नारायण जपते रहें इसमें ही आराम है

तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः।।

मात्रतुलसी दल और जल को ही श्रद्धा विश्वास, भाववश अर्पण करने से भगवान् स्वयं को आत्मसदृश भक्त के हाथों बेंच देते हैं।क्यों?

भगवान् भक्तवत्सल हैं।
अत्यन्त वात्सल्य के वशीभूत होकर
भक्त की रक्षा के लिए नरसिंह स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं।
और वह भी खम्भे से

खम्भा जड़ है, और ” हिरण्यकशिपु” भी
आत्माभिमान वश होकर जड़ ही है।
हिरण्य अर्थात् स्वर्ण के कशिपु अर्थात्
वस्त्र में लिपटा होने से वह,हिरण्यकशिपु भी स्वर्ण वस्त्रवत् जड़ है।
अब जब जो जड़ वृत्ति है, उसे चेतन के बिना प्रकाश कैसे हो सकता है।
बिना प्रकाश के आकाशशरीर निर्गुण और सीतारामादिसगुण को देखेंगे कैसे।
” देखे बिनु रघुनाथ के जिय की जरनि
न जाय। “

हाँ यह अवश्य है कि, जिन भाग्यशाली मनुष्यों की नाम जप से वाह्य वृत्ति शान्त हो गई है। और नाम जप भी श्वास प्रश्वास की गति से चलने का अभ्यास हो जाय।
वृत्तियाँ अन्दर प्रवेश कर लेंगी।
आत्मानुभूति का रस मिलने लगेगा।
और यह स्वप्नवद् जगद् आनन्द मय ही दिखेगा।
बाहर तो तुलसी दल,जल आदि से श्रीरामकृष्ण नारायण की पूजा ही बनेगी।
जिससे भक्त और भगवान् का मिलन होगा। प्रभु की करुणा की धारा से भक्त अभिसिंचित हो जायेगा। मूर्तिमती करुणा
स्वाभाविक वात्सल्य को जन्म देगी।
और ” पिता”-“पुत्र” का चिर प्रतीक्षित
संयोग, “नरसिंह”-“प्रह्लाद” हो जायेगा।
यही भगवान् का भक्त के हाथों बिकना है, जैसे भगवत्कामी प्रह्लाद का हुआ।

नारद जैसे गुरू मिलें एक यही तो काम है।
नारायण जपते रहें इसमें ही आराम है।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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