संसृति मूल सूलप्रद नाना। सकल सोकदायक अभिमाना।।

इस संसृति(सृष्टि) भूत जगत् में मैं यह
शरीर धारण करके क्यों आया? क्योंकि
” मैं ” पन बना ही रहा।
वस्तुतः अपने अभिमान के कारण।
यह संसार नाना सूल(चुभने वाले) दुःखों को देनेवाला और शोकप्रद है।
हम ऐसे दुर्भागी कि, अपना अभिमान दूर नहीं कर सके।बार -बार यह शरीर धारण का कारण बन रहा है।
मित्रों! सन्तों ने वेदादि शास्त्र मथ कर जो मक्खन निकाला है,उसका सार सर्वस्व ” घृत” यही ” अभिमान” है, जिसकी चिकनाई में हम जैसे जीव फिसल – फिसल कर गिर रहे हैं और बार -बार जन्म ले रहे हैं।
इस अभिमान का आयात कहाँ से?
विचारने पर एक सूक्ष्म “बीज” दीख
पड़ता है, जहाँ से निकल कर यह आ गया है। वह सूक्ष्म “बीज” है , “मद”।
यह “मद” ही अभिमान का कारण है।
मद का अर्थ ” नशा ” है।
इस नशे से हम मदमत्त(मतवाले)बने
रहते हैं। मजा देखिये, इसका ज्ञान हमें होता ही नहीं।
यह “मद”(नशा) कभी-कभी ज्यादा हो जाता है, तब मतवाला पन या उन्माद में
हम अति कर जाते हैं।
यही “मद” तो अभिमान का जनक है।

अब देखिये- इस ” मद ” का कारण
कौन ?
तो इस ” मद” को पैदा करने वाले अनेक हैं।सूची लम्बी है। कुछ इस तरह-
जातिमद, विद्या मद, पदमद,रूपमद,
यौवनमद,बलपौरुषमद,चातुर्य मद,
वचनमद, कर्ममद, बुद्धि मद,कौटिल्यमद

इत्यादि।
अब ये ” मद “के अनेक कारण हैं।
लेकिन एक और बड़ा ” मद ” है।
इसका नाम है ” श्री मद “। देखिये-
” रामचरितमानस ” के उत्तरकाण्ड में
” श्रीरामकथा” के अद्वितीय व्यास
” कागभुशुण्डि ” जी महाराज हैं।
सुमेरु की सर्वोच्च चोटी नीलगिरि पर्वत पर वह कथा कहते नहीं अघाते हैं।
इनकी कथा में ” हंस ” बनकर भगवान्
उमामहेश्वर भी जा चुके हैं।रास्ते में आते समय शिवजी की भेंट पक्षिराज गरुड़ जी से होती है। शंका करने पर भगवान् इन्हें
नीलगिरि पर श्रीकागभुशुण्डि जी जैसे परम भागवत से श्रीरामकथा सुनने भेज देते हैं।
सामान्य शिष्टाचार के बाद गरुड जी
वहीं श्रीरामकथा सुनते हैं।
इसी प्रसंग में माया मोह की निवृत्ति और पुनः शरीर न मिले ,इसके लिए
” श्रीमद ” और तज्जन्य अभिमान की चर्चा होती है।कागभुशुण्डिजी ने कहा कि
यह धनमद सभी को नशे में टेढ़ा कर देता है। राजा आदि के पद का मद तो बहरा ही बना देता है।स्त्री के प्रति आसक्ति भी तो पुनः जन्म का बड़ा कारण है।
क्योंकि इनके रूपयौवनमद से बड़े -बड़े महर्षि नहीं बचे-

श्रीमद वक्र न कीन्ह केहि,
प्रभुता बधिर न काहि।
मृमलोचनि के नैन सर,
को अस लागि न जाहि।।

 यह नाना तरह का मद(नशा) अपना नाश करने के लिए काफी है। यही अनेक प्रकार का मद " अभिमान " को जन्म देकर बनाए रखता है।

सोचिये, माँ के गर्भ से बाहर आए तो माँ मिली,छाती से लगाया।बड़े होने पर पिता भी मिले,और उनकी पैतृक सम्पत्ति भी।
शरीर छोड़ने पर सब यहीं छूटा। अरे !
हमारा शरीर भी हमारा नहीं।

जब ना कुछ मेरा ना कुछ तेरा ।
तब मद और अभिमान क्यों?

इसीलिये श्रीरामचरित्र को देखने वाले और श्रीरामकथा सुनाने वाले धन्यातिधन्य
आचार्य श्रीकागभुशुण्डि जी महाराज ने
गरुड जी को कथा सुनाने के प्रसंग में
इस मद और उसके जनक अभिमान
को नर तन पाकर छोड़ने के लिए कहा है,
जो पुनः चौरासी के चक्कर में ढकेल देता ही है –
संसृति मूल शूलप्रद नाना
सकल सोकदायक अभिमाना।।

यह झूँठा अभिमान हरिगुरुसन्तों की कृपा से दूर हो, प्रत्याशित जन्म भोग के लिए न होकर, भगवदीय आदेश पर “उनकी”
” लीला” दर्शन के लिए हो।

गुरुः शरणम्

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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