नहीं कि
ज्ञानस्वरूप तो विद्यमान है-
संसार विस्मृति और प्रभु-स्मृति ही
इस जिज्ञासु जिज्ञासा है-
“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”
इस संसार की हूक(दुख) से व्यथित वह
कोकिल की तरह कुहू-कुहू के
राग में कहाँ -कहाँ हेरता है अपना
आत्म।
3- ज्ञानी भक्त चकोर पक्षी है।
यह भी अनन्य भक्त है।
इसे परम प्रभु, जो ज्ञानस्वरुप हैं,
की अविचल स्मृति चाहिए।
ज्ञानी और भक्त में कोई भेद नहीं।
ग्यानिहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसंभव खेदा।।
जानना(ज्ञान) इसलिये कि जाने बिना
तो प्रेम संभव नहीं। और वह तो
“परमप्रेम” हैं।
जाने बिनु न होइ परतीती ।
बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई।
जिमि खगेस जल कै चिकनाई।।
4 – अर्थार्थी भक्त, शुक (कीर) भी
पूर्व -पूर्व भक्तों की तरह ही अनन्य
प्रेमी है। इन प्रेमियों का अर्थ-पुरुषार्थ
सामान्य नहीं है। इन्हें लौकिक या
अलौकिक कुछ भी नहीं चाहिए।
जैसे कि प्रह्लादजी, ध्रुव जी।
और परम भक्त वृत्रासुर।
इन्द्र,ध्रुव आदि लोक की कामना नहीं।
ब्रह्मलोक और ब्रह्मादि पद तुच्छ हैं।
सारी धरती का साम्राज्य नहीं चाहिए।
धरती के नीचे के सुतल तलातल
पाताल का आधिपत्य भी नहीं।
योगसिद्धि भी नहीं। और मोक्ष भी नहीं।
उसे तो मात्र प्रभु चाहिए।
इसलिये परीक्षित् से वृत्रासुरमाध्यम
द्वारा बोलता है शुक(देव)-
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यं।
न योगसिद्धिः अपुनर्भवं वा,
समञ्जस! त्वां विरहय्य काङ्क्षे ।
गुरुः शरणम् । हरिः शरणम् ।