योग और भोग

साधारण विचार करें तो, यह माटी,पानी,
आग, हवा और खुला आकाश हम जैसे ऋषि संस्कृति वाले भारतीयों के लिये,
साधारण भोग के पदार्थ नहीं हैं।
यह माटी हमारी धरती माँ है।
पानी हमारी पवित्र गंगा है।
आग तो साक्षात् अग्निदेव ही।
हवा हमारे श्वास-प्रश्वास प्राणदेव।

खुला आकाश प्राणों के माध्यम से यहाँ से वहाँ ,नाना लोकों में ले जाने वाला
आक्सीजन का रक्षक, निर्गुण,निर्विकार,
परमात्मा, परमब्रह्म, जिस आकाश देव
के बिना जीवन की कोई कल्पना नहीं।

नारायण! यही है हमारी सर्वत्र भगवद् दृष्टि। यह मान्यता पवित्र भारत की धरती से परे नहीं मिलने वाली, यही भारत का योग है। यह रामकृष्ण के अवतार की धरती है। जहाँ भक्तों के आनन्दहेतु “वह” अजन्मा ,जन्मता है।
हम “उनकी” करुणा से मानव तन पाकर
” भोग”के लिये नहीं जन्मे हैं।
कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही।।

अब हमें अपने ” परमयोग ” (परमात्मा)
का वियोग सहन नहीं। हम सदा -सदा के लिये “उसका” योग ही पाना चाहते हैं।
सद्गुरु वाणियों का भी “योग” और
योग ही नहीं ” प्रयोग ” भी यही है।
तुलसी, सूर,कबीर, रैदास, मीरा जैसे भगवत् प्राप्त सन्त कृपा करें।
और जहाँ से हम(जीव) बिछुड़े थे “उनकी” प्राप्ति हो जाय।
हम कृतकृत्य हों ,जीवन धन्य हो जाय।

जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राम मय जानि ।
बन्दौं सबके पदकमल
सदा जोरि जुग पानि।

हम सबमें भगवद् दृष्टि ही रखते हैं, इसलिये कि ,उस भगवत् स्वरूप को ही पा लें,जिसके लिये” यह शरीर”
मिला,जो योगभाव है।
नहीं तो, भोगभाव तो शूकर कूकर शरीरों में ढकेल देगा।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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