उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।।

संसार-शरीर का आकर्षण बड़ा ही चित्र
विचित्र है।
यह शरीर और संसार दो नहीं हैं।
दोनों एक ही हैं।
युगों -युगों का शास्त्र पालन और समाधि इत्यादि द्वारा तपश्चर्या, क्षण मात्र में नष्ट होते देर नहीं लगती।
सन्त समाज ,भगवान् के परशुरामादि को लेकर कुल चौबीस अवतार मानता है।
भगवत् चरित्र श्रीमद्भागवत” और
भागवत् (भक्त) चरित्र “भक्तमाल” में इन चौबीस अवतारों की चर्चा है।
भागवत् पुराण में वर्णन है-
भगवान् “ऋषभदेव” के पुत्र थे, श्रीभरत।
इन्हें ” जड़ भरत ” की संज्ञा दी गई थी।
इसलिये कि ये ,इतने वीतरागी महात्मा
थे ,कि ध्यान में बैठते,तो सहस्र वर्षों तक उनकी “समाधि”लग जाती थी।
अनेक वर्षों तक समाधि दशा में पद्मासन में बैठे रहने से इनका शरीर, वृक्षादि की भाँति “स्थिर”रहता, और इसी कारण इन्हें
जड़ भरत” कह जाने लगा।
स्वाभाविक है कि इस अवस्था के कारण यह समाधि दशा में परम तत्व का
दर्शन भी करते थे। अतः-
“प्रकृत्या” ये महात्मा “जड़ भरत” अत्यन्त अपरिग्रही और त्यागी थे।

एक समय की बात है, कि वे प्रातः नदी में स्नान कर रहे थे।
एक सिंह एक हरिणी का पीछा करते हुए ,उसे दौड़ाये हुए आ रहा था।
दौड़ने कीआवाज हुई और श्रीभरत जी
ने पलट कर देखा, तो किनारे आते-आते
आगे हरिणी और पीछे सिंह दीखा।
ऋषि की अहिंसक दृष्टि दोनों पर एक साथ पड़ी, तो थोड़ी दूर पर स्थित बेचारे सिंह की हिंसा ही नष्ट हो गई।
वह दुम दबाकर विपरीत दिशा की ओर भाग चला।
हरिणी वेगवशात् नदी में कूद पड़ी।
प्रसवासन्ना ,उसका प्रसव नदी के जल में
ही हो गया।और उसने तत्काल प्राण भी त्याग दिये। सद्योजात प्रसूत हिरण को
उन्होंने उठा लिया ।
दयालु महात्मा उसे अपने आश्रम में ले
आये। उसका लालन-पालन करने लगे।
पालितपोषित वह शनैः-शनैः बड़ा होने लगा। करुणा पूरित हृदय महात्मा का स्वाभाविक स्नेह उसमें आबद्ध हो गया।
अब ऐसे वीतरागी, तपोधनी,परम
ब्रह्म दर्शी श्रीजड़ भरत जी जब अपना देह-त्याग करने लगे,तब उस “हिरण” की अकस्मात् थोड़ी देर के लिये स्मृति उनकी “वृत्ति” में आ गई, और उसी क्षण उनकी देहावधि पूरी हो गई। उन्हें मृगयोनि में जाना पड़ा।
भैया! अन्ते मतिः सा गतिः।
भगवान् ने गीता में कहा-

यं यं वापि स्मरन् भावं
त्यजन्ति अन्ते कलेवरम्।
तं तम् एव एति कौन्तेय!
सदा तद् भावभावितः।।

जिस-जिस वस्तु-व्यक्ति-पद-पदार्थ-स्थान
रुपादि का स्मरण करते हुए ,यह जीवात्मा
शरीर छोड़ता है, उसी भाव में अनुरक्ति होने से उन्ही-उन्हीं शरीरों को प्राप्त करता है।
हम जैसे मलिन वासनावासित जीव,यदि शास्त्र और सन्त निर्दिष्ट हरि नाम का निरन्तर प्रतिक्षण स्मरण करते हुए, अपना काल नहीं बितायेंगे, तो इस शरीर का अन्तिम काल कब हो ?
कौन जाने?

हमारी चित्तवृत्ति नानात्मक जगत् में लगी है। ऐसे वीतरागी” जड़भरत”जी एकमात्र हरिण में चित्त जाने से हरिण शरीर पा गये-

एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह।
उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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