सरल स्वभाव न मन कुटिलाई यथा लाभ सन्तोष सदाई।।

नाना तीर्थों में विराजे देवी,देवताओं की तत् तत् स्थानों में जाकर ,उपासना करना।

अष्टांग योग से वैराग्यसाधन।

अनेक कर्तव्य कर्म धर्म व्रतोपवास जप
तप यज्ञ का सम्पादन और दान।

शम दम दया पूर्वक द्विजगुरु की सेवा।

विद्या ग्रहणजन्य विनय विवेक को आत्मसात् करना। इस प्रकार-

जहाँ तक वेदशास्त्र सन्त सम्मत ये सभी भक्ति- साधन हैं, जिन सभी का एकमात्र फल, भगवद्-भक्ति ही है –

 इसलिये बाबा ने कहा-

तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ज्ञान निपुनाई।।
नाना कर्म धर्म व्रत दाना।
संजम दम जप तप मख नाना।
भूत दया गुरु द्विज सेवकाई।
बिद्या बिनय बिवेक बड़ाई।।
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरिभगतिहि मानी।

अब जब उक्त साधनों का फल हरि भक्ति है, तो शबरी को प्रदत्त सभी नौ साधन भी पृथक् – पृथक् हरि भक्ति फल वाले ही हैं।यह देखने योग्य और विचारणीय प्रसंग है।

ये सभी मानवाचरणीय क्रियायें, भगवान् द्वारा प्रदत्त साधन भक्ति में अलग-अलग
नौ सूत्रों में कही गई हैं।

प्रथम भगति सन्तन कर संगा से लेकर
अन्तिम “साधनभक्ति” के रूप में
भगवान् श्रीराम ने-

नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हिय हरष न दीना।।
कह कर वि राम लिया।
मतलब कि, सरलता-साधुता,निश्छलता,

विश्वास मूर्ति भगवान् पर दृढ़ विश्वास,
हृदय में विराजे आनन्दमूर्ति आनन्दकन्द भगवान् के कारण दीनता छोड़ केवल हर्ष में रहना।
ये सभी बातें “साधन भक्ति” के नवम कारण में आई हैं। विमर्शणीय है कि-
यही भक्ति का साधन बननेवाली
सरलता इत्यादि,”साध्या भक्ति” भी बन जाती है।
श्रीमद्रामचरित्रमानस के उत्तर काण्ड में ,राज्याभिषेक के अनन्तर, भगवान् ने समक्ष बैठी प्रजा को उपदेश दिया है।
इस उपदेश प्रकरण में वे, भक्ति की परिभाषा या स्वरूप लक्षण कह देते हैं।
यही “साध्या भक्ति “है। यहाँ उन्होंने भक्ति को नाना योग,यज्ञ,जपतप,दान उपवासों से परिश्रम और प्रयत्न से प्राप्य नहीं कहा, बल्कि चार समन्वित गुणों के कारण भूत इस-
“भक्ति” को सिद्ध-साद्ध्या रूप में
इसकी परिभाषा ही दे डाली। यह गुणों
का रुचिर ” चतुष्पथ ” है, जिसमें-
सरल स्वभाव, निष्कपटता, यथालाभ सन्तुष्टि और दयापूर्णता इन चारों का समन्वय है।

    यही  "साध्या भक्ति" है,शरणागति 

और प्रपत्ति भी।
अब देखिये, इन्ही गुणों का समावेश
पूर्व में उक्त –
“साधन – भक्ति” में है,तो इनका प्रवेश
“स्वरूप -लक्षणा” साध्या में भी ।
भक्त के लिये यह चार गुण
भगवान् की चार भुजायें हैं,जिसकी परिधि में वह सदा ही निश्चिन्त है। अतः
भगवान् ने कहा-

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न जप तप मख उपवासा।।
सरल स्वभाव न मन कुटिलाई।
यथालाभ सन्तोष सदाई।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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