मातापिता और गुरु से लेकर सभी समन्धों में वर्तमान भगवत् स्वरूप जन
यदि आगमिष्माण “मृत्यु” का निवारण नहीं करते हैं, तो मातृत्व,पितृत्व और शिष्यत्व आदि सम्बन्ध व्यर्थ हैं।
और वे सभी तत् -तत् सम्बन्धों का अपलाप कर रहे हैं। सच्चे मातापिता आदि वे हैं ही नहीं,जो अपना और अपने पुत्रादिकों को संसार-राग से बचाकर, इस शरीर का प्रयोजन सफल न सकें।
इसीलिये सती “मदालसा” ने पुत्र को पालने में ही लोरी गा-गाकर उसके वास्तविक स्वरूप (परमात्मांश) का बोध कराया-
शुद्धोसि बुद्धोसि निरञ्जनोसि
संसारमाया परिवर्जितोसि।।
परमात्मा “ईश्वर” हमारा अंशी है।
हम जीवात्मा उसी अविनाशी के अंश हैं।
जैसे वह परमात्मा चेतन,निर्मल और
सहज रूप से सुख की ही राशि है।
वैसे हम भी चेतन, संसार वासना के मल से विहीन और मौलिक रूप से सुख स्वरूप ही हैं।
अब प्रश्न है कि चेतन अमल सहज सुख की राशि यह जीव दुखी क्यों?
दुखी इसलिये कि दुःखालयम् और अशाश्वतम् शरीर संसार से इसने अपना सम्बन्ध जोड़ लिया।
और अपनी स्वाभाविक प्रकृति आनन्द रूप परमात्मा से अपना सम्बन्ध
तोड़ लिया। जिससे मायाबश होकर तोते और बन्दर जैसा अपने स्वामी के आदेश का पालन करते हुए बद्ध हो गया।
यह शरीर संसार ही इसका “स्वामी” बन बैठा है-
सो मायाबस भयौ गोसाईं।
बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
अब देखिए, इस बेचारे जीव की स्थिति, जो अपने मूल स्वामी परमात्मा से सम्बन्ध
भुला कर, अस्थिर शरीर संसार से सम्बन्ध मान बैठा।
संसारी होने से युगों-युगों से भटकता, इसी जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा है।
आखिर उपाय क्या है, इसका दुख दूर करने का?
एकमेव अपने मूल जनक और तत् स्वरूप सुखरूप परमात्मा की ओर लौट आना-
तत् सुखसुखित्वम्-नारद भक्ति सूत्र।
बिना संसार शरीर की भोगवृत्ति त्यागेऔर
और अपने मूल से जुड़े, नाना जन्मों और शरीरों का प्रारब्ध नष्ट नहीं होगा-
सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं।।
और इस जन्मचक्र से छूटने और सहज वास्तविक आत्मकल्याण की उपलब्धि, बिना भगवद् दर्शन के असम्भव है।
अतः मानव शरीर का लक्ष्य, एकमेव भगवद् दर्शन ही है, जिससे हम सभी जीव ,अपने युग-युगान्तर का भटकाव
दूर कर पायेंगे।
भगवद् दर्शन और उसकी प्राप्ति में जीव को उस मार्ग पर चलने में सहयोगी न बननेवाले “गुरु” गुरु नहीं हैं।
स्वजन( सगे सम्बन्धी) भी स्वजन अर्थात् अपने आत्मीय नहीं हैं।
“पिता” वस्तुतः पिता नहीं और ” माता “
भी वास्तविक माता नहीं जिन्होंने ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं किया।
वह” दैव” दैव भी नहीं और “पति” पति भी नहीं, जो आने वाली “मृत्यु” से मुक्त न करा सके।
अतः जीव का एकमेव लक्ष्य
” एकमेवाद्वितीयम्” की प्राप्ति है, जिसके लिए करुणासिन्धु भगवान् ने यह” मानव”
शरीर दिया।
वस्तुतः भगवान् ने “अपनी प्राप्ति” के लिये ही यह शरीर सौंपा है। इसलिये सभी को इसमें सहयोग करना चाहिए।
इसीलिये शुकवाणी ने चेत
कराया-
गुरुः न स स्यात्, स्वजनो न स स्यात्।
पिता न स स्यात् जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत् स्यात् न पतिः च स स्यात्।
न मोचयेद् यः समुपेत मृत्युम्।।
।। हरिः शरणम् ।।