जब भगवत् कृपा से सन्तों की संगति मिल जाये, तो वही अच्छी बात है-भली जो संगति साधु की।
मित्रों!जब सन्त समागम होता है, तब संसार भाव गलने लगता है।और साधु सन्त ,इसलिये कि वे परहित साधते हैं। स्वहित हो या परहित,इस असाध्य साधन की क्षमता भगवन् नाम और कथासुधासरिता में अवगाहन ही है।और क्या कहें,संसार में एकमात्र भगवान् और उनके प्राणप्यारे भक्त ही हैं ,जिनका स्वार्थ ही परमार्थ है-
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।
ये परम परमार्थी सन्त भगवान् की सुन्दर कथा का रस भक्तों के कर्णकुहरों में उड़ेल देते हैं, जो श्रवण रन्ध्र से प्रवेश कर सीधे हृदय देश में प्रवेश कर जाती है। लख चौरासी की मलिन चित्त की कामक्रोधादि वासना धुलने लगती है।
और धीरे-धीरे मन कहता है
श्रवणन और कथा नहिं सुनिहौं ,रसना और न गैहौं।
जानकी जीवन की बलि जैहौं।
नानायोनि समुत्पन्न चित्त की मलिन वासना जल्दी जाती नहीं, और इसलिये सन्त मुख से बहता कथा रस का जल ही उसे धोकर ,जब बार -बार शुद्ध करता रहता है, तब जीवन अनेक संशय का समाधान होता रहता है।
बाबा के शब्दों में यह कथा संशय रूपी पक्षी को उड़ाने वाली सुन्दर करतल ध्वनि है
राम कथा सुन्दर करतारी।
संशय विहग उड़ावन हारी।
कलियुग रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी भी है-
रामकथा कलिबिटप कुठारी।
सादर सुनु गिरिराज कुमारी।।
विद्वानों का परम आराम,सभी को मनोहर और कलि कालुष्य नाशक है-
बुध विश्राम सकलजनरंजनि।
रामकथा कलिकलुषविभंजनि।।
और भी है, यह कथा कलिरूपी सर्प के लिये मयूर के समान तथा विवेक रूपी आग जलाने हेतु ईंधन के समान है-
रामकथा कलि पंनग भरनी।
पुनि बिवेक पावक कहुँ अरनी।।
राम कथा यम गणों के मुँह में पोते जाने वाली कालिख जैसी यमुना है।जीव को मुक्ति देने वाली नगरी काशी भी है-
जमगन मुँह मसि जग जमुना सी।जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
और हो भी क्यों नहीं, भगवान् की यह कथा शिवशिवा- कागभुशुण्डि -याज्ञवल्क्यभरद्वाज तक क्रमशः सुनी कही और गाई गई है।और इसलिये यह शिव को प्रिय है ,ऐसी कि जैसे नर्मदा और शैलसुता पार्वती-
शिव प्रिय मेकल सैलसुता सी।सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
प्रेमियों! जब भगवान् की कथा, सभी सिद्धियों सुख और संपत्ति की खान ही है, तब, निरन्तर इसे सुनकर दूषित चित्त को धो पोंछकर अन्तर हृदय के आसन पर प्रभु को आसानासीन करके स्वस्वरूप (आत्मस्वरूप) की स्मृति करनी होगी, जो कि
शङ्करावतार आचार्य शङ्कर की दृष्टि में वस्तुतः भक्ति ही है-
स्वस्वरूपागतिः एव
भक्तिरित्युच्यते।
और इस प्रकार शबरी के लिये साधन भक्ति का दूसरा प्रकार आकार ग्रहण कर साकार होता है और भगवान् कहते हैं-ः
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।
।। हरिः शरणम् ।।